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अमित शाह: बीजेपी को हर चुनाव में जीत दिलाने वाले 'चाणक्य' के साथ क्या हो गया? - नज़रिया
- Author, उर्विश कोठारी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
ऐसा माना गया था कि कर्नाटक में अपनी साख खो चुके भाजपा के 'चाणक्य' पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों में पहले की तरह ही उभर के आएंगे.
तीन राज्यों में चुनावी हार के बाद राफ़ेल के मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले अमित शाह ने चुनाव परिणाम पर कुछ नहीं कहा. उन्होंने कहा कि वह चुनाव परिणाम पर अगले दो दिनों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे जिसमें हार की वजहों के बारे में कहा जाएगा.
हालांकि, इन नतीजों से भाजपा प्रमुख अमित शाह की 'चाणक्य बुद्धि' को लेकर लोगों की अपेक्षा ग़लत साबित हुई.
अन्य राज्यों की ही तरह इन राज्यों में भी कई अनुमानों में भाजपा की हार का अंदेशा जताया गया था जो वाकई सच हो गया.
अमित शाह की रणनीतियों में वह बात थी जिसका न केवल प्रधानमंत्री और भाजपा के समर्थक बल्कि राजनीति के दिग्गज भी लोहा मानते थे.
हर हाल में चुनाव जीतना और सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जाने की कोशिश को चाणक्य बुद्धि कहना सही है या ग़लत, वह अलग चर्चा है.
गुजरात विधानसभा के चुनाव के दौरान भाजपा को काफ़ी मेहनत करनी पड़ी थी. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी वहां आकर चुनाव प्रचार की कमान संभालनी पड़ी, हर दांव खेला गया, तब जाकर बहुत ही कम अंतर से भाजपा को जीत मिली थी.
उसके पहले कश्मीर में अकेले सरकार बनाने का अमित शाह का मिशन विफल रहा था और बाद में वहां महबूबा मुफ़्ती के साथ सत्ता में साझेदारी करनी पड़ी.
इन सबके बावजूद अमित शाह की दूरंदेशी चाणक्य प्रतिष्ठा को आंच नहीं आई थी.
कर्नाटक में दांव-पेंच और तिकड़म से भी भाजपा की सरकार नहीं बन सकी, तब अमित शाह की नहीं हारने वाली साख पर पहली बार पैबंद लगा था.
अमित शाह की छवि पर असर!
अब पांच राज्यों के नतीजे आने के बाद, उनकी अजेय छवि में गिरावट आई है. नतीजों के बाद हार-जीत के कारण देना आसान है.
स्थानीय मुद्दे, सत्ता विरोधी रुख़, स्थानीय नेताओं का दबदबा, उम्मीदवारों के चुनाव में मोदी-शाह के बदले स्थानीय नेताओं की सूची को अहमियत देना, इन मुद्दों को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा की हार के लिए अहम माना जा सकता है. बहुत हद तक ये सच भी है. पर ये सब वे वजहें हैं जो चुनाव के पहले से मौजूद थीं.
इन सबके ऊपर अमित शाह के नेतृत्व पर विश्वास करते हुए इन राज्यों में भाजपा के उज्जवल भविष्य की आशा की जा रही थी.
स्थानीय कारणों के आंशिक असर हो सकते हैं लेकिन एक भरोसा यह भी था कि 'आख़िर अमित शाह तो हैं हीं.'
कई भाजपाई गुटों और सोशल मीडिया में ऐसी बातें चल रही थीं कि सीटें भले ही कम हो जाएं लेकिन अमित शाह हार के मुंह से भाजपा को जीत दिला देंगे.
अमित शाह भाजपा का वो सिक्का हैं जो हर बाज़ार में चल जाता है लेकिन इन पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने उनका 'आंशिक डिमोनेटाइज़ेशन' कर दिया है.
भाजपा अपनी हर जीत का श्रेय जब अमित शाह की रणनीतियों को देती है तो इन तीन राज्यों में भाजपा की हार की ज़िम्मेदारी तय करते समय उन्हें इससे अछूता कैसे रखा जा सकता है.
एक पार्टी के तौर पर भाजपा अमित शाह की रणनीतियों में स्वेच्छा या मजबूरी से पूर्ण विश्वास व्यक्त कर सकता है क्योंकि वहां किसी भी और नेता का कद ऐसा नहीं है जो शाह का विकल्प बन सके.
(नरेंद्र मोदी विकल्प रखने में विश्वास नहीं करते हैं)
अमित शाह के स्ट्राइक रेट पर सवाल?
कुछ समय के बाद इस हार को 2019 के चुनाव जीतने की अमित शाह की महान और 'अभी आपको समझ में नहीं आएगा' ऐसी रणनीति भी गिनाई जा सकती है क्योंकि सोशल मीडिया पर ऐसी बेतुकी बातों की बहुत संभावना है.
लेकिन हिंदी भाषी तीन राज्यों में भाजपा की हार से अमित शाह के स्ट्राइक रेट को लेकर लोगों के मन में और अंदरूनी तौर पर भाजपाई खेमें में भी कई सवाल तो खड़े होंगे ही.
चुनावी नतीजों से कांग्रेस की नई पारी शुरू हुई है, उससे ज़्यादा ज़रूरी ये है कि मोदी-शाह की संयुक्त परियोजना 'कांग्रेस मुक्त भारत' का पतन शुरू हो गया है.
कांग्रेस को एकदम 'जीत गए, जीत गए' के मोड में नहीं आ जाना चाहिए और ये भी मानने की ज़रूरत नहीं है कि तीन राज्यों की ही तरह दूसरी जगहों पर भी लोग भाजपा से निराश होंगे और कांग्रेस को जीत दिला देंगे.
इसी तरह, भाजपा (अरुण शौरी की व्याख्या के अनुसार, मोदी-शाह और आधे जेटली) के पास ऐसा मानने का कारण नहीं है कि जो भी नतीजे आए, 2019 में तो लोग मोदी को ही जिताएंगे.
इन नतीजों ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को 'अहंकार निद्रा' से जगाने का काम किया है.
अस्तित्व का आभास
इन नतीजों के बाद भी राजनीति के दिग्गज खिलाड़ियों में से अमित शाह का नाम हटाया नहीं जा सकता है.
राजनीतिक करियर में ऐसे उतार चढ़ाव आते रहते हैं. बड़े नेता जीत से अधिक हार से सीखते हैं.
इसलिए, यह विपक्ष के लिए मुश्किल होगा कि वो आने वाले चुनावों में अमित शाह को कमतर आंके.
साथ ही अमित शाह के लिए भी यह तय है कि अब तक नतीजों और प्रचार की हवा से ऊंचे चलने वाला उनका रथ अब ज़मीन पर है.
और उन्हें ज़मीन पर रह कर ही विपक्ष से मुक़ाबला करना है, उनके होने का और उनकी अजेय छवि का मनोवैज्ञानिक दबाव इन नतीजों के बाद हट गया है.
जिसकी वजह से एनडीए के साथियों के मुंह खुलेंगे ऐसी संभावनाएं जताई जा रही हैं. शिवसेना जैसे पक्ष और आक्रमक होंगे. अब तक मन मारकर बैठे दूसरे दलों को भी अपनी ज़ुबान के अस्तित्व का आभास होगा.
क्या इस हार से अमित शाह और आक्रामक हो जाएंगे?
ख़ासकर, अब लोकसभा चुनाव से पहले अन्य किसी राज्य में चुनाव नहीं होने वाले हैं तब इन नतीजों की यादें और उनके असर कम होने में वक़्त लगेगा.
ज़रूरी सवाल ये है कि 2019 के लोकसभा चुनाव तक इन नतीजों के असर को कम करने के लिए अमित शाह क्या करेंगे और वो क्या कर सकते हैं, उनके पास क्या विकल्प होंगे.
2014 में कांग्रेस विरोध और विकास के सपनों का मिश्रण उनके काम आया था.
अब जब लोकसभा चुनाव होने में महज़ छह महीने रह गये हैं तब एक और बार रंगीन सपने दिखाना नामुमकिन तो नहीं परंतु मुश्किल ज़रूर है.
इसकी जगह अन्य कई शॉर्टकट भी हैं, और पहले भी वो ऐसे रास्तों को अपनाने में कभी हिचकिचाए हों ऐसा तो नहीं लगता.
इसलिए, पांच राज्यों में वर्तमान हार से निश्चित ही अमित शाह ज़्यादा सतर्क, ज़्यादा आक्रमक बनेंगे और उनकी तरकश में जो भी तीर हैं वो भी निकालेंगे.
जहां भाजपा को यह उम्मीद होगी कि अमित शाह के तरकश से निकली सभी तीर अपने निशाने पर लगें. वहीं दूसरे उसके चूकने की उम्मीद करेंगे.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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