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कांग्रेस राजस्थान, मध्य प्रदेश में जीत से क्या हासिल कर सकती है?: नज़रिया
- Author, अदिति फड़नीस
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बीते फ़रवरी महीने में कांग्रेस पार्टी के इतिहास में एक बार फिर 'चिकमगलूर लम्हा' आ गया.
साल 1978 के नवंबर महीने में कर्नाटक की चिकमगलूर सीट के सांसद डी.बी. चंद्रे गोड़ा ने इस्तीफ़ा दिया था.
चिकमगलूर लोकसभा सीट खाली होने पर इंदिरा गांधी ने इस सीट से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया. उस दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री देवराज उर्स ने गांधी के इस फ़ैसले का विरोध किया.
लेकिन इसके बाद भी इंदिरा गांधी श्रृंगेरी मंदिर और धर्मस्थल मंदिर में आशीर्वाद लेने के बाद अपने चुनाव प्रचार के लिए निकल पड़ीं.
जनता पार्टी ने इस सीट पर इंदिरा के ख़िलाफ़ वीरेंद्र पाटिल को खड़ा किया.
उस उपचुनाव में जनता पार्टी के नेता चौधरी चरण सिंह ने गांधी को हराने की भरसक कोशिश की.
लेकिन इसके बावजूद इंदिरा गांधी ये चुनाव जीतकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनीं. इसके बाद साल 1980 में वह एक बार फिर भारत की प्रधानमंत्री बनीं.
इस बार भी सब कुछ एक उपचुनाव के बाद ही शुरू हुआ है.
कांग्रेस पार्टी ने बीती फ़रवरी में दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में जीत हासिल की.
उपचुनाव से बड़ी जीत का रास्ता
कांग्रेस नेता रघु शर्मा ने केंद्रीय मत्री सांवरलाल जाट के निधन के बाद खाली हुई अजमेर लोकसभा सीट के उपचुनाव में सांवरलाल के बेटे और बीजेपी नेता रामस्वरूप लांबा को 84,414 वोटों से हरा दिया.
बीजेपी ने साल 2014 के चुनाव में ये सीट 1.72 लाख वोटों से जीती थी.
वहीं, बीजेपी सांसद महंत चांदनाथ के निधन से खाली हुई सीट पर हुए उपचुनाव में भी कांग्रेस ने बीजेपी को मात दी.
कांग्रेस के करन सिंह यादव ने इस सीट पर राजस्थान सरकार में श्रम मंत्री बीजेपी नेता जसवंत सिंह को 1,96,496 वोटों के अंतर से हराया.
बीजेपी ने साल 2014 में इस सीट को 2.84 लाख वोटों से जीता था.
मांडलगढ़ विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस नेता विवेक धाकड़ ने बीजेपी के शक्ति सिंह हाडा को 12,976 वोटों से हरा दिया.
इन जीत से उपजे आत्मविश्वास पर सवार होकर कांग्रेस पार्टी ने आपसी कलह और अहम के टकराव को किनारे रखा और पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारी करना शुरू की.
राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी ने उनके नेतृत्व में ही पांच में से तीन राज्यों में उम्दा प्रदर्शन किया है.
इन तीन में से दो राज्यों में तो कांग्रेस पार्टी पिछले 15 सालों से सत्ता से बाहर थी. ऐसे में हर मायने में ये एक बेहतरीन प्रदर्शन कहा जा सकता है.
कांग्रेस इस जीत का क्या करेगी?
कांग्रेस पार्टी ने अब सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है. दो राज्यों में नए मुख्यमंत्री चुन लिए गए हैं.
लेकिन सवाल ये उठता है कि कांग्रेस के सामने किस तरह की चुनौतियां हैं?
सबसे बड़ी चुनौती तो पार्टी के घोषणापत्र को लागू करना होगी.
राजस्थान में कांग्रेस ने ऐलान किया था कि सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार बेरोज़गारों को हर महीने 3500 रुपये भत्ता देगी. किसानों को पेंशन देगी और खेतीबाड़ी से जुड़े औज़ारों को जीएसटी से मुक्त रखेगी.
यही नहीं, महिलाओं को मुफ़्त शिक्षा देने का वादा भी किया गया है.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने किसानों की ऋण माफ़ी, किसानों को पेंशन के साथ-साथ पंचायतों को अपने क्षेत्र में शराब के ठेके बंद कराने का अधिकार देने जैसे वादे किए हैं.
कैसे पूरे होंगे वादे
घोषणापत्र में घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली के बिलों को आधा करने, शहरी और ग्रामीण परिवारों को घर और ज़मीन देने जैसे वादे भी शामिल हैं.
इसके साथ ही सभी के लिए एक हेल्थकेयर स्कीम लाने की भी योजना का ज़िक्र है.
लेकिन ये बात सभी जानते हैं कि मुफ़्त में कुछ भी नहीं मिलता है. इन वादों को पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा? आख़िर राज्य इन खर्चों को पूरा करने के लिए अपना राजस्व कैसे बढ़ाएंगे?
कांग्रेस पार्टी इस बारे में कोई जवाब नहीं देती है.
लेकिन इतनी बात तो पक्की है कि कांग्रेस के पास अब तीन नए राज्य हो सकते हैं जहां कांग्रेस अपनी नीतियों से उन समस्याओं को हल कर सकती है जो राज्य के लिए काफ़ी समय से नासूर बनी हुई हैं.
फसल की सरकारी ख़रीद अब तक एक समस्या बनी हुई है. कांग्रेस के पास ये मौक़ा है कि वह इसे सही ढंग से अंजाम देकर एक नज़ीर पेश कर सकती है.
इसी तरह कांग्रेस एक भरोसेमंद मेडिकल केयर स्कीम ला सकती है जो कि केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना से बेहतर साबित हो.
आगामी आम चुनाव में ऐसी योजना मतदाताओं के दिलों को जीतने में काफ़ी मददगार साबित होगी.
सरल शब्दों में कहें तो कांग्रेस के पास 2019 के चुनावों से पहले ये जताने का मौक़ा है कि अगर देश के मतदाता उसे मौक़ा दें तो वह क्या कर सकती है.
कांग्रेस को मिला नया मौक़ा
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. कांग्रेस के विधायकों की संख्या आधी रह गई. लेकिन इसके बावजूद भी जेडीएस की वजद से वह सत्ता में है.
कांग्रेस को ये हार इसलिए झेलनी पड़ी क्योंकि सिद्धारमैया सरकार ने नई योजनाओं के मुताबिक प्रशासनिक ताना बाना तैयार नहीं किया.
अब कांग्रेस को एक नया मौक़ा मिला है.
इन चुनाव नतीजों के और भी कई राजनीतिक मायने हैं. इन चुनावों में सफलता ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर जीत की मुहर लगाई है.
इस शानदार प्रदर्शन के बलबूते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करते हुए ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ समझौतों को अंजाम दे पाएंगे.
पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को किसी तरह की चुनौती नहीं थी. लेकिन अब उनके नेतृत्व पर चुनावी सफलता की मुहर भी लग गई है.
हालांकि, 2019 का लोकसभा चुनाव अभी भी पार्टी की पहुंच से दूर है. लेकिन इस चुनाव ने राहुल के नेतृत्व में एक नया विश्वास पैदा किया है.
अब कांग्रेस पार्टी उस स्थिति में है जब वह ये सोच सकती है वह क्या करना चाहती है और कहां पहुंचना चाहती है.
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