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रफ़ाल सौदा: 'राहुल गांधी की आक्रामकता तो ठीक है, पर नए तथ्यों का अभाव है'-नज़रिया
- Author, शेखर अय्यर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
जब से राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली है, उनके पास संसद में स्वयं पर गर्व करने के उचित कारण हैं. क्योंकि उनके नेतृत्व में हाल में विधानसभा चुनाव में हिन्दी भाषी राज्यों में बीजेपी को सत्ता से बाहर का रास्ता देखना पड़ा है.
इस जीत से उनके उस आत्मविश्वास में इज़ाफ़ा हुआ है, जिससे वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लोकसभा में सत्ता से हटा सकें और कांग्रेस को सत्ता के करीब ला सकें.
इस आत्मविश्वास ने राहुल में एक नए प्रकार की आक्रामकता को भी जन्म दिया है.
वो जानते हैं (और हर किसी को साबित किया है) कि उन्हें "पप्पू" कहकर हल्के में नहीं लिया जा सकता.
अब वो वर्तमान सरकार से लोहा लेने के लिए विपक्ष की अगुवाई करने वालों में सबसे पसंदीदा नेता बन गए हैं.
रफ़ाल सौदा और राहुल की रणनीति
राहुल की रणनीति में कुछ भी ग़लत नहीं, सिवाय इसके कि जैसा कुछ लोगों का मानना है कि मोदी पर निशाना साधने में वो अक्सर निन्दनीय अभियान चलाते हैं, बजाय सच्चाई को तथ्यों के साथ बखान करने के.
आप जन सभाओं में बड़ी-बड़ी बातें और मिथ्यारोपण कर सकते हैं. लेकिन अगर आपको लम्बे समय तक गंभीरता के साथ नेतृत्व करना है, तो आपको सदन पटल पर अपने विरोधियों को मात देने की विधा आनी चाहिए.
दुर्भाग्यवश, राहुल इस अवसर का इस्तेमाल नहीं कर पाए.
राफ़ाल सौदे पर मोदी के ख़िलाफ़ बिना कोई नया तथ्य प्रस्तुत किये, राहुल संसद पटल का इस्तेमाल उन्हें सिर्फ़ भ्रष्ट, घृणित, तानाशाह साबित करने और नीचा दिखाने की कोशिश करने के लिए कर रहे हैं.
यहां तक कि गोवा के एक मंत्री का ऑडियो टेप सुनाने की उनकी कोशिश भी एक निम्न स्तरीय सबूत बनकर रह गई, जिसमें दावा किया गया था कि रफ़ाल सौदे पर मोदी को मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ब्लैकमेल कर रहे हैं. (जब लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उनसे टेप की विश्वसनीयता साबित करने के लिए कहा तो वो बैठ गए.)
राहुल का ये रवैया उनके प्रशंसकों को उत्साहित कर सकता है या मीडिया में वैसी ही बड़ी सुर्खी बन सकता है, जैसा पिछले साल जुलाई में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बहस के बाद मोदी को आलिंगन करना और फिर आंख मारकर बदनामी मोल लेना.
लेकिन भारत का प्रधानमंत्री बनने की चाहत रखने वाले एक नेता के लिए ये अच्छी बात नहीं है. राहुल संसदीय नियमों को ताक पर नहीं रख सकते, अगर वो चाहते हैं कि संसदीय इतिहास में वो अपनी छाप छोड़ें, जैसा उनकी दादी इन्दिरा गांधी और परनाना जवाहर लाल नेहरू ने किया.
क्यों चुभती हैं राहुल की बातें?
सरकार को ओछा दिखाने के लिए कोई भी छोटा रास्ता अख्तियार करना राहुल या कांग्रेस की मदद नहीं करेगा, अगर वो इस बात के पुख्ता सबूत पेश नहीं करते कि मोदी या उनकी सरकार ने वित्तीय लाभ के लिए ये कदम उठाया था.
राहुल के सामने बड़ी समस्या ये है कि भारतीय वायु सेना को रफ़ाल लड़ाकू विमानों के दो स्क्वॉड्रन उपलब्ध कराने और इसकी फ्लीट को पूरी तरह आधुनिक बनाने के मोदी सरकार के कदम में सुप्रीम कोर्ट को कोई दोष नज़र नहीं आया.
ये मानना बेहद मुश्किल है कि राहुल के पास कुछ नया हथियार है, जब तक वो कोई नया तथ्य या सबूत पेश नहीं करते.
अब तक राहुल गांधी ने रफ़ाल मुद्दे पर सिर्फ़ व्याख्यान का सहारा लिया है, जिसमें प्रधानमंत्री को घृणित अभियान चलाने वाला 'चोर' कहा है. इस भाषा ने संसद की गरिमा की तमाम परम्पराओं को तोड़ दिया है.
हालांकि अगर उनके व्याख्यान में पुख्ता तथ्यों का समावेश होता तो शायद ये बात अधिक नहीं चुभती.
हाल ही में हमने देखा कि राहुल लगातार रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री, दसौ के सीईओ और यहां तक कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों को झूठा बताते रहे.
उन्होंने यहां तक कि वायु सेना प्रमुख को भी झूठा बताने के लिए कांग्रेस को उत्प्रेरित किया, और रफ़ाल पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की भी आलोचना की, क्योंकि ये उनके मनमुताबिक नहीं था. संक्षेप में कहा जाए तो ऐसा लगा कि कांग्रेस अध्यक्ष के सिवाय रफ़ाल मुद्दे पर हर कोई झूठ बोल रहा था.
सबसे बुरा नज़ारा उस वक्त था, जब वित्त मंत्री अरुण जेटली राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दे रहे थे. उस वक्त कांग्रेस नेता सदन में कागज के बने विमान उड़ा रहा थे, जिसे लोकसभा अध्यक्ष को गंभीरता से लेना पड़ा. एक गंभीर मुद्दे पर बहस की विपक्ष की मांग कॉलेज की कक्षा जैसा मज़ाक नहीं बन सकता.
राहुल को उस पत्रकार की आलोचना से भी बचना चाहिए था, जिन्होंने हाल में मोदी का साक्षात्कार किया था.
राहुल इंटरव्यू की आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन साक्षात्कार लेने वाले की मंशा और पेशेवर काबिलियत पर सवाल खड़ा करना लोकतंत्र की मर्यादा के अनुरूप नहीं है.
यह निश्चित तौर पर ये नहीं दिखाता कि वो प्रेस का सम्मान करते हैं. इसका अर्थ यही होगा कि राहुल भी वैसे ही तानाशाह हैं, जिन, जिनपर वो पत्रकारिता के असम्मान का आरोप लगाते रहे हैं, अगर प्रेस उनका पक्ष नहीं लेता.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व सीनियर एसोसिएट एडिटर और डेक्कन हेरल्ड के पूर्व राजनीतिक संपादक हैं)
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