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ज़ीरो नहीं, ये हैं असली हीरो
- Author, जान्हवी मुले
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी
"ज़िंदग़ी काटनी किसे थी, हमें तो जीनी थी."
शाहरुख़ ख़ान की नई फ़िल्म 'ज़ीरो' का ये डायलॉग आपके ज़हन में रह जाता है.
शाहरुख़ ख़ान इस फ़िल्म में 'बऊआ सिंह' नाम के एक बौने शख़्स का किरदार निभा रहे हैं.
लेकिन फ़िल्म में जो कुछ दिखाया गया है, क्या असल ज़िंदग़ी में भी वैसा ही होता है?
छोटे क़द की वजह से पेश आई कठिनाइयों से लड़कर कुछ लोग करियर में नई ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं. बीबीसी ने कुछ ऐसे ही प्रेरक लोगों से बात की.
महेश जाधव, अभिनेता
फ़िल्म और टीवी इंडस्ट्री में छोटे क़द के लोगों को कॉमेडी करते हुए, जोकर के तौर पर या दूसरे साधारण किरदार में ही देखा जाता है.
उनके कम कद का मज़ाक बनाया जाना और उनकी उपेक्षा होना आम बात है.
लेकिन महेश जाधव ने हमेशा से ही अलग-अलग तरह के रोल किए, इसके लिए वो खुद को खुशकिस्मत मानते हैं.
ज़ी मराठी के टीवी शो 'लागिरं झालं जी' में उन्होंने 'टैलेंट' का किरदार निभाया है. इस शो में वो खलनायक के मुख्य सहयोगी हैं, इसलिए शो का वो अहम किरदार हैं.
महेश को लगता है कि अगर मीडिया उनके जैसे लोगों को दिखाने का तरीका बदले तो आम लोगों की सोच में भी बदलाव आएगा.
महेश बताते हैं, "परिवार में सिर्फ मैं ही था, जिसका क़द कम रह गया. जन्म के आठ महीने बाद ही मेरे पिता का देहांत हो गया था. सबसे पहले मेरी मां को ही महसूस हुआ था कि मेरे शरीर का विकास नहीं हो पा रहा है. वो मुझे डॉक्टर के पास लेकर गईं. डॉक्टरों ने कहा कि इसका क़द और नहीं बढ़ेगा, लेकिन बाकी सब सामान्य रहेगा."
"जब मैं पांचवीं-छठी कक्षा में पहुंचा, तो मुझे महसूस हुआ कि मेरे पैर दूसरों से छोटे हैं. मुझे ख़ुद पर बहुत ग़ुस्सा आता था. मैं दूसरे बच्चों को देखकर सोचता था कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? भगवान ने मुझे ही कम क़द का क्यों बनाया? मैं किसी सार्वजनिक समारोह, शादियों और पारिवारिक समारोह में नहीं जाता था क्योंकि वहां लोग मेरा मज़ाक उड़ाते थे और मुझे छेड़ते थे."
"मुझे बहुत बुरा लगता था. मैं ख़ुद से परेशान हो गया था. लेकिन मैंने कभी एक शब्द तक नहीं कहा. मैं हमेशा अपने छोटे क़द के बारे में ही सोचता रहता था. मैंने अपना आत्मविश्वास खो दिया था. मेरा पूरा बचपन इसी तरह बीता."
"12वीं के बाद मैंने फलटण के एक कॉलेज में बी कॉम में एडमिशन ले लिया. वहां मैं सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगा."
महेश बताते हैं, "एक बार मैंने एक नाटक में हिस्सा लिया. उससे मुझमें आत्मविश्वास जगा. मुझे लगा कि मैं भी कुछ कर सकता हूं, कुछ बन सकता हूं. कॉलेज के आखिरी साल यानी 2014 में मैं कॉलेज का कल्चरल सेक्रेट्री बन गया. इसके बाद से मेरे टीवी करियर की शुरुआत हुई."
"जो लोग पहले मुझे भगा दिया करते थे, वो आज गर्व से कहते हैं कि मैं उनके गांव का हूं या रिश्तेदार हूं."
"वो मुझे 'बुटक्या' (बौने का मराठी शब्द) कहा करते थे. लेकिन कॉलेज में मुझे लगा कि भगवान ने मुझे कम क़द दिया, यानी उन्होंने इसके बदले में मुझे कुछ और दिया होगा. मैंने इस पर एक शॉर्ट फ़िल्म 'क्वार्टर' बनाई, जिसे फ़िल्म फेस्ट में काफी पसंद किया गया."
"हमें कॉमेडियन या जोकर के रोल दिए जाते हैं. मैंने भी ऐसे रोल किए हैं. लेकिन हमारे तेजपाल सर ने इस सोच को बदलने के लिए टैलेंट का किरदार बनाया. ये किरदार 'गेम ऑफ थ्रोन्स' के टिरियन लेनिस्टर जैसा गंभीर और अलग है."
"मैं भविष्य में भी ऐसे ही गंभीर रोल करना चाहता हूं. लोगों को लगता है कि हम सिर्फ कॉमेडी या हल्के-फुल्के रोल ही कर सकते हैं, मैं इस सोच को बदलना चाहता हूं."
रूही शिंगाडे, पैरा-एथलीट
मुंबई के पास स्थित नालासोपारा की रहने वाली रूही शिंगाडे ने कम क़द के बावजूद खेलों में बेहतरीन करियर बनाया है.
वो पैरा-स्पोर्ट्स में हिस्सा ले चुकी हैं और उन्होंने पावर लिफ्टिंग, एथलेटिक्स और बैडमिंटन में कई मेडल जीते हैं.
2013 में अमरीका में विश्व ड्वार्फ गेम्स हुए थे. इन खेलों में रूही ने पावर लिफ्टिंग में गोल्ड मेडल हासिल किया था. 2017 में यही खेल कनाडा में हुए जिसमें उन्हें चक्का फेंक में कांस्य पदक मिला था.
उन्होंने अपने जैसे कम क़द वाले लोगों को खेलों का प्रशिक्षण भी दिया है. वो कहती हैं कि जब से पैरालिंपिक्स को टीवी पर दिखाया जाने लगा है, तब से लोग अधिक संवेदनशील हो गए हैं.
रूही कहती हैं, "पहले मैं कहीं भी जाती थी तो लोग मुझे चिढ़ाते थे, मुझ पर हंसते थे. वो कहते थे, देखो ये लड़की कैसे चलती है, कैसे बोलती है. मुझे बहुत बुरा लगता था. मैं सोचती थी कि मैं ऐसी क्यों हूं और लोग मुझे ऐसी बाते क्यों कहते हैं?"
"लेकिन जबसे मैंने स्पोर्ट्स शुरू किया, चीज़ें बदल गईं. जब मैंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मेडल जीता था, तब शहर के लोगों ने मेरे स्वागत के लिए बहुत बड़ी रैली आयोजित की थी. अब मैं जहां भी जाती हूं, लोग मेरी तारीफ करते हैं, मुझे सम्मान देते हैं. अब मुझे अच्छा लगता है. इससे मुझे और बेहतर करने की हिम्मत मिलती है."
"जब किसी में कोई विकलांगता होती है तो लोग उनका मज़ाक उड़ाते हैं. वो हमें भगा देते हैं. योग्यता होने पर भी कई लोग हमें नौकरी पर नहीं रखते. हम वो सब कुछ कर सकते हैं जो एक सामान्य क़द का इंसान करता है."
"ये अच्छी बात है कि शाहरुख़ जैसा बड़ा अभिनेता हमारी तरह के इंसान का किरदार निभा रहा है. लेकिन अगर उस किरदार को ऐसा बनाया गया होगा, जिस पर लोग हंस रहे हैं तो मुझे दुख होगा. लेकिन अगर उनका किरदार सकारात्मक है तो ये बहुत अच्छी बात होगी. उम्मीद है कि इसमें दिखाया गया होगा कि हम कुछ भी कर सकते हैं."
घनश्याम दरवडे, वक्ता
दो साल पहले उनके भाषण का एक हिस्सा वायरल हो गया था. तब से घनश्याम दरवडे को 'छोटा पुढारी' या छोटा नेता के नाम से जाना जाता है.
घनश्याम की उम्र 15 साल है और वो महाराष्ट्र में अहमदनगर के श्रीगोंडा के रहने वाले हैं. उन्हें विभिन्न मंचों पर भाषण देने के लिए बुलाया जाता है.
वो ज़ोर देकर कहते हैं कि कम क़द किसी के करियर में बाधा नहीं बन सकता. वो कलेक्टर बनना चाहते हैं और समाज की भलाई के लिए काम करना चाहते हैं.
घनश्याम करते हैं, "जब भी गांव में मेरा किसी ने मज़ाक बनाया, मैं कभी परेशान नहीं हुआ. मेरी लंबाई कम है, इसलिए वो मुझे छेड़ते हैं. मैंने कभी ऐसे लोगों पर ध्यान ही नहीं दिया और हमेशा अपनी पढ़ाई और करियर पर ध्यान दिया."
घनश्याम बताते हैं, "अब वो कहते हैं कि भले ही तुम्हारा क़द कम है, लेकिन तुम्हारा सामान्य ज्ञान गज़ब का है, तुम इतना अच्छा कैसे बोल लेते हो?"
"लोग मुझे देखते हैं क्योंकि मेरा क़द कम है. वो कहते हैं कि देखो इसे, इसका क़द कम है लेकिन कितना शानदार बोलता है."
"मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मैं बौना हूं, क़द ही सब कुछ नहीं होता?"
निनाद हल्दणकर, डांसर
12 साल की उम्र से ही निनाद हल्दणकर आयोजनों और डांस शो के स्टार रहे हैं.
शुरू में लोग उनका मज़ाक बनाते थे, लेकिन उन्होंने कभी अपना मनोबल कम नहीं होने दिया.
पिछले 24 सालों में निनाद ने कई स्टेज शो किए. उन्होंने कल्याणजी आनंदजी और जॉनी लीवर समेत कई बड़े हिंदी और मराठी कलाकारों के साथ काम किया है. वो 15 से ज़्यादा बार विदेश में शो कर चुके हैं. भारत सरकार ने उनका एक शो पाकिस्तान के कराची में भी आयोजित करवाया था.
निनाद की शादी हो चुकी है और उनकी दो बेटियां भी हैं.
वो कहते हैं, "जब मैं स्टेज पर जाता हूं तो शुरू में लोग सोचते हैं कि ये क्या करेगा? लेकिन जब वो मेरा परफॉर्मेंस देखते हैं तो उन्हें खूब पसंद आता है. इससे मुझे बहुत खुशी मिलती है."
"पहले में कहीं अकेला नहीं जाता था, हर शो में मेरे पिता साथ जाते थे. लेकिन अब मैं हर जगह अकेला ही जाता हूं. हमें सब कुछ ख़ुद ही करना होता है. लोग एयरपोर्ट या बस में मदद भी करते हैं. हमें घर से निकलना होगा, अपने आप कुछ भी नहीं होता. अगर आपमें कोई प्रतिभा है तो उसे निखारिए. कॉमेडी भी करते हैं तो और अच्छा करने की कोशिश कीजिए."
"आज भी कई बार ऐसा होता है कि लोग मुझे घेर लेते हैं और परेशान करते हैं. लेकिन इन सब चीज़ों से घबराकर घर पर बैठ जाना तो कोई हल नहीं है."
"मुझे लगता है कि ज़ीरो फ़िल्म में शाहरुख़ का किरदार भी कुछ ऐसा ही है. वो दिखा देना चाहता है कि वो भी एक सामान्य ज़िंदग़ी जी सकता है."