You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
राहुल गांधी की इमेज बीते 5 दिनों में कितनी बदल गई
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रविवार शाम को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का नाम सामने आते ही 11 दिसंबर को आए चुनावी नतीजों के बाद से शुरू हुआ राहुल गांधी का 'मिशन सेमीफ़ाइनल' पूरा हो गया है.
भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताक़त के लिहाज से अपेक्षाकृत मज़बूत माने जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने बीजेपी के हाथों से छीन लिया है.
इन राज्यों में चुनावी जीत के बाद से राहुल गांधी अचानक से 2019 के आम चुनावों के लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने की स्थिति में खड़े दिखाई दे रहे हैं. और इस मौके का राहुल गांधी ने अपनी छवि को चमकाने के लिए भरपूर इस्तेमाल भी किया है.
जीत के बाद की प्रेस कांफ्रेंस
सबसे पहले बात चुनावी नतीजे के बाद उनकी प्रेस कांफ्रेंस की. मध्य प्रदेश में कांटे की टक्कर के चलते राहुल गांधी को इसे तीन चार घंटे भले टालना पड़ा हो लेकिन जब वे पहुंचे तो उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था.
उन्होंने ना केवल ये कहा कि वे 2019 में नरेंद्र मोदी को हराएंगे लेकिन हम किसी को भारत से मुक्त नहीं करना चाहते हैं. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से ये भी सीखा है कि उन्हें क्या क्या नहीं करना है.
ज़ाहिर है राहुल जीत के बाद से अपनी पॉश्चरिंग करने में लग गए थे. वे ये दर्शा रहे थे कि वे और उनकी पार्टी पॉजिटिव राजनीति को आगे बढ़ाने का काम करेंगे.
उनकी इस बॉडी लैंग्वेज पर ब्रैंड कंसल्टेंट हरीश बिजूर ने बीबीसी से कहा, "उन्होंने जीत को गरिमा के साथ स्वीकार किया, उनके अंदाज़ में एक ठहराव था, समग्रता की बात थी, अकड़ नहीं थी और परिपक्वता साफ़ झलक रही थी."
लेकिन अगले दिन मीडिया में ख़बरें आने लगीं कि चुनाव तो जीत गए हैं, लेकिन राहुल गांधी मुख्यमंत्री का नाम तय नहीं कर पा रहे हैं. बुधवार का दिन मुख्यमंत्री के नामों के एलान की घोषणा के इंतज़ार में ही बीता.
मुख्यमंत्री के नाम पर घमासान
मध्य प्रदेश से ख़बरें आने लगी कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया में घमासान छिड़ा है और राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत आमने सामने हैं. छत्तीसगढ़ की जीत भले जोरदार रही हो लेकिन संदेह वहां भी बना हुआ था, भूपेश बघेल के साथ टीएस सिंह देव और ताम्रध्वज साहू के नाम रेस में आ गए थे.
इसके बाद मीडिया के लोगों के सामने राहुल गांधी दिखे. पहले से ज्यादा सहज मुस्कुराते हुए कहा कि अलग अलग जगहों से इनपुट ले रहे हैं, विधायकों से बात कर रहे हैं और भी लोगों से बात कर रहे हैं, जल्दी ही नाम का एलान हो जाएगा.
इस बीच छत्तीसगढ़ के कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के पास राहुल गांधी के रिकार्डेड मैसेज आने लगे कि आपकी नजर में किन्हें होना चाहिए मुख्यमंत्री.
राहुल गांधी अब नेशनल मीडिया की ख़बरों के केंद्र में आ गए थे. उनकी पीआर मशीनरी इस खेल को ख़ूब समझ रही थी और उन्होंने ख़बरों की दुनिया को राहुल गांधी की बैठकों के इर्द-गिर्द उलझाए रखा.
लेकिन इस देरी पर विपक्ष आलोचना भी करने लगा था कि मुख्यमंत्री का नाम तय नहीं हो पा रहा था. इस बाबत पूछे जाने पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव मोहन प्रकाश ने कहा, "कौन लोग सवाल उठा रहे हैं, वही लोग जो उत्तर प्रदेश में विशाल बहुमत के बाद सात दिन तक मुख्यमंत्री नहीं तय कर पाए थे. राहुल जी सबको साथ लेकर सहमति बनाने की कोशिश करने के लिए बात कर रहे थे, जब सहमति बनी तब उन्होंने नामों का एलान कर दिया."
राहुल गांधी ने ट्विटर पर गुरुवार की शाम आते आते कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तस्वीर के साथ स्थिति साफ़ कर दी. 72 साल के कमलनाथ के अनुभव को उन्होंने तरज़ीह देकर ज़िम्मेदारी सौंपी.
सबको साथ लेकर चलने की बात
कमलनाथ पर राहुल गांधी के भरोसे की जितनी भी वजहें रहीं हों, उनमें एक बड़ी वजह परसेप्शन की राजनीति की भी रही होगी.
एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक मनोरंजन भारती के मुताबिक, कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने से विपक्षी दलों के गठबंधन को लेकर राहुल गांधी के नेतृत्व को मिलने वाली चुनौतियां ख़त्म हो गईं. कमलनाथ राहुल गांधी के क्षत्रप की भूमिका में हैं, तो संदेश अपने आप चला जाता है.
मध्य प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के समर्थन को इसी आईने में देखा जा सकता है. रविवार की शाम को चेन्नई में विपक्षी दलों की बैठक में डीएमके के अध्यक्ष स्टालिन ने एक तरह से इसका एलान भी कर दिया. उन्होंने कहा, "फासीवादी मोदी सरकार को हराने की काबिलियत राहुल गांधी ने हासिल कर ली है, उनके हाथों को मज़बूत करें और देश को बचाएं."
हालांकि, दूसरे विपक्षी दल मसलन तेलुगू देसम पार्टी, समाजवादी पार्टी और नेशन कांफ्रेंस के नेता वहां मौजूद थे और किसी ने भी स्टालिन की पेशकश का समर्थन नहीं किया है.
लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में विपक्षी दलों के गठबंधन के तौर पर राहुल गांधी सबकी पसंद के तौर पर उभर सकते हैं.
बहरहाल, राजस्थान में मुख्यमंत्री बनाने को लेकर स्थिति थोड़ी ज़्यादा गंभीर दिखने लगी थी. आपसी खींचतान के बीच जयपुर की सड़कों पर सचिन पायलट के समर्थकों का हंगामा दिखने लगा था. दो-दो बार अशोक गहलोत को एयरपोर्ट के रास्ते से लौटना पड़ रहा था. इस बीच राहुल गांधी को सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी से सलाह मशविरा की ज़रूरत पड़ रही थी.
कांग्रेस महासचिव मोहन प्रकाश कहते हैं, "अहम ज़िम्मेदारी सौंपने के लिए सबकी बात सुनने का तरीका राहुल गांधी अपना रहे थे. इसमें क्या ग़लत है, हमारे नेताओं में भी कोई विवाद नहीं था. कई बार समर्थकों का उत्साह ज्यादा होता भले दिखा हो लेकिन सब लोग बीजेपी से मुक़ाबला करने के लिए एकजुट हैं."
देर भले हो रही थी लेकिन राहुल गांधी अपनी उस छवि को चमका ज़रूर रहे थे कि वे सबकी सुन रहे हैं. ये कांग्रेस के उस दौर से बेहद अलग का दौर था जहां हाईकमान झटके से अपना फ़ैसला सुनाने के लिए बदनाम हुआ करता था.
ट्विटर पर तस्वीरों का संदेश
अगले दिन यानी शुक्रवार की दोपहर में राहुल गांधी ने एक बार ट्विटर पर ही बताया कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों पर उनका भरोसा है. गहलोत मुख्यमंत्री और सचिन पायलट उनके डिप्टी.
राहुल गांधी चुनावी नतीजों से पहले ही कमलनाथ और अशोक गहलोत को लेकर अपनी पसंद के संकेत दे चुके थे, आख़िरकार किया भी उन्होंने वही, लेकिन खींचतान ने उन्हें ख़बरों की दुनिया के केंद्र में बनाए रखा.
इस बीच वे इसका संकेत भी देने में कामयाब रहे कि कमलनाथ और गहलोत जैसे सीनियर नेता और ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं के बीच वे संतुलन साध सकते हैं और कोई भी उनको चुनौती देने की स्थिति में नहीं है.
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी इसे राहुल की कमजोरी के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं, "राहुल गांधी ने उन्हीं लोगों पर भरोसा किया जो सोनिया गांधी के गुड बुक्स में रहे हैं, यानी इसे पूरी तरह से उनका अपना फ़ैसला नहीं कहा जा सकता. वे एक नई कांग्रेस का संकेत दे सकते थे. सिंधिया और पायलट पर भरोसा करके इसकी शुरुआत हो सकती थी."
हालांकि राहुल गांधी ने जिस तरह से अनुभवी नेताओं पर भरोसा रखा है, वह कांग्रेस पार्टी की पुरानी परंपरागत शैली का ही उदाहरण है, जहां पुराने लोगों को इसलिए भी ज़िम्मेदारी जी जाती रही है, ताकि वे युवा नेताओं के लिए अड़ंगा नहीं लगा पाएं. इस तरीके से कांग्रेस आलाकमान पार्टी के अंदर के अलग अलग नेताओं के बीच चेक-बैलेंस करती आई है.
इस बीच सुप्रीम कोर्ट में रफ़ाल सौदे पर केंद्र सरकार को क्लीन चिट मिलने का फ़ैसला आया जो एक तरह से राहुल गांधी के लिए झटका था.
रफ़ाल पर बना हुआ सवाल
तीन राज्यों में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह पहली बार मीडिया के सामने आए लेकिन उन्होंने हार के कारणों पर कुछ नहीं कहा. उनकी आलोचना के केंद्र में रहे राहुल गांधी. लेकिन इस बार अमित शाह उन्हें अपनी तमाम प्रेस कांफ्रेंस की तरह राहुल बाबा नहीं कह पा रहे थे, एक बार राहुल गांधी कहा भी, बाद में रुककर राहुल गांधी जी बोलना पड़ गया उन्हें.
इसके बाद शाम में जब राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की तो और भी अपने आरोपों को ज़ोर से दोहराते उन्होंने कहा भी कि चौकीदार चोर है, ये हम साबित करके दिखा देंगे. उनकी आक्रमक देख कर ज़ाहिर हो रहा था कि वे रफ़ाल को आम चुनावों में बड़ा मुद्दा ज़रूर बनाएंगे.
मीडिया में मोदी सरकार को भले क्लीन चिट दिए जाने की ख़बरें प्रमुखता से दिखाई जा रही हों लेकिन राहुल गांधी इस मुद्दे पर जो सवाल पूछ रहे हैं, उसका जवाब ना तो प्रधानमंत्री दे रहे हैं और ना ही सरकार के मंत्री या बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और ना ही प्रवक्ता.
लेकिन शनिवार को रफ़ाल के मुद्दे पर सुप्रीम में सरकार की ग़लतबयानी की ख़बर आ गई, राहुल प्रेस कांफ्रेंस में जिस पार्लियामेंट एकाउंट कमेटी के सामने रफ़ाल डील के गुजरने पर सवाल कर रहे थे, उसको लेकर सरकार की ग़लतबयानी के चलते सुप्रीम कोर्ट से फ़ैसले में ग़लती हुई है.
सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में तथ्यात्मक संशोधन की अपील दाख़िल की है. यानी राहुल गांधी जिस रफ़ाल के मुद्दे को उठा रहे हैं, उससे मोदी सरकार का पीछा छूटता नज़र नहीं आ रहा है.
राहुल बन गए हैं सीरियस प्लेयर
शनिवार के दिन तक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की तस्वीर साफ़ नहीं हो पाई थी, शाम चार बजे के क़रीब राहुल गांधी ने एक और तस्वीर ट्वीट की, छत्तीसगढ़ के नेताओं के साथ. लेकिन ये साफ़ नहीं हो पा रहा था कि किसके हाथों में मिली है कमान.
रविवार को जाकर तस्वीर भी साफ़ हो गई- छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की 15 साल की बादशाहत को धूल में मिलाने वाले प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनाया गया, ये भी कहा गया कि इनके नाम का फ़ैसला छत्तीसगढ़ के विधायकों ने किया है.
तीनों मुख्यमंत्रियों के नाम साफ़ होने से दो बातें साफ़ हो रही हैं, एक तो राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रदेश अध्यक्ष को ही मुख्यमंत्री का पद दिया है, यानी काम करने वालों पर भरोसा करके उन्होंने लोकसभा की तैयारियों को चालू रखने का संदेश दिया है.
ये बात राजस्थान में नहीं हो पाई तो भी प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री बनाए गए हैं. यानी उनके संगठन के काम को ख़ारिज़ नहीं किया गया है.
संघर्ष से उबरे
इसके अलावा एक और पहलू है, अशोक गहलोत और भूपेश बघेल ओबीसी समुदाय से आते हैं, सचिन पायलट भी ओबीसी हैं और कमलनाथ जिस वैश्य समुदाय से आते हैं, वो भी बिहार में ओबीसी में गिने जाते हैं, हालांकि मध्य प्रदेश में कमलनाथ का समुदाय सर्वण में शामिल है. ऐसे में कांग्रेस की एक कोशिश ओबीसी फैक्टर को 2019 में अपने पक्ष में लाने की भी हो सकती है.
हालांकि बिहार और उत्तर प्रदेश में ओबीसी फैक्टर का रोल अहम होगा और यहां कांग्रेस सहयोगी दल की भूमिका से आगे बढ़ पाएगी, ये संभव नहीं दिखता.
इस पहलू पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता कहते हैं, "ये बात राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लिए तो कही जा सकती है. हालांकि ये भी देखिए कि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को मौका मिला है जबकि वहां उनके समुदाय से ज़्यादा आबादी साहू समुदाय की है लेकिन ताम्रध्वज साहू पिछड़ गए हैं. जातिगत समीकरण ध्यान में होगा लेकिन वही अहम वजह नहीं रही होगी."
बहरहाल, रविवार की शाम आते आते राहुल गांधी ने बीते पांच दिनों दिनों में उस मुकाम के आसपास पहुंचते दिख रहे हैं जिसके लिए बीते 14 सालों से वे संघर्ष करते नज़र आ रहे थे. बीच बीच में भले उनमें स्पार्क नजर आया हो लेकिन पहली बार ऐसा मौका है जब राहुल गांधी खुद को सीरियस प्लेयर के तौर पर साबित करते दिखाई पड़ रहे हैं.
बीजेपी पर करीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषण के मुताबिक इन विधानसभा चुनावों में हवा राहुल गांधी के साथ दिखाई दी, जिसके चलते बीजेपी की रणनीति और संगठन दोनों कमतर साबित हुए और मतदाताओं की हवा से राहुल की केमेस्ट्री ही नरेंद्र मोदी- अमित शाह के सामने 2019 के चुनाव के लिहाज से असली चुनौती होगी.