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विपक्षी दलों का महागठबंधन: ये रिश्ता क्या कहलाता है?
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, इसकी झलक कोलकाता में शनिवार को एक बार फिर दिखी.
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नेता ममता बैनर्जी के निमंत्रण पर जुटे विपक्षी दलों के नेताओं ने एक सुर में कहा कि वे "मोदी से देश को बचाने के लिए एकजुट" हुए हैं, लेकिन ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि यह गठबंधन नहीं, कुछ और ही है.
यह गठबंधन इसलिए नहीं है क्योंकि ज़्यादातर राज्यों में ये दल मिलकर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन इसे नाम दिया जा रहा है महागठबंधन का. यह दरअसल उन क्षेत्रीय दलों का एक समूह है जो 2019 में बीजेपी को बहुमत न मिलने की हालत में साझा सरकार बनाने की जुगत में है, यानी अगर कोई गठबंधन हुआ तो वो चुनाव नतीजे आने के बाद होगा.
'जिसकी जितनी ताकत, सत्ता में उसकी उतनी हिस्सेदारी' के हिसाब से 2019 नतीजे आने के बाद बीजेपी विरोधी सरकार बनाने की कोशिश होगी, तो ऐसे में मिलकर लड़ने के लिए सीटों के बँटवारे का समझौता कैसे हो पाएगा, कोई भी पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है.
भारत ने बहुत सारे विचित्र गठबंधन देखे हैं लेकिन यह एक हाइब्रिड अलायंस है जिसका कोई नेता तो दूर, संयोजक भी नहीं है. सभी इस उम्मीद पर चुनाव लड़ रहे हैं कि वे किंग या किंगमेकर बनेंगे. असली राजनीति तो अभी शुरू ही नहीं हुई है.
मंच पर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खड़े बीजेपी विरोधी नेता एकता की तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनके आपसी टकराव, मनमुटाव और राजनीतिक होड़ की कहानियां किसी से छिपी नहीं हैं.
अगर बीजेपी के ख़िलाफ़ कोई सच्ची एकता होती तो हर संसदीय सीट पर बीजेपी के ख़िलाफ़ एक साझा उम्मीदवार उतारने का साहसिक फ़ैसला किया गया होता.
जहां इस अभूतपूर्व कही जा रही एकता का प्रदर्शन हुआ, वहीं से देखना शुरू करिए. यह कैसी 'मोदी विरोधी एकता' है जिसमें वामपंथी शामिल नहीं हैं, बंगाल में दशकों तक कम्युनिस्टों का राज रहा, लेकिन उनके लिए तय करना संभव नहीं हो पा रहा कि उनका बड़ा सियासी दुश्मन तृणमूल है या बीजेपी. यही वजह है कि वामपंथी 'यूनाइटेड इंडिया' में शामिल नहीं हुए.
42 संसदीय सीटों वाले पश्चिम बंगाल में जहां बीजेपी लगातार अपने पैर पसारने की कोशिश में जुटी है, लगभग तय है कि मुकाबला सीधा नहीं, बल्कि चौतरफ़ा होगा, लगभग इसलिए कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों या टीएमसी और कांग्रेस के बीच शायद कोई तालमेल हो जाए, मगर ऐसी कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही है.
इसी तरह केरल में कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच किसी समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है, दोनों के बीच हमेशा से सीधी टक्कर होती रही है और अब बीजेपी वहां पैठ बनाने की कोशिश कर रही है.
ममता बैनर्जी के इस आयोजन को लोग प्रधानमंत्री पद की उनकी संभावित दावेदारी से जोड़कर देख रहे हैं. हाथ से हाथ मिलाकर खिंचाई गई तस्वीर में दो चेहरे नहीं दिखे, मायावती और राहुल गांधी, क्योंकि दोनों बीजेपी विरोधी गठबंधन की सरकार बनने की हालत में पीएम पद की उम्मीद लगाए बैठे हैं.
कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी ने अपने प्रतिनिधियों को भेजा ज़रूर था लेकिन शीर्ष नेताओं की ग़ैर-मौजूदगी के सियासी मायने हैं.
कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में भी विपक्षी दलों ने ग़ज़ब की एकता दिखाई थी, मायावती और सोनिया ने कैसे गलबहियां डालकर फोटो खिंचाई थी, लेकिन उत्तर प्रदेश में सीटों के बँटवारे के मामले में वह एकता लापता हो गई, कांग्रेस सपा-बसपा के गठबंधन से बाहर है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यूनाइटेड इंडिया के मंच पर मौजूद थे. दो ही दिन पहले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच किसी तरह के गठबंधन की संभावना खत्म हो गई थी, जब दोनों पार्टियों ने इससे साफ़ इनकार कर दिया. ऐसा ही पंजाब और हरियाणा में भी होगा, जहां कांग्रेस और आप साथ आ सकते थे, लेकिन नहीं आएंगे.
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कुल मिलाकर 42 संसदीय सीटें हैं, तेलंगाना का विधानसभा चुनाव कांग्रेस और तेलुगु देसम (टीडीपी) मिलकर लड़े थे और बुरी तरह हारे थे. लोकसभा चुनाव में सीटों के बँटवारे का कोई समझौता इन दोनों राज्यों में होता नहीं दिख रहा.
ममता बैनर्जी के मंच पर टीडीपी के नेता चंद्रबाबू नायडू तो थे, लेकिन विपक्षी एकता के एजेंडे के साथ ममता से कई बार मुलाकात कर चुके तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता चंद्रशेखर राव इस आयोजन से दूर ही रहे.
विपक्षी एकता की बात हवा-हवाई है, इसे आप 20 संसदीय सीटों वाले राज्य ओडिशा से भी समझ सकते हैं जहां कांग्रेस और बीजू जनता दल (बीजेडी) अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे.
बीजेपी ने राज्य में काफ़ी ताकत झोंक रखी है, अगर बीजेपी को सचमुच रोकने की मंशा होती तो कांग्रेस-बीजेडी के बीच तालमेल हो सकता था लेकिन ऐसा नहीं हो रहा.
बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन का हाल
वैसे एनडीए का हाल भी देखने लायक है. टीडीपी ने स्पेशल स्टेटस के नाम पर गठबंधन छोड़ा, और अब जिसे विपक्षी गठबंधन कहा जा रहा है उसका हिस्सा बन चुका है.
नागरिकता कानून पर मचे बवाल के बाद असम गण परिषद (एजीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया है, गठबंधन के साझीदार जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने न सिर्फ़ इस कानून के ख़िलाफ़ वोट दिया, अब पार्टी अपने प्रतिनिधियों को बीजेपी विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए भेज रही है.
शिवसेना के उद्धव ठाकरे और संजय राउत हर रोज़ मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ विपक्ष से भी ज़्यादा कड़वी भाषा बोल रहे हैं.
इसी तरह उत्तर प्रदेश की छोटी पार्टियों ने भी बीजेपी से अपनी नाराज़गी छिपानी छोड़ दी है और खुलकर अपनी उपेक्षा की बात कह रहे हैं.
तो कुल मिलाकर, असल बात यही है कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है, सियासी फ़ायदा या ख़तरा ही असली चीज़ है जिस पर हर नेता की नज़र है.
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