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राहुल गाँधी, आपकी सिर्फ़ एक 'लाइफ़ लाइन' बची है
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर
अब इससे ज़्यादा क्या कर लेते राहुल गाँधी? घूम घूम कर अलख जगाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे-सीधे चुनौती दी. काँग्रेस के रणनीतिकारों ने एक-एक विधानसभा सीट के लिए पुख़्ता रणनीति बनाई. पूरे कर्नाटक को अलग-अलग क्षेत्रों में बाँटकर पार्टी कार्यकर्ता बूथ स्तर तक पहुँचे. वोटरों के नाम-पते और फ़ोन नंबर तक लिए.
'गर्वी गुजरात' की तरह 'कन्नड़िगा स्वाभिमान' को जगाने के लिए दो महीने पहले ही यानी मार्च में राज्य का अलग शासकीय झंडा तय किया गया. लिंगायत समुदाय को हिंदू धर्म से अलग अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर मान्यता दी.
यानी अमित शाह की भारी चुनाव-मशीनरी का मुक़ाबला करने के लिए काँग्रेस ने पूरी तैयारी की थी. मगर फिर भी हार गए.
हारना राहुल गाँधी के लिए कोई नया अनुभव नहीं है. अब तक उनके सीने पर हार के कई तमग़े टँग चुके हैं पर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर ये उनकी पहली हार है.
कर्नाटक में काँग्रेस की हार से एक बात स्पष्ट हो गई है कि भारतीय जनता पार्टी और समूचे संघ परिवार ने पिछले 25 बरस में देश भर में जो बहस खड़ी की है, काँग्रेस अब तक उसका जवाब नहीं ढूँढ पाई है.
भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रचार तंत्र के बल पर लगभग सभी विरोधी पार्टियों को हिंदू-विरोधी सिद्ध करने में सफलता हासिल कर ली है. अब राजनीति के हिंदू रंग को स्वीकार करना काँग्रेस और तृणमूल काँग्रेस जैसी पार्टियों की मजबूरी हो गई है.
भारतीय जनता पार्टी और उसके शुभंकर नरेंद्र मोदी इस देश की जनता को ये भी समझाने में कामयाब हो गए हैं कि देश की सबसे पुरानी पार्टी को एक परिवार ने बंधक बना रखा है. इसका असर ये हुआ है कि जब जब आप और हम जैसे आम लोग टेलीविज़न के परदे पर राहुल गाँधी को देखते हैं तो सबसे पहले ज़ेहन में सवाल उठता है - ये आदमी यहाँ है क्यों?
किस अधिकार से राहुल पीएम बनने के सपने देख रहे हैं?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नरेंद्र मोदी जैसे प्रचारक से उनकी तुलना करना ही बेमानी है क्योंकि प्रचारक के तौर पर संघ के अधिकारी अगर मोदी को उड़ीसा के जंगलों में वनवासी कल्याण आश्रम का काम सँभालने के लिए भेजने का फ़ैसला करते तो वो आज भी बोलांगीर और कंधमाल की किसी झोपड़ी में रह रहे होते. विद्या भारती और संस्कार भारती में शायद वो मिसफ़िट होते.
नरेंद्र मोदी से मेरी पहली मुलाक़ात अहमदाबाद के बीजेपी कार्यालय में हुई थी जब उनकी हैसियत एक 'स्थानीय नेता' से ज़्यादा की नहीं थी. ये बीजेपी महासचिव के तौर पर नरेंद्र मोदी की दिल्ली में तैनाती से भी पहले की बात है. तब गुजरात में काँग्रेस का बोलबाला था और मोदी ने मुझे एक घंटे तक तसल्ली से काँग्रेस की खाम राजनीति के पेंच समझाए थे. तब अगर नरेंद्र मोदी से पूछा जाता कि क्या आप प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हैं तो शायद संघ का ये स्वयंसेवक ठठाकर हँस पड़ता.
इसलिए नरेंद्र मोदी को छोड़िए, राहुल गाँधी पर लौटते हैं. उन्होंने राजनीति का ककहरा कहाँ सीखा? दिल्ली के इलीट सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज में पढ़ते वक़्त उन्होंने कितनी छात्र राजनीति की? क्या उन्होंने कभी छात्रों के मुद्दों पर अनशन किया, जुलूस-धरने में हिस्सा लिया? कितनी बार उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति का घेराव किया?
क्या राहुल गाँधी ने किसी ट्रेड यूनियन के दफ़्तर की देहरी भी देखी है? उन्हीं की पार्टी के पी रंगराजन कुमारमंगलम जैसे नेता दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे, ट्रेड यूनियन में सक्रिय रहे, सांसद और मंत्री बनने के बाद भी मज़दूरों के आंदोलनों से जुड़े रहे. कुमारमंगलम बाद में बीजेपी चले गए थे और उनकी असमय मौत हो गई.
बड़े नामों को छोड़ भी दें तो दिल्ली काँग्रेस के अजय माकन जैसे नेता ने विश्वविद्यालय परिसर से राजनीति सीखनी शुरू की. छात्र संघ के अध्यक्ष रहे, फिर डीटीसी कर्मचारी यूनियन में सक्रिय रहे, मज़दूरों के मुद्दों पर सफल-असफल हड़तालें आयोजित कीं. कार्यकर्ताओं से गर्भनाल का संबंध बनाया.
राहुल गाँधी ने क्या किया?
जो आदमी कभी न छात्र राजनीति में सक्रिय दिखाई दिया, न मज़दूरों के आंदोलन में, न सरकारी कर्मचारियों से जिसका संपर्क रहा और न किसान-आदिवासियों से, वही अचानक एक दिन उत्तर प्रदेश में एक दलित की चारपाई में जाकर बैठ जाता है.
किसे यक़ीन होगा कि बबुआ ज़मीन से जुड़ गए हैं?
या फिर जब मायावती की सरकार दिल्ली के पास अपनी ज़मीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे किसानों पर गोली चलवाती हैं तो राहुल गाँधी सवेरे पाँच बजे मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर पुलिस वालों को धता बताते हुए दिल्ली के पास भट्टा-पारसौल के किसानों की मिज़ाजपुर्सी करने पहुँच जाते हैं.
उन्हें और उनके योजनाकारों को ये भरोसा रहा होगा कि भट्टा-पारसौल घटना के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की नज़र में राहुल गाँधी का ओहदा चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल के बराबर हो जाएगा?
राहुल गाँधी की राजनीति का ये नख-शिख वर्णन कर्नाटक में काँग्रेस के हार के बहाने नहीं किया जा रहा है. कर्नाटक में काँग्रेस की हार उस सतत प्रक्रिया का हिस्सा है जिसकी गारंटी राहुल गाँधी ख़ुद हैं. अगर कहीं काँग्रेस जीतती है तो राहुल गाँधी के कारण नहीं बल्कि उनके बावजूद जीतती है.
अब भी काँग्रेस पार्टी के पास एक लाइफ़ लाइन बची हुई हैं, वो है- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव. इन दोनों राज्यों के बारे में कहा जाने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी यहाँ अपने खोदे हुए गड्ढे में गिरेगी. और अगर यहाँ बीजेपी को बचा सकता है तो सिर्फ़ एक तुरप का पत्ता - नरेंद्र मोदी. अगर ये लाइफ़ लाइन भी अगर काँग्रेस ने गवाँ दी तो फिर काँग्रेस का और राहुल गाँधी का निस्तार नहीं है.
इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले कहा था कि काँग्रेस तभी बच पाएगी जब वो "परिवार" को छोड़कर आगे बढ़ जाए, वरना परिवार सहित डूब जाएगी.
आज कर्नाटक चुनावों के रुझान आने के बाद उन्होंने फिर से सवाल किया है - क्या कोई काँग्रेसी नेता राहुल गाँधी से सीधा सवाल करेगा?
क्या काँग्रेस के नेता को समझेंगे कि अब राहुल गाँधी से सीधे सवाल करने का वक़्त आ गया है.
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