किसान क्यों रो रहे हैं प्याज़ के आंसू

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    • Author, श्रीकांत बंगाले, बीबीसी संवाददाता
    • पदनाम, प्रवीण ठाकरे, बीबीसी मराठी के लिए

बाज़ार में भले ही प्याज़ 20 से 30 रुपये प्रति किलो की दर से मिल रहा है लेकिन प्याज की खेती में जुटे किसान इसकी लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं.

उनकी हालत इस कदर ख़राब है कि प्याज़ की कीमत गिरने के बाद से दो किसानों ने आत्महत्या कर ली है.

अपनी समस्या देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचाने के लिए एक किसान ने 750 किलो प्याज़ बेचने के बाद मिले पैसों को पीएम नरेंद्र मोदी को भेज दिया.

ठीक ऐसे ही महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के संगमनेर तहसील के एक किसान ने प्याज़ बेचने के बाद मिले पैसों को वहां के मुख्यमंत्री को भेज दिया.

ख़बर तो यहां तक आई कि किसानों को अपने प्याज़ की कीमत 50 पैसे प्रति किलो की दर से भी नहीं मिल रहे हैं और गिरते भाव से बेहाल प्याज़ के किसान इसे सड़कों पर फेंक रहे हैं.

ये वो ख़बरें हैं जो पिछले कुछ दिनों के दौरान प्याज़ की खेती में लगे किसानों की बदहाल स्थिति बताती हैं. आज पूरे देश में प्याज़ के पैदावार की लागत और इसकी बिक्री से होने वाली कमाई में कोई संतुलन नहीं है. जो किसान पहले से गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे थे उनकी हालात और बिगड़ गई है.

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पिछले हफ़्ते, नासिक ज़िले के एक किसान संजय साठे इस उम्मीद से बाज़ार पहुंचे कि उनके प्याज़ की अच्छी कीमत मिलेगी. लेकिन हुआ इसके उलट.

750 किलो प्याज़ बेचने के बाद उन्हें केवल 1064 रुपये मिले. ट्रैक्टर का भाड़ा और मजदूरी घटाकर ये कमाई और कम हो जाती है.

साठे ने मिली रकम का फौरन मनीऑर्डर बनाया और प्रधानमंत्री के दफ़्तर पीएमओ भेज दिया. मामले की जांच के बाद पीएमओ ने वो पैसा उन्हें वापस भेज दिया.

उनके विरोध का यह तरीका मीडिया में चर्चा का विषय बन गया लेकिन इसके बाद दो और ख़बरें आईं. 6 और 7 दिसंबर को नासिक ज़िले के बगलान तहसील में प्याज़ की खेती करने वाले दो किसानों ने आत्महत्या कर ली.

आत्महत्या करने वाले किसानों की पहचान भादाने गांव के तात्याभाउ खैरनार (44) और सारदे गांव के युवा किसान प्रमोद धोंगडे (33) के तौर पर हुई. खैरनार ने तो वहां आत्महत्या की जहां उन्होंने प्याज़ का गोदाम बना रखा था.

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'बताइये, हम अपने प्याज़ कैसे बेचें?'

प्रमोद धोंगडे के भाई प्याज़ की लागत के बारे में बताते हैं. उन्होंने तीन एकड़ ज़मीन में प्याज़ की फ़सल लगाई थी. वो कहते हैं, "एक एकड़ ज़मीन में प्याज़ की खेती पर 40 हज़ार रुपये खर्च होते हैं."

धोंगडे ने प्याज़ के उत्पादन पर प्रति एकड़ खर्च के बारे में विस्तार से बतायाः

  • 250 रुपये प्रति दिन के हिसाब से तीन किसानों के 18 दिनों की मजदूरी 13,500 रुपये
  • प्याज़ के बीज और नर्सरी पर 9,000 रुपये खर्च
  • कीटनाशकों और उर्वरक पर 9,000 रुपये और छिड़काव का ख़र्च एक हज़ार रुपये
  • एक एकड़ में प्याज़ की खेती पर बिजली का बिल 5,000 रुपये.
  • बाज़ार में प्याज़ के फ़सल को ले जाने का खर्च 2,400 से 3,000 रुपये.

वो कहते हैं, "कुल मिलाकर एक एकड़ में प्याज़ के उत्पादन पर क़रीब 40 हज़ार रुपये का खर्च बैठता है. इसमें हम उस किसान और उसके परिवार का ख़र्च नहीं जोड़ रहे जिसकी ये पैदावार है."

"एक एकड़ में लगभग 60 क्विंटल यानी 6,000 किलो प्याज़ का उत्पादन होता है. अभी एक क्विंटल की कीमत मिल रही है 150 रुपये. यानी एक एकड़ ज़मीन की उपज पर अभी के बाज़ार भाव पर 9,000 रुपये मिलेंगे. क्या चार महीने की मेहनत के बाद अंत में जो कमाई हो रही है यह मुनासिब है?"

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प्याज़ के किसानों की योजना क्या है?

आमतौर पर हर साल सितंबर और दिसंबर के दौरान प्याज़ के किसानों को इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है. इस दौरान प्याज़ औसतन 1,500-2,000 रुपये प्रति क्विंटल बिक जाता है.

गर्मियों के दौरान प्याज़ की फ़सल मार्च और अप्रैल में उगाई जाती है, फिर उन्हें गोदाम में रखा जाता है और इस मौसम में बाज़ार में उतारा जाता है. ख़रीफ़ फ़सल यानी लाल प्याज़ दिसंबर के महीने में बाज़ार में आता है.

तात्याभाउ और प्रमोद ने इसी को ध्यान में रखते हुए अपनी प्याज़ के फ़सल की योजना बनाई थी. लेकिन इस साल उन्हें अपनी प्याज़ की फ़सल को मूंगफली के लिए बेचना था.

प्रमोद के भाई विकास बताते हैं, "हालांकि हमने अच्छे किस्म के प्याज़ की पैदावार की थी, इसके बावजूद मेरे भाई को आत्महत्या करनी पड़ी. प्याज़ के हर किसान को इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ेगा."

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ऐसे हालात क्यों बने?

प्याज़ के पैदावार में लगे किसानों के मुश्किल हालात की स्थिति नाफेड (NAFED) के निदेशक और लासलगांव कृषि उत्पादन समिति के पूर्व प्रमुख नानासाहेब पाटिल इसके कारणों की व्याख्या करते हैं:

सरकारी तंत्र यह नहीं समझ सका कि इस बार प्याज़ के उत्पादन में वृद्धि हो रही है.

भारत में प्याज़ का कुल उत्पादन क़रीब 2 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन से 2 करोड़ 25 लाख मीट्रिक टन के बीच है. देश में हर साल कम से कम डेढ़ करोड़ मीट्रिक टन प्याज़ बेचा जाता है और क़रीब 10 से 20 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ भंडारण के दौरान ख़राब हो जाता है या उसका वज़न कम हो जाता है. औसतन 35 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ निर्यात किया जाता है.

एनएचआरडी के आंकड़ों के मुताबिक़, 2018 में प्याज़ का अनुमानित उत्पादन 2 करोड़ 22 लाख मीट्रिक टन था. लेकिन, हकीकत में यह लगभग 2 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन तक हुआ.

हर साल, सितंबर और दिसंबर के दौरान प्याज़ की अच्छी कीमत मिलती है. 2017 में अच्छे मानसून के कारण, प्याज़ की ग्रीष्मकालीन फ़सल भी अच्छी हुई. आम तौर पर औसतन प्रति हेक्टेयर प्याज़ का उत्पादन 140 से 160 क्विंटल होता है, लेकिन पिछली गर्मियों में इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल तक पहुंच गया.

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मांग कम, आपूर्ति ज़्यादा

मार्च और अप्रैल में, प्याज़ की कीमत कम थी, इसलिए किसानों ने अपने प्याज़ को गोदामों में रखा. उम्मीद थी कि कीमतें बढ़ेंगी. उनके पास गोदाम में अभी भी प्याज़ पड़ा है और अब यह ख़राब हो रहा है.

इससे पहले भारत के आठ राज्यों में प्याज़ का उत्पादन हुआ करता था. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक उन राज्यों में से थे. उन दिनों प्याज़ उत्पादन में महाराष्ट्र का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक था. आज, 26 राज्य प्याज़ का उत्पादन करते हैं और महाराष्ट्र का हिस्सा अब घटकर 30 फ़ीसदी रह गया है.

इस मौसम में, राजस्थान, गुजरात और बिहार से आया प्याज़ उत्तर भारत में बेचा जाता था. लेकिन, ढुलाई के खर्चों की वजह से महाराष्ट्र के प्याज़ उत्तर भारत में नहीं बेचे जा सकते हैं. आमतौर पर दक्षिण के प्याज़ सितंबर-नवंबर तक बेच लिए जाते हैं लेकिन इस साल ये अब भी बाज़ार में हैं.

भारत के उत्तर और दक्षिण भाग के बज़ारों में प्याज़ की कोई मांग नहीं है. इसका मतलब है कि मांग कम और आपूर्ति ज़्यादा है. स्वभाविक रूप से प्याज़ की कीमतें गिरने की यह वजह बन गई.

कीमतों में गिरावट को और रोकने के लिए नाफेड ने मार्च-अप्रैल में लगभग 25 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ ख़रीदे. लेकिन, सरकार इन प्याज़ों को समय पर बेचने का निर्णय नहीं ले सकी, इसलिए कीमतें 1,000-1,300 रुपये से घटकर 300-400 रुपये हो गई. इसके अलावा, लगभग 15 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ गोदामों में ख़राब स्थिति में पड़े हैं.

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निर्यात में कमी

पिंपलगांव कृषि उत्पादन समिति के अध्यक्ष दिलीपराव बनकर के मुताबिक, "हमने 2016-17 में लगभग 35 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ का निर्यात किया. एनएचआरडीएफ के आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में केवल 21 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ निर्यात किया गया था. यदि वैसा ही इस वित्तीय वर्ष में भी जारी रहता है, तो निर्यात केवल 20 हज़ार मीट्रिक टन तक ही सीमित रहेगा."

"एपीईडीए की वेबसाइट पर आंकड़े बताते हैं कि 2018 में अप्रैल और सितंबर के दरम्यान, 10 लाख 34 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ का निर्यात किया गया है. बढ़ती प्याज़ की फ़सल को ध्यान में रखते हुए निर्यात कम है."

"तुलनात्मक रूप से पाकिस्तानी प्याज़ को सस्ती दरों पर आयात किया गया था. सरकार को इस आयात को रोकना चाहिए था और किसानों के हितों का बचाव करना चाहिए था."

"अनिश्चित प्याज़ निर्यात नीति, निर्यात पर कोई नियंत्रण नहीं और न्यूनतम निर्यात मूल्य में अचानक वृद्धि- ऐसे कारक हैं जो उपभोक्ता देशों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से प्याज़ ख़रीदने के लिए दूसरे देश की तरफ ले जा सकते हैं. यह भारतीय किसानों को बुरी तरह प्रभावित करेगा."

वो कहते हैं कि जब तक हम किसी देश को प्याज़ की आपूर्ति की कम से कम एक साल की गारंटी नहीं देते, तब तक हमारे प्याज़ को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक निश्चित बाज़ार नहीं मिलेगा. लेकिन, सरकार ने इसकी पूरी तरह से उपेक्षा की है और इससे प्याज़ के आयात को बढ़ावा मिला है.

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'सरकार उपाय असफल रहे हैं'

नाफेड के पूर्व निदेशक चांगदेवराव होलकर और प्याज़ रिटेलर वेफको के वर्तमान निदेशक कहते हैं, "2016-2017 में, सरकार ने प्याज़ के निर्यात को 'प्रचार अनुदान' दिया था, इसलिए तब प्याज़ का बहुत अधिक निर्यात हुआ था."

"अनुदान के कारण, हमारे प्याज़ की कीमत पाकिस्तान और चीन की तुलना में सस्ता था, इसलिए ख़रीदार भारतीय प्याज़ की ओर आकर्षित हो रहे थे. आठ महीने गोदाम में रखा प्याज़ भी 30 रुपये की औसत दर पर बेचा गया था, लेकिन अब यह कम 3 रुपये से भी कम है. इसलिए किसान सदमे की स्थिति में हैं."

"इस साल सभी सरकारी उपाय असफल रहे हैं. राज्य और केंद्र सरकारों को इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. इसके विपरीत, पंजाब और कश्मीर में तो पाकिस्तान से सस्ता प्याज़ आयात किया गया."

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'सरकार केवल ग्राहकों के हितों का ख्याल रख रही है'

स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के नेता दीपक पागर ने आरोप लगाया, "इस सरकार ने केवल शहरी क्षेत्रों के उपभोक्ताओं का ख्याल रखा है. किसानों को आत्महत्या करने के लिए छोड़ दिया जाता है. जब भी प्याज़ की कीमतें बढ़ती हैं, सरकार हस्तक्षेप करती है और कीमतों में गिरावट आ जाती है."

वो कहते हैं, "मुद्रास्फीति के दौरान बाज़ार दर को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास एक आरक्षित निधि होती है, तो इस फंड का किसानों के लाभ के लिए उपयोग क्यों नहीं किया जाता है? सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है कि प्याज़ की पैदावार कितनी होती है, कितनी ज़मीन पर खेती होती है और उत्पादन कितना है. इसलिए उत्पादन के अनुमान बेहद ख़राब हो गए हैं. इसे डिजिटल प्रौद्योगिकी के सही इस्तेमाल से सही किया जा सकता है. जितनी ज़मीन पर बुआई की गई उससे प्याज़ का उत्पादन कितना होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. सरकार को यह करना चाहिए."

पागर कहते हैं, "निर्यात लागत में कमी लाई जानी चाहिए और निर्यात सब्सिडी दी जानी चाहिए, ताकि बचे हुए प्याज़ का संतोषजनक मूल्य निकल आए और कम से कम किसान अपनी लागत निकाल सकें."

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प्याज़ के मुद्दे का समाधान क्या है?

लासलगांव कृषि उत्पादन बाज़ार समिति के अध्यक्ष जयदत्त होलकर कहते हैं, "फिलहाल गर्मियों में उगाया गया प्याज़ बड़ी मात्रा में ख़राब हो रहा है क्योंकि इसकी बिक्री नहीं हो रही है. इस प्याज़ के ख़रीदार मिलना और लागत वसूल होना मुश्किल है. अगर केंद्र सरकार वर्तमान के 5 फ़ीसदी की जगह 10 से 15 फ़ीसदी निर्यात सब्सिडी देती है तभी नई फ़सल का निर्यात हो सकता है और पिछली पैदावार को घरेलू बाज़ार में बेचा जा सकता है. इससे किसानों को कुछ राहत मिलेगी."

वो कहते हैं, "अगर ऐसा नहीं हुआ तो गर्मियों के बचे 40 फ़ीसदी प्याज़ सड़ जाएंगे. हमने इस बाबत कई चिट्ठियां लिखी हैं. लासलगांव से एक प्रतिनिधिमंडल 13 दिसंबर को केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से भी मिला."

विधायक अनिल कदम ने बीबीसी से कहा, "नासिक के सांसद, विधायक, बाज़ार समितियों के अध्यक्षों ने सामूहिक रूप से केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से 13 दिसंबर को मुलाकात की. उन्होंने प्याज़ उत्पादकों की वर्तमान स्थिति से उन्हें अवगत कराया."

"मंत्री ने वादा किया कि यदि राज्य सरकार प्याज़ उत्पादकों को सब्सिडी देने का प्रस्ताव भेजती है तो केंद्र सरकार निश्चित रूप से इस संबंध में सकारात्मक निर्णय लेगी. हमने 14 दिसंबर को प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की और उन्हें किसानों की परेशानी को बताया. उन्होंने कृषि सचिव से इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा है."

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राज्य के कृषि मंत्री का क्या कहना है?

प्याज़ के मुद्दे पर, राज्य के कृषि मंत्री सदाभाऊ खोत कहते हैं, "जब स्थानीय बाज़ार में प्याज़ की कीमतें बढ़ती हैं, तो प्याज़ का निर्यात शुल्क बढ़ जाता है. अगर प्याज़ की कीमत 100 रुपये तक बढ़ती है तो भी जो लोग इसे ख़रीद कर खा सकते हैं उन्हें खाना चाहिए. किसानों पर निर्यात शुल्क नहीं थोपा जाना चाहिए. प्याज़ का समर्थन मूल्य तय करने का समय आ गया है."

तो आखिर वो सरकार में रह कर इस पर क्या कर रहे हैं? इस सवाल पर, उन्होंने कहा, "मैंने केंद्र सरकार को प्याज़ पर निर्यात शुल्क को स्थायी रूप से रद्द करने और निर्यात सब्सिडी बढ़ाने की मांग की है. मैंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि प्याज़ उत्पादक किसानों को सब्सिडी दें."

इन आरोपों पर कि सरकार के उपाय असफल हो रहे हैं, खोत कहते हैं, "सरकार ने इस संबंध में कई उपाय किए हैं जिन्हें गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए."

खोत कहते हैं, "हम बाज़ार समितियों के एकाधिकार को तोड़ रहे हैं. हम मुक्त बाज़ार योजना को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं."

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