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कर्नाटक: ऑपरेशन लोटस से कैसे लड़ेगी कांग्रेस-जेडीएस
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन वाली सरकार से दो विधायकों के समर्थन वापस लेने के बाद बीजेपी ने राज्य में अपनी सरकार बनाने के लिए कोशिशें तेज कर दी हैं.
बीजेपी ने एक बार फिर ये दावा करना शुरू कर दिया है कि अब जल्द ही कुछ और विधायक भी इसी तर्ज पर अपना समर्थन वापस लेकर बीजेपी के नेतृत्व में नई सरकार बनाने में सहयोग करेंगे.
हालांकि कांग्रेस पार्टी इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नज़र बनाए हुए है.
वहीं बीजेपी ने भी अपने विधायकों को हरियाणा के गुरुग्राम में एक रिसॉर्ट में रखा हुआ है ताकि उन्हें कांग्रेस और जेडीएस के प्रलोभन में आने से बचाया जा सके.
लेकिन कर्नाटक के पल पल बदलते राजनीतिक हालात में इंतज़ार कांग्रेस और जेडीएस के उन 14 विधायकों का है जो मुंबई में पहले से मौजूद पांच अन्य विधायकों के पास जा सकते हैं.
अगर ये विधायक कर्नाटक विधानसभा में अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं तो राज्य सरकार के लिए कैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं? इस सवाल के जवाब को समझने के लिए कर्नाटक में सभी पार्टियों का चुनावी गणित समझना जरूरी है.
अगर विधायकों की संख्या की बात करें तो जेडीएस (एक बसपा की सीट) के पास 38, कांग्रेस के पास 80, बीजेपी के पास 104 और 2 सीटें खाली पड़ी हुई हैं.
ऐसे में तीन स्थितियां बनती हैं जो कि इस प्रकार हैं:
पहली स्थिति क्या होगी?
अगर इन 14 विधायकों समेत मुंबई में आराम फरमा रहे पांच विधायक कर्नाटक विधानसभा में अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं तो 222 विधायकों वाली विधानसभा में विधायकों की संख्या 203 तक पहुंच जाएगी.
इसके बाद बीजेपी दो निर्दलीय विधायकों के समर्थन के साथ राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है.
इसके बाद राज्यपाल विधानसभा में फ़्लोर टेस्ट कर सकते हैं. अगर फ़्लोर टेस्ट में बीजेपी की जीत होती है तो वह सरकार बना सकती है.
दूसरी स्थिति क्या होगी?
बीजेपी की ओर से सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद राज्यपाल विधानसभा में विधायकों की संख्या को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए फ़्लोर टेस्ट कर सकते हैं.
इसके बाद विधानसभा स्पीकर फ़्लोर टेस्ट में शामिल नहीं होने वाले विधायकों को अयोग्य साबित कर सकते हैं. फिर राज्यपाल विधानसभा को निलंबित भी कर सकते हैं.
क्या होगी तीसरी स्थिति?
अगर 18 या 19 विधायक इस्तीफ़ा देते हैं तो स्पीकर अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करके ये तय कर सकता है कि ये इस्तीफ़े ज़रूरी कारणों की वजह से दिए जा रहे हैं या किसी लालचवश दिए गए हैं.
इसके बाद राज्यपाल इस्तीफ़ों पर विचार करने की जगह विधानसभा में स्थिति जस की तस बनाए रख सकते हैं.
सरल शब्दों में कहें तो विधायकों के इस्तीफ़ा देने की स्थिति में विधानसभा स्पीकर रमेश कुमार लाइमलाइट में रहेंगे.
बीजेपी सभी कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही है क्योंकि उनका सामना रमेश कुमार जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ से है.
जेडीएस-कांग्रेस और बीजेपी कैंप का माहौल
कांग्रेस और जेडीएस के विधायक, जिनमें मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी भी शामिल हैं, अपनी सरकार गिरने की आशंका से बेफिक्र नज़र आते हैं.
लेकिन इन दोनों पार्टियों के गठबंधन वाली सरकार के सहयोगियों ने किसी संभावित नुकसान को रोकने के लिए काम करना शुरू कर दिया है और सभी विधायकों को बेंगलुरु में बुधवार-गुरुवार तक पहुंचने के लिए कहा गया है.
कुमारस्वामी ने अपने विभागों की समीक्षा के लिए आयोजित एक बैठक में भाग लेने के बाद बीबीसी हिंदी से विस्तार से बात की.
उन्होंने बताया, "बीजेपी नेताओं की मेरी सरकार गिराने की कोशिशें असफल हो चुकी हैं. ये जानकारी मेरे पास मौजूद है लेकिन वे अभी भी हमारे विधायकों को धन देने की पेशकश कर रहे हैं. लेकिन अंत में बीजेपी सबके सामने एक्सपोज़ हो जाएगी कि वह गैर-बीजेपी सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश कर रही थी."
कुमारस्वामी कहते हैं, "बीजेपी नेता स्थानीय मीडिया को ग़लत ख़बरें देकर उन्हें बेवकूफ़ साबित कर रहे हैं. अब तक धारावाहिकों के लिए हमारे पास मनोरंजन चैनल थे. लेकिन अब हम न्यूज़ चैनलों पर राजनीतिक धारावाहिक देख रहे हैं."
कांग्रेस की बात करें तो पूर्व मुख्यमंत्री और विधायक दल के नेता सिद्धारमैया चिकमंगलुरु की यात्रा पर निकल चुके हैं.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक़, उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ आगे की रणनीति को लेकर लंबी बैठक की है.
इसके साथ ही उन्होंने आगामी 18 जनवरी को भी विधायकों की एक बैठक बुलाई है.
लेकिन कांग्रेस पार्टी के संकटमोचक माने जाने वाले नेता और जल संसाधन मंत्री डीके शिव कुमार इस दौरान महाराष्ट्र के औरंगाबाद में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा आयोजित कॉन्फ्रेंस में भाग लेने गए हैं.
शिवकुमार वह नेता हैं जो विधायकों को बीजेपी के प्रलोभनों से बचाने के लिए रिसोर्ट्स और धार्मिक यात्राओं पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं.
शिवकुमार ही वह व्यक्ति हैं जो बेंगलुरु के बाहरी इलाके में एक रिसोर्ट में गुजरात के विधायकों को लेकर गए थे और आयकर विभाग ने भी उन पर छापा मारा था.
बीते साल मई में जब बीजेपी कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही थी तो उन्होंने ही जेडीएस और कांग्रेस के विधायकों को हैदराबाद में अपने साथ रखा था.
कर्नाटक में बीजेपी प्रवक्ता डॉ. वर्मन आचार्य से जब बीबीसी ने बात की तो उन्होंने बताया, "तथ्य यह है कि जिस तरह से सरकार चलाई जा रही है, उससे सत्ताधारी गठबंधन के तमाम विधायक नाराज़ हैं. मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कहा है कि बीजेपी के पांच से छह विधायक उनके संपर्क में हैं. इसका मतलब ये है कि उनकी पार्टी में आंतरिक समस्याएं हैं और उनकी पार्टी ही बीजेपी विधायकों को अपनी ओर लाना चाहती है."
आचार्य कहते हैं, "एक बार इस गठबंधन की आंतरिक समस्याएं सुलझ जाएं तो उसके बाद हमें जो करना है वो हम करेंगे. और तब तक विधायक गुरुग्राम में ही रहेंगे."
बीजेपी सदस्य उन मीडिया रिपोर्ट्स की ओर भी इशारा करते हैं जिनमें प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा के बयान को शामिल किया गया है.
इन रिपोर्ट्स में लिखा गया है कि गुरुग्राम में मौजूद विधायकों से येदियुरप्पा ने "जल्द ही अच्छी ख़बर आने की बात" कही है.
बीजेपी के एक नेता ने नाम न लेने की शर्त पर बताया, "हम इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों की संख्या 20 के क़रीब पहुंच जाए. इसके बाद हम वह कदम उठाएंगे जो हमारे लिए मुफीद होगा."
लेकिन निजी बातचीत में नाम न बताने की शर्त पर कुछ नेता कहते हैं कि बीजेपी में इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि कांग्रेस और जेडीएस विधायकों के इस्तीफ़ा देने से जुड़ी राजनीतिक हलचल "केंद्रीय नेतृत्व की ओर से मजबूत संकेत पर हो रही है. नहीं तो ये सब अभी नहीं हो रहा होता."
जेडीएस-कांग्रेस सरकार को गिराने का फ़ायदा?
ऑपरेशन लोटस 3.0 के तहत राज्य सरकार गिराने की कोशिशों की वजह ये है कि अगर जेडीएस और कांग्रेस का गठबंधन जारी रहता है तो इससे कर्नाटक की लोकसभा सीटों के चुनाव पर इसका असर पड़ेगा.
एक बीजेपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, "कर्नाटक की 28 में से 17 सीटें इस समय बीजेपी के पास हैं. जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन होने की वजह से अगले चुनाव में बीजेपी 11 सीटें पर सिमट सकती है. ऐसे में अमित शाह ने कर्नाटक की 28 में से 20 लोकसभा सीटों को जीतने का लक्ष्य बनाया है."
कर्नाटक के दक्षिणी हिस्से में कई सीटें ऐसी हैं जिन्हें जेडीएस का गढ़ कहा जाता है और केंद्रीय कर्नाटक के पड़ोसी ज़िलों में जेडीएस को कुछ समर्थन हासिल हैं.
लेकिन अब तक बीजेपी ये सीटें जीतती आई है क्योंकि जेडीएस और कांग्रेस की बीच संघर्ष की वजह से बीजेपी को फायदा मिलता रहा है.
ये वही स्थिति है जिसकी वजह से बीजेपी उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतती है. क्योंकि वहां भी मत समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में बंट जाते हैं.
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