राहुल कैसे कांग्रेस के पंजे में पुरानी ताक़त ला पाएंगे

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दक्षिण मुंबई लोकसभा चुनावी क्षेत्र की एक कच्ची बस्ती में कांग्रेस पार्टी के कुछ युवा कार्यकर्ता तंग सड़कों से गुज़रते हुए, घर-घर जाकर लोगों को अपनी पार्टी में शामिल होने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं. उन्हें पार्टी ने आदेश दिए हैं कि वो बीजेपी सरकार की 'नाकामियों' के बारे में भी लोगों को बताएं
हाथ में कांग्रेस पार्टी का झंडा लिए और सिर पर पार्टी की टोपी पहने कार्यकर्ता बबलू गुप्ता कहते हैं, "पार्टी हमें ये संदेश दे रही है कि पार्टी का प्रचार घर-घर तक पहुंचाइए और बीजेपी सरकार के झूठे वादों का पर्दाफ़ाश कीजिए".

संदीप कांडके कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की टोली का नेतृत्व कर रहे हैं. वह कहते हैं, "बीजेपी और उसकी पैरेंट बॉडी आरएसएस के कार्यकर्ता पेड वर्कर्स हैं. उनके सोशल मीडिया के लोग ट्वीट करते हैं तो उन्हें पैसे दिए जाते हैं. कांग्रेस लोगों के पास जाकर चुनाव के लिए फ़ंड जमा कर रही है."
लोकसभा चुनाव में अभी समय है लेकिन पिछले साल के अंत में तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं.


कांग्रेस का मक़सद
संदीप कांडके के अनुसार उनकी पार्टी का एक ही उद्देश्य है और वह है भाजपा सरकार को सत्ता से हटाना.
वह कहते हैं, "लोगों को हम याद दिला रहे हैं कि जो बीजेपी सरकार ने वादे किये थे, जैसे कि 15 लाख रुपये हर व्यक्ति के अकाउंट में आएगा, वो पूरे नहीं हुए. लोगों को एहसास हो चुका है कि बीजेपी पर विश्वास करके बहुत बड़ी ग़लती हुई है. इस बार वह ऐसी ग़लती नहीं करेंगे."

दक्षिण मुंबई का लोकसभा चुनावी क्षेत्र कांग्रेस पार्टी का गढ़ रहा है.
पहले मुरली देवड़ा और इसके बाद उनके बेटे मिलिंद देवड़ा यहाँ से चुनाव जीतते थे.
लेकिन 2014 के चुनाव में, मोदी लहर के कारण, यहाँ कांग्रेस को शिकस्त का सामना करना पड़ा.
यहाँ छह विधानसभा की सीटें हैं, पिछले विधानसभा के चुनाव में बीजेपी और शिव सेना को दो-दो सीटें मिली थीं, जबकि ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और कांग्रेस को एक-एक सीट मिली.
दक्षिण मुंबई की तर्ज़ पर कांग्रेस ऐसी मुहिम पूरे देश में चला रही है.

पिछले आम चुनाव की सभाओं में नरेंद्र मोदी ने भारत को कांग्रेस-मुक्त बनाने की अपील की थी.
उन्होंने कहा था, "भाइयों और बहनों, महात्मा गांधी ने चंपारण से अंग्रेज़ मुक्त भारत की बात कही थी. आज यहां से बिगुल बजना चाहिए. गांधी मैदान से बिगुल बजना चाहिए कि कांग्रेस-मुक्त का सपना हिंदुस्तान साकार करे."


कांग्रेस की शर्मनाक हार
साल 2014 में हुआ आम चुनाव कांग्रेस की अब तक की सबसे शर्मनाक हार थी. कई राज्यों में इसके पैर पूरी तरह से उखड़ गए.
गुजरात में ज़ीरो सीट, राजस्थान में भी ज़ीरो, महाराष्ट्र में 48 सीटों में से इसे केवल दो सीटें हासिल हुई.
इसके बाद हुए विधानसभा के कई चुनावों में भी जब पार्टी को लगातार झटके लगे तो लगा कि नरेंद्र मोदी का कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना शायद पूरा हो जाए.
एक समय तो राजनीतिक विश्लेषकों ने भी भारत की सबसे पुरानी सियासी पार्टी को ख़ारिज करना शुरू कर दिया था.

लेकिन फिर साबित हुआ कि राजनीति में पांच साल लंबा अरसा होता है. 135 साल पुरानी सियासी पार्टी को ख़ारिज करना जल्दबाज़ी था. धीरे-धीरे कांग्रेस में फिर जान लौटती दिखी.
पिछले साल के दूसरे हाफ़ में चार विधानसभा चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद नज़र आ रहे हैं. पार्टी नेताओं का आत्मविश्वास भी लौट आया है.
पार्टी प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं, "लोग सोचते थे कि बीजेपी और मोदी अजेय हैं. उन्हें हराया नहीं जा सकता, लेकिन अब लोगों का मूड बदल रहा है."


क्या बीजेपी को चुनौती दे पाएगी कांग्रेस?
तो क्या कांग्रेस एक बार फिर से एक बड़ी शक्ति बन कर उभरेगी? क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में ये बीजेपी को शिकस्त देने के लायक होगी?
हम साल के अंत में इन्हीं सवालों का जवाब तलाश करने देश के कुछ राज्यों में कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलने निकल पड़े.
हम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिले जहाँ पार्टी लगभग 30 साल से सत्ता से बाहर है. हम तमिलनाडु भी पार्टी के दफ्तरों में गए, कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिले. यहाँ 50 सालों से कांग्रेस सत्ता में नहीं है.
हम महाराष्ट्र भी गए जहाँ 20 साल पहले पार्टी के दो टुकड़े होने के बावजूद पार्टी सत्ता से लंबे समय के लिए दूर कभी नहीं रही है, वहीं उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में पार्टी की हालत पस्त रही है.

दो सप्ताह के इस दौरे में कुछ बातें साफ़ निकल कर सामने आईं.
- सालों से मायूस हुए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं में उम्मीद की एक किरण जागी है, उनके बीच पूरे देश में एक नया उत्साह नज़र आता है.
- तीन राज्यों में जीत के बाद पार्टी में राहुल गांधी का क़द काफी ऊंचा हुआ है. उनके प्रति वफ़ादारी बढ़ी है.
- युवाओं, पहली बार वोट डालने वालों और महिलाओं को आकर्षित करना पार्टी की प्राथमिकता है. इन समुदायों पर पार्टी काफ़ी काम कर रही है.
- सोशल मीडिया में पार्टी ने बीजेपी से टक्कर लेना शुरू कर दिया है.
- पार्टी का अंदरूनी ढांचा मज़बूत हुआ है और ऊपर से नीचे तक आंतरिक संवाद का सिस्टम बनाया गया है.
- कई राज्यों में पार्टी अब तक डूबी ही नज़र आती है.
- पार्टी का रुख आक्रामक हुआ है और उनकी चुनावी मुहिम अभी से शुरू हो चुकी है.
- पार्टी में उछाल है लेकिन इसकी रफ़्तार काफ़ी धीमी है.

इमेज स्रोत, PTI
प्रियंका गांधी वाला दांव
प्रियंका गांधी को महासचिव नियुक्त करके पार्टी ने ये पैग़ाम दिया है कि युवाओं और महिलाओं पर फोकस करना कांग्रेस की पहली प्राथमिकता है.
महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस अध्यक्ष सत्यजीत तांबे कहते हैं कि ये उनके लिए एक बड़ी चुनौती है. "2014 के आम चुनाव में युवा पीढ़ी नरेंद्र मोदी की तरफ़ थी. पहली बार वोट देने वालों का झुकाव भी मोदी की तरफ़ था. हमारे लिए युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों को पार्टी की तरफ़ लाना एक बड़ी चुनौती भी है और हमारी प्राथमिकता भी."
तांबे का दावा है कि भारतीय युवा मोदी सरकार से निराश हैं और युवा बड़ी संख्या में कांग्रेस से जुड़ रहे हैं.
मुंबई की भावना जैन कांग्रेस की एक उभरती महिला नेता हैं.
वो अमरीका में कई साल रहने के बाद 2008 में भारत लौटकर कांग्रेस पार्टी से जुड़ गईं.
भावना कहती हैं, "कांग्रेस महिलाओं को जोड़ने के लिए उन्हें काफ़ी प्रोत्साहित कर रही है. मुझे पार्टी ज्वाइन करने के चार साल बाद ही स्थानीय चुनाव में लड़ने का मौक़ा दिया गया. अध्यक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं को आगे बढ़ाने का काम किया है. हमारी पार्टी में महिलाओं के लिए कोटा है".


कांग्रेस में घरवापसी
कांग्रेस में नई जान पड़ते ही पार्टी को छोड़कर जाने वाले कुछ नेता वापस पार्टी में लौटने लगे.
तारिक़ अनवर कांग्रेस छोड़ कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में चले गए थे. अब वे कांग्रेस में लौट गए हैं.
वे कहते हैं, "सोनिया गांधी विदेशी होकर प्रधानमंत्री बनेंगी इस मुद्दे पर हम कांग्रेस से अलग हुए थे, जो हमारी भूल थी और अगले चुनाव में यह पता चल गया."

कुछ दूसरे दलों के नेता भी कांग्रेस में शामिल होने लगे हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी बसपा के साथ थे, अब कांग्रेस के पाले में हैं.
सिद्दीक़ी बताते हैं, "हम कांग्रेस में इसलिए आए हैं क्योंकि ये हमारे बाबा-दादा की पार्टी थी. जब तक हमारे बुज़ुर्ग कांग्रेस को वोट देते रहे बीजेपी को कभी जीत नहीं मिली."


राहुल गांधी की स्वीकार्यता
एक समय 'पप्पू' कहे जाने वाले राहुल गांधी पार्टी के निर्विवाद नेता साबित होते दिख रहे हैं.
पहले की तुलना में राहुल गांधी का रुख़ अब काफ़ी आक्रामक है, जैसा कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने हमें बताया, "उनका आत्मविश्वास काफ़ी बढ़ गया है. उनका स्वाभाविक अंदाज़ आक्रामकता का नहीं है. वो नरम रुख़ रखते हैं. वो आक्रामक नहीं हैं लेकिन जब भाजपा रफ़ाल को लेकर झूठ बोलेगी, चीज़ें छिपाएगी, तो गुस्सा आना स्वाभाविक है.''

साल 2014 के आम चुनाव में पार्टी को सबसे बड़ा झटका ज़रूर लगा था लेकिन उसे इससे पहले ही बुरे दिनों का अंदाज़ा हो गया था.
उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिसा, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में पार्टी दशकों से सत्ता से दूर है.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट कहते हैं, ''कांग्रेस की गिरावट नेहरू के निधन के बाद शुरू हो गई थी लेकिन असली पतन शुरू हुआ 1989 में जब वीपी सिंह की सरकार ने मंडल रिपोर्ट लागू की.
उसी दौर में भाजपा का उभार हुआ और 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुला. मंडल, दलित उभार और सांप्रदायिक राजनीति, तीनों मोर्चों पर कांग्रेस संभाल नहीं पाई.''

उस समय कई लोग पार्टी छोड़कर चले गए थे.
कांग्रेस के सांसद पी एल पुनिया के बेटे और बाराबंकी से युवा कांग्रेस के नेता तनुज पुनिया, "कई लोग हमें छोड़कर चले गए थे. जो 2009 में हमारे साथ थे, दूसरे कई राजनीतिक दलों में चले गए. हमारे कई कार्यकर्ता भी पार्टी से अलग हो गए''

पार्टी छोड़ने वालों में ख़ानदानी कांग्रेसी रह चुके लखनऊ के राजेश गौतम भी थे जो अब यूपी में बीजेपी विधायक हैं.


वो जिन्हें कांग्रेस अब भी पसंद नहीं
राजेश गौतम बताते हैं कि उन्होंने पार्टी क्यों छोड़ी और बीजेपी से क्यों जुड़े, "वहां संगठन नाम की कोई चीज़ नहीं थी. किसी पार्टी में जब कोई संगठन होता है जैसे प्रदेश स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर योजनएं होती हैं, उसमें क्षमता के आधार पर पूरी की जाती है. कांग्रेस में ये होता था कि चंद लोग होते थे, जो कांग्रेस पार्टी में कुछ लोगों के इर्द-गिर्द घूम जाए, चाहे वह काम करे या न करे, आगे ज़रूर बढ़ जाएगा.".
कांग्रेस की तुलना में उन्हें बीजेपी में योग्यता का महत्त्व दिखा और वो बीजेपी से जुड़ गए, "अगर आप काम कर रहे हैं तो किसी के पीछे भागने की ज़रुरत नहीं. बीजेपी का नेतृत्व उसको मौक़ा देता है"

इमेज स्रोत, Getty Images
पार्टी के कमज़ोर होने के और भी कई कारण थे. एक बड़ी वजह थी इंदिरा गांधी की कथित असुरक्षा.
चेन्नई में वरिष्ठ कांग्रेस नेता एसवी रमणी संजय गांधी के दोस्त थे और उन्होंने इंदिरा गांधी को क़रीब से काम करते देखा है, "क्षेत्रीय नेताओं से मैडम (इंदिरा गांधी) को थोड़ा प्रॉब्लम था. मैडम के दिमाग़ में ये बात डाल दी गई थी कि अगर क्षेत्रीय नेता शक्तिशाली हो जाएँ तो पार्टी कंट्रोल में नहीं रहेगी, तो मैडम ने ऐसे नेताओं को थोड़ा दबाया जिससे पार्टी को नुकसान हुआ."
कांग्रेस पार्टी में गुटबंदी और नेताओं के बीच झगड़ों ने भी कांग्रेस को काफ़ी कमज़ोर किया. कई राज्यों में अपने सिद्धांतों से भटकना भी पार्टी के पतन का कारण बना.
खुद कांग्रेस के नेता और कई विश्लेषक ये मानते हैं कि पार्टी ने युवाओं को नज़रअंदाज़ किया जिसके कारण पार्टी में नए चेहरे और नई लीडरशिप ठीक से नहीं उभर सकी.
चेन्नई में फ्रंटलाइन पत्रिका के संपादक विजय शंकर कहते हैं, "युवा तमिलनाडु की दोनों द्रविड़ पार्टियों से भारी संख्या में जुड़े लेकिन कांग्रेस उन्हें लुभाने में नाकाम रही जिसके कारण पार्टी कमज़ोर होती गई. ऐसी ही ग़लती पार्टी ने दूसरे राज्यों में भी की."
शायद पार्टी को इसका अंदाज़ा भी है इसलिए अब युवाओं और महिलाओं को लुभाना उसकी प्राथमिकता बन गया है.

कांग्रेस ने शक्ति नाम से एक प्रोजेक्ट लांच किया है जिसका मक़सद युवाओं और महिलाओं को पार्टी से जोड़ना है. इसका दूसरा उद्देश्य बड़े नेता और ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच संवाद शुरू करना है.
मुंबई की नेहरू नगर झोपड़पट्टी में एक कार्यकर्ता ने कहा कि उसने पार्टी के बुरे समय में भी इससे वफ़ादारी निभायी और वो इस बात से खुश है कि राहुल गांधी ने युवाओं और महिलाओं को जोड़ने की मुहिम शुरू की है.


कांग्रेस का शक्ति प्रोजेक्ट
इस कार्यकर्ता की पत्नी भी कांग्रेस की एक सक्रिय कार्यकर्ता है जिसने दावा किया कि वो शक्ति प्रोजेक्ट के माध्यम से राहुल गांधी से सीधा संपर्क कर सकती है. शक्ति एंड्राइड वाले मोबाइल फ़ोन पर ऐप की शक्ल में मौजूद है. मैंने कई शहरों और देहातों में कार्यकर्ताओं से पूछा कि ये ऐप कैसे काम करता है मुझे बताओ. मुझे लगता है कि शक्ति कोई बहुत असरदार प्रोजेक्ट नहीं है या इसे ज़ोरदार तरीके से लागू नहीं किया गया है.
एक युवा ने कहा, "मैं राहुल गांधी को एक बड़ा नेता मानता हूँ क्योंकि उन्होंने युवाओं को मंच दिया. मैं यूथ कांग्रेस से हूं. मुझे राहुल गांधी पसंद हैं. उन्होंने हमें ये एहसास दिलाया है कि कोई भी नेता बन सकता है.

पिछले लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया के इस्तेमाल में भाजपा ने कांग्रेस से बाज़ी मार ली थी. लेकिन अब कांग्रेस उससे आगे निकलने का दावा कर रही हैं.
पार्टी के मुताबिक़ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उनकी हाल की चुनावी जीत के कारणों में सोशल मीडिया का योगदान था.
केके शास्त्री, पार्टी की सोशल मीडिया यूनिट से जुड़े हैं और हाल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए चुनाव में उन्हों ने पार्टी की सोशल मीडिया की रणनीति तैयार की थी.
वो कहते हैं, ''साल 2014 के आम चुनाव में सोशल मीडिया पर हमारी मौजूदगी बहुत कम थी. लेकिन 2018 तक दो राज्यों में कांग्रेस का सोशल मीडिया कामकाज भाजपा से आगे था. हमने देर से शुरुआत की, लेकिन हम तेज़ निकले.''
भारतीय राजनीति पर गहरी नज़र रखने वालों के अनुसार कांग्रेस का गिरता ग्राफ़, क्षेत्रीय आकांक्षाओं का नेतृत्व करने वाली पार्टियों के जन्म के परिप्रेक्ष्य में एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी.
साल 1951 में हुए पहले चुनाव में भाग लेने वाले दलों की संख्या 53 थी, 1957 में संख्या घटकर 15 हो गई. पिछले चुनाव में सियासी दलों की संख्या 1900 थी जिनमें 465 पार्टियों ने चुनाव लड़ा.


कांग्रेस उभर रही है लेकिन धीरे-धीरे
कांग्रेस उभर ज़रूर रही है लेकिन पार्टी नेताओं और विशेषज्ञों के मुताबिक़ उसके उभरने की रफ़्तार धीमी है.
वरिष्ठ पत्रकार विजय शंकर कहते हैं, "कांग्रेस का उभार एक लंबी प्रक्रिया है".
उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार वीरेंदर नाथ भट कहते हैं, "समय सीमा पर मतभेद हो सकता है लेकिन कांग्रेस आगे बढ़ेगी इस में दो राय नहीं हो सकती, समय लगेगा लेकिन होगा."

लेकिन कांग्रेस अपने बूते चुनाव अभी नहीं जीत सकती. उसे दोस्तों की ज़रूरत होगी, जैसा की महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान कहते हैं, "एक बात साफ़ है. हमें अलग-अलग राज्यों में सहयोगियों के साथ मिलकर लोकसभा चुनावों में उतरना होगा."
अब तक हुए 15 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपने बूते छह चुनाव जीते हैं और चार में गठबंधन सरकारें बनाईं. इस बार के लोकसभा चुनाव में क्या होगा, ये कहना अभी मुश्किल है. लेकिन 2014 में केवल 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी को इस बार इससे कहीं बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















