किसानों की क़र्ज़माफ़ी का बुरा असर किस पर: नज़रिया

किसान, क़र्ज़, रिज़र्व बैंक

इमेज स्रोत, Thinkstock

    • Author, आशुतोष सिन्हा
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

बीते कुछ वर्षों में किसानों की कर्ज़माफ़ी के वायदों की बाढ़ सी आ गई है.

राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार हो, किसानों के लिए उन्हें सरकारी ख़ज़ाने से पैसे देने में कोई भी हिचकिचाहट नहीं हो रही है. लेकिन किसानों के मुद्दों को सुलझाने में शायद वो फुर्ती नहीं दिख रही.

भारतीय रिज़र्व बैंक ने साफ़ किया है कि सरकारों की कर्ज़ माफ़ करने की नीति सही नहीं है. इससे बैंकों पर बुरा असर होता है और लोन लेने वाले आम लोगों की सोच पर भी प्रतिकूल असर होता है.

लेकिन रिज़र्व बैंक के तीखे शब्द नीति निर्धारण करने वालों पर कोई असर नहीं कर रहे हैं. लोन माफ़ करने के प्रति उनकी उदार नीति फिलहाल बदलती नहीं दिखाई दे रही.

सिर्फ़ किसानों के प्रति नरम रवैया नहीं, बड़े उद्योगों को दिए गए लोन के गड़बड़झाले को मिलाकर अब बैंकों के लिए सांस लेना दूभर सा हो गया है.

किसानों की कर्ज़माफ़ी और उद्योगों को दिए गए ऐसे लोन जो शायद वापस नहीं आएंगे, उन दोनों ने मिलकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि बैंकिंग प्रणाली कुछ समय से ख़तरे में दिखाई दे रही है.

किसान, क़र्ज़, रिज़र्व बैंक

कर्ज़माफ़ी की नीति

हर साल बजट में किसानों को लोन मुहैया कराने का आंकड़ा वित्त मंत्री के भाषण में छाया रहता है.

अब ये आंकड़ा सालाना 10 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है. लेकिन सरकारी आंकड़ों के इस दावे में ये साफ़ दिखाई नहीं देता कि मूल रूप से किसानों को इसका फ़ायदा पहुंच रहा है या नहीं.

जैसे जैसे ये आंकड़ा ऊपर पहुंचता गया है, पिछले कुछ साल में अलग अलग राज्यों ने किसानों के लिए अपनी घोषणाओं में कर्ज़माफ़ी की सरकारी नीति सी बना ली है.

अलग अलग राज्यों के किसान नेता अब इसको अपने हक़ के रूप में मांगने लगे हैं. इस महीने हिंदी भाषी राज्यों के चुनाव में किसानों का मुद्दा जिस ढंग से छाया रहा, इस नीति को अब और सरकारें भी अपना सकती हैं.

किसान, क़र्ज़, रिज़र्व बैंक

इमेज स्रोत, Getty Images

कर्ज़ माफ़, चुनाव का रास्ता साफ़?

महाराष्ट्र: 34000 करोड़ रुपये

उत्तर प्रदेश: 36000 करोड़ रुपये

पंजाब: 10000 करोड़ रुपये

कर्नाटक: 8000 करोड़ रुपये

(स्रोत: राज्य सरकारों की घोषणा)

वीडियो कैप्शन, धंधा पानी

चार राज्यों की सरकारी घोषणाओं के आधार पर रिज़र्व बैंक ने ये समझने की कोशिश की कि इससे बैंकों पर क्या असर पड़ेगा.

रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, अगर देश भर में सिर्फ़ छोटे किसानों को पूरी तरह से फसल के लिए कर्ज़माफ़ी दे दी जाए तो सरकार को इसके लिए 2 लाख 20 हज़ार करोड़ रुपये का इंतज़ाम करना होगा.

ये आंकड़ा सिर्फ़ सरकारी कमर्शियल बैंकों के लिए है. देश में खेती के सभी लोन का 17 फ़ीसदी सहकारी बैंकों की तरफ से दिया जाता है. उनके लोन को शामिल कर देने से ये आंकड़ा थोड़ा और ऊपर जा सकता है.

देश भर में दिए गए खेती के लिए लोन करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें करीब 2.19 लाख करोड़ छोटे और मंझले किसानों के लिए है.

कई राज्यों के लिए अब ये आंकड़ा इतना बड़ा हो गया है कि आर या पार की स्थिति बन गई है.

किसान, क़र्ज़, रिज़र्व बैंक

बढ़ते कर्ज़ का सरकार पर बोझ

आंध्र प्रदेश: 46,254 करोड़

बिहार: 22,092 करोड़

कर्नाटक: 34,637 करोड़

केरल: 29,914 करोड़

मध्य प्रदेश: 20,837 करोड़

महाराष्ट्र: 35,026 करोड़

राजस्थान: 26,702 करोड़

तेलंगाना: 21,902 करोड़

उत्तर प्रदेश: 57,129 करोड़

तमिलनाडु: 66,878 करोड़

(स्रोत: भारतीय रिज़र्व बैंक, मार्च 2016 तक)

एनपीए, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, भारतीय रिज़र्व बैंक

इमेज स्रोत, PTI

नॉन परफार्मिंग सेट

लोन मेला के नाम से जाना जाने वाला ये मुद्दा पहली बार नहीं उठा है. किसानों के क़र्ज़ का ये मुद्दा, इस बार ऐसे समय में आया है जब उद्योगों को दिए गए लोन में से 10 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा नॉन परफार्मिंग एसेट में शामिल किये जा चुके हैं.

बैंकों को ये डर है कि इस रक़म में से बड़ा हिस्सा वापस नहीं होगा. नोटबंदी की मार झेल रही सैकड़ों छोटी और मंझली कंपनियां भी इसमें शामिल हैं.

बड़े उद्योग घरानों को दिए गए पूरे क़र्ज़ के वापस न आने की स्थिति फिलहाल नहीं है. लेकिन रिज़र्व बैंक की पैनी नज़र ऐसे घरानों पर लगातार बनी हुई है.

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, भारतीय रुपया

इमेज स्रोत, PTI

क़र्ज़ की रेवड़ियां

ऐसे लोन बहुत ज़्यादा संख्या में देने के कारण करीब दर्जन भर सरकारी बैंकों की स्थिति सुधारने के लिए रिज़र्व बैंक ने उन पर नकेल कसी हुई है. प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (Prompt Corrective Action) यानी स्थिति सुधारने के लिए रोज़ाना के कामकाज में उन्हें कई बदलाव करने पड़ रहे हैं.

नए क़र्ज़ देने पर भी कई रोकटोक को मानना पड़ रहा है. ऐसे में कई राज्य सरकारें अपनी मनमानी नहीं कर पा रही हैं. इसलिए पिछले कुछ महीनों में रिज़र्व बैंक और सरकार में नोकझोंक बढ़ गई है.

पिछले दशक के शुरुआती सालों में रिज़र्व बैंक ने जिस ढंग से आसान शर्तों पर क़र्ज़ न देने की नीति बनाई थी, इससे उद्योगों में थोड़ी चिंता बनती है पर लंबे दौर में देश को फ़ायदा होता है.

इसलिए पिछले दशक के आर्थिक विकास को कई अर्थशास्त्री अब भी बहुत बढ़िया मानते हैं.

किसान, क़र्ज़, रिज़र्व बैंक

सभी सरकारें रेवड़ियां बांट कर वाहवाही लूटना चाहती हैं. वहीं सभी देशों के केंद्रीय बैंक कोशिश करते हैं कि क़र्ज़ मिलना आसान न हो और बैंक उसमें सावधानी बरतें. इन्हीं दोनों की कश्मकश अगले चंद साल में अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगी.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)