नज़रिया: दलित आंदोलन पर सरकार की 4 बड़ी ग़लतियां

    • Author, दिलीप मंडल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के विरोध मे सोमवार को हुए आंदोलन को लेकर ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार से कम से कम चार मौकों पर चूक हुई है.

पहली चूक

यह चूक हो गई है या जानबूझकर की गई है, यह जानने का कोई तरीका नहीं है. मगर एक समीक्षक के तौर पर देखें तो लगता है कि पहली चूक तब हो गई थी, जब सुप्रीम कोर्ट में 'सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार और अन्य' मामला आया था.

इस केस में जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उसका पक्ष जानने की कोशिश की थी और इसे वरिष्ठ क़ानूनी अधिकारी की जगह एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह को भेजा गया था.

उन्होंने इस केस में सरकार के पक्ष या क़ानून का बचाव करने की जगह एक केस के हवाले से यह कहा कि ऐसे मामलों में अग्रिम ज़मानत दिए जाने में कोई बाधा नहीं है.

यह बात क़ानून के प्रावधान के ख़िलाफ़ थी. यहां सरकार के प्रतिनिधि को क़ानून का बचाव करना चाहिए था. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने की दर बहुत कम है.

सरकार ने दरअसल इस मामले में एससी-एसटी के पक्ष को नहीं रखा, जो देश की आबादी की एक चौथाई है और उनकी आबादी लगभग 35 करोड़ बनती है.

ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट को यह फ़ैसला देना पड़ा कि अग्रिम ज़मानत मिलेगी और चूंकि सरकार कह चुकी है कि फ़र्ज़ी मामले भी होते हैं, ऐसे में अदालत ने कहा कि बिना प्रारंभिक जांच के गिरफ़्तारी नहीं होगी.

दूसरी चूक

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद एक आंदोलन पैदा होने लगा था. सोशल मीडिया से लेकर अन्य जगह बहस छिड़ गई थी.

सरकार के अपने ही कम से कम तीन मंत्रियों और कई सांसदों ने इस मामले में प्रधानमंत्री से मुलाकात और बात की. विपक्ष ने राष्ट्रपति से मुलाकात की.

इस समय तक भी सरकार की तरफ़ से कोई पहल नहीं की गई. लेकिन जिस दिन आंदोलन था, उसी दिन पुनर्विचार याचिका डाली गई. यहां सरकार से राजधर्म निभाने में दूसरी चूक हुई.

तीसरी चूक

यह आंदोलन नियोजित था और सबको पता था कि यह होना था. लगता है कि सरकार को अंदाज़ा नहीं था कि यह इतना बड़ा होगा.

सरकार को लगा होगा कि एससी-एसटी प्रमोशन के मामले की तरह यह मामला भी दब जाएगा, जबकि ऐसा नहीं हुआ. यह उससे तीसरी ग़लती हुई और इसे वह इसे मैनेज नहीं कर पाई.

चौथी चूक

सरकार से चौथी और सबसे बड़ी ग़लती जो हुई और अभी भी हो रही है, वह है इस मामले में पुनर्विचार याचिका डालना.

सुप्रीम कोर्ट के नियमों के मुताबिक कोई भी पुनर्विचार याचिका उसी बेंच में जाती है जिस बेंच का फ़ैसला होता है.

सुप्रीम कोर्ट के हर जज को समान माना जाता है और जजों के फ़ैसले तो बड़ी बेंच बदल सकती है या फ़ैसला देने वाले जज ख़ुद रिव्यू कर सकते हैं.

अब सरकार ने दबाव में रिव्यू पिटीशन डाली है तो दोनों न्यायाधीशों के सामने दो विकल्प हैं- या तो वे फ़ैसले पर बरकरार रहें या उसे बदलें.

दोनों ही स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता खंडित होती है. जजों को दुविधा में डाला गया कि आपने अपना फ़ैसला सही लिया है या नहीं लिया.

इसकी जगह सरकार के पास एक विकल्प था, पता नहीं उसे क्यों नहीं आजमाया गया. सरकार इसपर अध्यादेश ला सकती थी और उसके बाद संसद में जा सकती थी. वहां राजनीतिक चर्चा होती, सारे पक्ष सुने जाते और एक राय बन जाती.

वैसे भी क़ानून बनाने का मामला भारतीय संविधान के हिसाब से संसद का है. एससी-एसटी एक्ट में व्यवस्था है कि तत्काल गिरफ़्तारी होगी और अग्रिम ज़मानत नहीं मिलेगी.

अगर अदालत ने इसे बदला है तो इसे फिर से वैसा करने का काम संसद को अपने हाथ में लेना चाहिए.

बाकी ग़लतियां तो ठीक नहीं की जा सकतीं, लेकिन अभी भी चौथी चूक को ठीक किया जा सकता है. सरकार अध्यादेश ला सकती है. सुप्रीम कोर्ट के लिए आसान नहीं कि वह अपना फ़ैसला बदल ले.

बीजेपी को क्या नुकसान होगा?

ऐसा नहीं लगता कि इस आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव से सरकार डर रही है. क्योंकि जो लोग इस समय आंदोलित हैं, वे आमतौर पर बीजेपी के वोटर नहीं हैं.

बीजेपी के कोर वोटर आंदोलन नहीं कर रहे हैं. हां, यह ज़रूर है कि बीजेपी ने दलितों के बीच जाने के लिए जो कार्यक्रम चलाया था कि हिंदू समाज की समरसता होगी, विराट हिंदू एकता बनेगी, वह कहीं न कहीं पीछे चला गया है.

जहां से वे लोग चले थे, वहीं पहुंच गए है. यहां सरकार या सत्ताधारी पार्टी या आरएसएस को यही नुकसान है.

उन्होंने दलितों को ख़ुद से जोड़ने का जो अभियान चलाया था, जिसके तहत वे साथ खाना खा रहे थे, आंबेडकर की मूर्तियां लगा रहे थे, वह सब सांकेतिक था. लेकिन जो पहला असली मुद्दा उनके सामने आया, उसमें वे फ़ेल हो गए.

मूर्तियां-तस्वीरें लगाने या बाबा साहेब ज़िंदाबाद के नारे लगाने तक तो वे कामयाब रहे, लेकिन पहले तो वे उस इम्तिहान में चूक गए जहां उन्हें एससी-एसटी का साथ देना था, उनका पक्ष रखना था. फिर सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद वे इस एक्ट को ठीक करने के लिए अध्यादेश लाने से चूक गए.

अगर उन्हें कोई नुकसान हुआ है तो इतना कि वे जो नया चेहरा बनाना चाहते थे, उससे चूक गए. ऐसा नहीं है कि उनका वोट बैंक खिसक जाएगा, क्योंकि जो प्रदर्शन कर रहे हैं, वे बीजेपी के कोर वोट बैंक में नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर से बातचीत पर आधारित)

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