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छत्तीसगढ़: भूपेश बघेल का यह फ़ैसला किसके लिए मुश्किल
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
रायपुर के अपने दफ़्तर में बैठे कांग्रेस नेता दौलत रोहड़ा की आवाज़ में खनक आ जाती है और वे कहते हैं-"वाह ! टीवी पर पट्टी चल रही है, झीरम घाटी मामले की एसआईटी जांच के लिए टीम बन गई है."
दौलत रोहड़ा उन थोड़े से लोगों में शामिल हैं, जो बस्तर की झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले में ज़िंदा बच गए थे.
25 मई 2013 को हुए इस सबसे बड़े माओवादी हमले में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं समेत 29 लोग मारे गए थे.
मारे जाने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला, प्रदेश के पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और कांग्रेस नेता योगेंद्र शर्मा शामिल थे.
मान लिया गया था कि कांग्रेस पार्टी के लिए राजनीतिक तौर पर इस हमले से उबरने में कई साल लग जाएंगे.
लेकिन कांग्रेस पार्टी फिर से एकजुट हुई और राज्य में विधानसभा की 90 में से 68 सीटों पर जीत हासिल करके सरकार बनाने में कामयाब रही.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शपथ लेने के बाद कुछ ही घंटों के भीतर 2013 में बस्तर की झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले की एसआईटी जांच कराने की घोषणा कर दी.
भूपेश बघेल कहते हैं, "हमारी पार्टी शुरू से कहती रही है कि यह हमला एक षड़यंत्र था और इस मामले में हमारे शहीद नेताओं को न्याय नहीं मिला. हम चाहते हैं कि इस हमले का सच दुनिया के सामने आए."
झीरम घाटी
केंद्रीय मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल के क़रीबी दौलत रोहड़ा से आप बात करें तो एक-एक घटनाक्रम वो इतनी बारिकी से बताते हैं, जैसे सब आज ही हुआ है.
कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार को हटाने के लिए परिवर्तन यात्रा निकाली थी.
25 मई 2013 की सुबह 10 बजे के आसपास यह यात्रा जगदलपुर से सुकमा के लिए निकली. विद्याचरण शुक्ल की गाड़ी में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल भी थे.
विद्याचरण शुक्ल ने हमेशा से माओवादियों के निशाने पर रहे महेंद्र कर्मा को भी अपनी गाड़ी में साथ आने के लिए कहा. लेकिन महेंद्र कर्मा सुरक्षा का हवाला दे कर दूसरी गाड़ी में चले गए.
सुकमा में सभा हुई और फिर सभी नेता खाना खाने के बाद तीन बजे के आसपास अगले पड़ाव के लिए निकले. विद्याचरण शुक्ल को खाना खाने में देर हुई, इसलिए उनकी गाड़ी दस-पंद्रह मिनट देर से निकली.
दरभा घाटी की ओर विद्याचरण शुक्ल की गाड़ी तेज़ गति से आगे बढ़ रही थी. ड्राइवर के बगल वाली सीट पर विद्याचरण बैठे थे. पीछे दौलत रोहड़ा, युवा कांग्रेसी निखिल द्विवेदी, रामअवतार देवांगन और सुरक्षा गार्ड प्रफुल्ल शुक्ला बैठे थे.
दूसरे नेताओं की गाड़ी के काफिले में शामिल होने की जल्दीबाजी में ड्राइवर ने गाड़ी की स्पीड जैसे ही तेज़ की, दरभा घाटी के पास गाड़ी पर ताबड़तोड़ चार फायरिंग हुई.
किसी की समझ में कुछ नहीं आया. लेकिन अनुभवी ड्राइवर ने गाड़ी नहीं रोकी. उसने चिल्लाते हुए कहा कि नक्सली हमला हो गया है.
दौलत रोहड़ा कहते हैं, "आगे यू टर्न था और हमारे लिए आगे जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. लेकिन हमें कहां मालूम था कि हम मौत के जबड़े में घुसने जा रहे हैं. हमारी गाड़ी मुश्किल से तीन-चार सौ मीटर आगे बढ़ी होगी तो हमने देखा कि वहां पूरा रास्ता जाम था. सारी गाड़ियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग हो रही थी. घने जंगलों की फिज़ा में सब तरफ़ बारूद की गंध भरी हुई थी. हम पूरी तरह से माओवादियों से घिर चुके थे."
रोहड़ा को याद है कि विद्याचरण शुक्ल ने सभी को अपनी-अपनी सीट को पीछे करके लेटने का निर्देश दिया. सभी दम साधे सिर पर मंडराती मौत को महसूस कर रहे थे. लेकिन विद्याचरण शुक्ल के सुरक्षा गार्ड प्रफुल्ल ने अपनी पिस्तौल निकाली और जिस ओर से फायरिंग हो रही थी, उधर जवाबी फायरिंग की.
पूरी गाड़ी को जगह-जगह गोलियों छेद रही थीं. तभी एक गोली अगली सीट पर बैठे विद्याचरण शुक्ल की पेट पर लगी और ख़ून का फव्वारा छूट गया. एक गोली पिछली सीट पर बैठे कांग्रेसी नेता को लगी और पिछली सीट पर बैठे सभी लोगों के चेहरे ख़ून से सन गए.
इस बीच सुरक्षा गार्ड प्रफुल्ल ने धीरे से गाड़ी के नीचे पहुंच कर पोजिशन ले ली थी. लेकिन विद्याचरण शुक्ल को फिर एक गोली लगी तो प्रफुल्ल भावुक हो गए.
दौलत रोहड़ा कहते हैं, "हमने फुसफुसाने वाली आवाज़ में उन्हें कहा कि प्रफुल्ल हौसला रखो. लेकिन प्रफुल्ल ने कहा कि मैं आप लोगों को बचा नहीं सका तो मेरे ज़िंदा रहने का क्या मतलब ! इसके बाद उन्होंने ख़ुद को गोली मार ली."
कोई दो घंटे तक चली गोलीबारी के बाद सैकड़ों की संख्या में हथियारबंद महिला और पुरुष माओवादियों ने कांग्रेसी नेताओं के इस काफिले को अपने घेरे में ले लिया.
विद्याचरण शुक्ल के ड्राइवर ने तेलुगू में माओवादियों से बात की और कहा कि वे व्यापारी हैं और इस हमले में फंस गए हैं. माओवादियों ने उनके कहे पर यक़ीन कर लिया.
निशाने पर महेंद्र कर्मा
माओवादी माओवादियों के खिलाफ़ सलवा जुड़ूम अभियान चलाने वाले महेंद्र कर्मा को तलाश रहे थे.
एक गाड़ी से छुप कर बैठे कर्मा को जब पता चला कि माओवादी उन्हें तलाश रहे हैं तो वे दोनों हाथ ऊपर उठा कर समर्पण वाली मुद्रा में बाहर निकले और चिल्लाते हुए कहा कि सारे लोगों को छोड़ दो, मैं महेंद्र कर्मा हूं.
माओवादी तेज़ी से उनकी ओर लपके और उन्हें अपने क़ब्ज़े में ले लिया. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और विधायक कवासी लखमा को भी अपने क़ब्ज़े में लिया और फिर सभी नेताओं को घाटी की दूसरी ओर लेकर चले गए.
इस माओवादी हमले में फंसे अंजय शुक्ला के अनुसार, "गोलियां चल रही थीं और मैं लगातार भगवान को याद कर रहा था. एक नेता मलकीत गेंदू अपने कोहनियों के सहारे हमारी गाड़ी के पास पहुंचे और उन्होंने कहा कि कर्मा जी ने समर्पण कर दिया है और हमें भी समर्पण कर देना चाहिए."
इसके बाद सभी लोग अपने हाथ उठा कर बाहर निकलने लगे. माओवादी सभी लोगों को घेर कर एक ओर ले कर चए गए, जहां सबको पेट के बल लेटने के निर्देश दिए गए. बगल में ही आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा की लाश पड़ी हुई थी, जिसे माओवादी संगिनों में लगे चाकुओं से गोद रहे थे.
बिलासपुर के कांग्रेस नेता डॉ. विवेक वाजपेयी भी उन 38 लोगों में शामिल थे, जिन्हें पेट के बल माओवादियों ने लेटने के निर्देश दिए थे.
लगभग घंटे भर बाद जब विवेक वाजपेयी ने अनुमान लगाया कि माओवादी इन्हें छोड़ कर जा चुके हैं तब वे हिम्मत करते हुए उठे और दूसरे लोगों को भी उठ कर सड़क पर आने के लिए कहा.
इसके थोड़ी देर बाद एक स्थानीय चैनल में कार्यरत पत्रकार नरेश मिश्रा वहां पहुंचे और उन्होंने घायलों की मदद की और इस बीच कोंटा के विधायक कवासी लखमा माओवादियों की चंगूल से छूट कर दरभा थाना तक पहुंचे.
रात सवा आठ बजे के आसपास पुलिस का एक दल बख्तरबंद गाड़ियों में वहां पहुंचा और फिर घायलों को अस्पताल तक ले जाने का सिलसिला शुरू हुआ.
घटना के अगले दिन ख़बर मिली कि माओवादियों ने बंधक बना कर कुछ घंटों तक रखे गए कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल की भी हत्या कर दी थी.
इस हमले में कुल 10 पुलिसकर्मियों समेत 29 लोग मारे गए थे जबकि 38 लोगों की जान बच गई थी.
जांच
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पिछले साढ़े पांच सालों में कई बार आरोप लगा चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं की हत्या एक राजनीतिक साज़िश है.
उन्होंने पूरे मामले की सीबीआई से जांच कराने की भी मांग की. लेकिन विधानसभा में सरकारी घोषणा के बाद भी मामले की जांच नहीं हुई.
राज्य की भाजपा सरकार ने घटना के अगले ही दिन मामले की एनआईए से जांच कराने की घोषणा की लेकिन साढ़े पांच साल बाद भी यह जांच पूरी नहीं हो पाई.
दौलत रोहड़ा कहते हैं, "घटना के अगले दिन एनआईए की टीम घटनास्थल पर जांच कर के जा चुकी थी. लेकिन लगभग 25 दिन बाद जब हम घटनास्थल पर पहुंचे तो हमनें मौक़े से विद्याचरण जी का चश्मा और उनकी चप्पल समेत कई चीज़े बरामद कीं. एनआईए ने तो आज तक मुझसे गवाही लेने की भी ज़रूरत नहीं समझी. दूसरे चश्मदीद लोगों से भी एनआईए ने बात नहीं की. मुझे लगता है कि एनआईए की जांच के नाम पर केवल कागज़ी खानापूर्ति हुई."
एनआईए की जांच रिपोर्ट बताती है कि उसने इस मामले की जांच के दौरान बस्तर और सुकमा के एसपी और बस्तर के आईजी से भी बयान लेना ज़रूरी नहीं समझा.
सवाल
कांग्रेस के पास इस हमले को लेकर कई अनुत्तरित सवाल हैं, जिसे वह समय-समय पर उठाती रहती है और इसे किसी राजनीतिक साज़िश से जोड़ती है.
आंकड़ों की मानें तो जिस झीरम घाटी में यह हमला हुआ, उसी इलाक़े में कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा हुई थी. इसमें 1786 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था. लेकिन जब कांग्रेस के शीर्ष नेता उस इलाके में थे तब पूरे इलाक़े में महज 218 जवानों को तैनात किया गया था.
विपक्षी पार्टी के नेता रहते भूपेश बघेल ने इस मामले में कई गंभीर आरोप लगाए हैं और वे राजनेताओं के साथ-साथ अफसरों के भी इस हमले में शामिल होने की आंशका जताते रहे हैं. इसके अलावा पैसों के लेन-देन को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप लगे हैं.
यह अकारण नहीं है कि सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सबसे पहले जिन अफसरों को हटाया, उनमें एसआईबी के मुखिया मुकेश गुप्ता शामिल हैं.
अब लोगों की गवाहियां और दस्तावेज़ों से नवगठित एसआईटी क्या इस हमले का राज खोल पाएगी, इस पर सबकी नज़रें बनी हुई हैं.
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