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एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़: चुनावी नतीजों के रुझान आने से पहले का हाल
भारत के पांच राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिज़ोरम और तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के रुझान थोड़ी देर में आने लगेंगे.
बीबीसी संवाददाताओं ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लोगों और नेताओं से बात करके नतीजों को लेकर जारी सियासी सरगर्मी जानने कोशिश की.
राजस्थान से नितिन श्रीवास्तव
हर चुनाव के पहले राजनीति की एक पुरानी लेकिन असरदार कहावत दोहराई जाती है, "आख़िर, ऊँट किस करवट बैठेगा?".
अगर बात राजस्थान या उस प्रदेश की हो जहाँ ऊँट ही ऊँट दिखाई पड़ते हैं, तो कहावत सीधे सवाल में तब्दील हो जाती है, "क्या इस बार भी वही होगा जो पिछले 20 सालों से हो रहा है?".
यही सवाल है राजस्थान के मतदाता से लेकर उस राजनेता की ज़ुबान पर जिसने इन विधानसभा चुनावों तक में शिरकत की है.
पिछले 20 सालों में हर मौजूदा सरकार को अगले चुनाव में मुँह की खानी पड़ी है, चाहे वो कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी.
भाजपा को लगता है वसुंधरा राजे की अगुवाई में बेहतरीन काम हुआ है. इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और राजनाथ सिंह जैसे स्टार प्रचारकों के क़द पर भी बीजेपी को भरोसा है.
दूसरी तरफ़ कांग्रेस को लगता है कि चार साल पहले युवा नेता सचिन पायलट को प्रदेश राजनीति की कमान सौंपने का फ़ैसला एकदम दुरुस्त था. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जैसे क़द्दावर नेता और युवा सचिन पायलट की जोड़ी से कांग्रेस आश्वस्त नज़र आ रही है.
अगर कांग्रेस चुनाव जीत जाती है तो शायद इन दोनों में से मुख्यमंत्री कौन बनेगा की जद्दोजहद विधानसभा चुनावों से कम नहीं होगी. लेकिन वो बाद की बात है.
इस सबके बीच जो एक चीज़ शायद सबसे बड़ी भूमिका अदा करेगी वो होगी निर्दलीय विधायकों का रुझान.
दोनों ही पार्टियों ने कई ऐसे लोगों को टिकट नहीं दिया है जो सम्भावित उम्मीदवार हो सकते थे और टिकट न मिलने पर पार्टी से किनारा कर निर्दलीय ही मैदान में हैं.
अगर इनमें से एक दर्जन या डेढ़ दर्जन भी चुनाव जीत गए तो गेंद न तो कांग्रेस न ही भाजपा बल्कि इन निर्दलीय विधायकों के पालों में जा गिरेगी.
मध्य प्रदेश से विनीत खरे
अगले कुछ घंटों में पता चलेगा कि बीते 15 सालों से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन पाएंगे या नहीं.
हालांकि, एग्जिट पोल के नतीजों पर राजनेता सार्वजनिक रूप से अविश्वास जताते आए हैं. मध्य प्रदेश के हालिया चुनावों में मतदान के बाद एग्जिट पोल के नतीजों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर बताई गई है.
इन एग्जिट पोल के नतीजे सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता निजी बातचीत में काफ़ी असहज दिखाई पड़ते हैं.
निजी बातचीत में बीजेपी नेता बताते हैं कि अगर बीजेपी मध्य प्रदेश का चुनाव हारती है तो इसके लिए शिवराज सिंह चौहान की घटती लोकप्रियता ज़िम्मेदार होगी.
बीजेपी के कई नेता निजी बातचीत में कहते हैं कि शिवराज सरकार की घोषणाओं को भी हार के लिए ज़िम्मेदार माना जाएगा क्योंकि वह बातें बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं.
कुछ नेता उन मुद्दों को भी गिनाते हैं जो कि हार के लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं. इन मुद्दों में किसानों की नाराज़गी, महंगाई, जीएसटी और नोटबंदी शामिल हैं.
हालांकि, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह सभी आलोचनाओं को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनकी पार्टी पूरे बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है.
वहीं, कांग्रेस कैंप ने एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद एक तरह से मान लिया है कि मध्य प्रदेश में उनकी ही सरकार बनने जा रही है.
कांग्रेस की ओर से एक होर्डिंग भी लगाई गई है, जिसमें लिखा गया है कि "कमलनाथ जी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार का अभिनंदन." ख़ास बात ये है कि इस होर्डिंग में कमलनाथ की तस्वीर राहुल गांधी से भी बड़ी थी.
विश्लेषकों के मुताबिक़, मतदान से पहले और बाद में मतदाताओं की चुप्पी बीजेपी के प्रमुख नेताओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है.
वहीं, कांग्रेस नेताओं ने भाजपा की बराबरी करते हुए बहुत बड़े-बड़े वादे कर दिए हैं जिनमें दस दिन में किसानों का लोन माफ़ करने वाला राहुल गांधी का वादा शामिल है.
मध्य प्रदेश की आर्थिक हालत ख़राब होने की स्थिति में कांग्रेस ऐसे वादे किस तरह पूरे कर पाएगी, ये सवाल करने पर कांग्रेस नेताओं की ओर से गोल-मोल जवाब ही आते हैं.
लेकिन मध्य प्रदेश की जनता किसे अपना मानेगी और किसे दरकिनार करेगी, ये तो अगले कुछ घंटों में ही सामने आ पाएगा.
छत्तीसगढ़ से सलमान रावी
जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं, उनमे से सबसे कड़ी टक्कर अगर कही जाए तो छत्तीसगढ़ में ही है. यहाँ अभी तक ये साफ़ नहीं हो पाया है कि इस बार किसका बोलबाला रहेगा. इसके कई कारण भी हैं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी पिछले तीन सालों से यानी वर्ष 2003 से विधानसभा के सभी चुनाव जीतती रही है.
लेकिन ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की जीत बहुत आसान रही हो.
वैसे तो छत्तीसगढ़ में केवल दो ही राष्ट्रीय दल आमने-सामने लड़ा करते थे. इस बार कांग्रेस से अलग हुए अजीत जोगी ने नई पार्टी बनायी और उनका गठबंधन बहुजन समाज पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से हुआ.
इस गठबंधन ने किसके वोटों में सेंध मारी है ये तो मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा. हलाकि इस गठबंधन को बहुत ज़्यादा सीटें तो नहीं मिल पाएंगी मगर अजित जोगी का दावा है कि वो 'किंग मेकर' की भूमिका में ज़रूर रहेंगे.
वहीं, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दावा कर रही हैं कि वो अपने बूते ही बहुमत हासिल कर लेंगी.
प्रदेश के 27 ज़िलों में मतगणना सुबह आठ बजे से शुरू हो जाएगी. हर केंद्र पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं.
कुलमिलाकर 1079 उम्मीदवारों के भाग्य का फ़ैसला होना है जिसमें सबसे ज़्यादा लोगों की नज़रें राजनांदगांव की सीट पर टिकी हुईं हैं क्योंकि यहाँ प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह का मुक़ाबला अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला के साथ हैं जिन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा.
लगभग 5184 मतगणनाकर्मियों को गिनती के काम में लगाया गया है. इनके अलावा 1500 पर्यवेक्षक भी तैनात किए गए हैं. सभी बड़े नेता अपने अपने चुनावी क्षेत्र में डटे हुए हैं और परिणामों की घोषणा के साथ ही उनका रायपुर आना शुरू हो जाएगा.
हार-जीत तो किसी न किसी दल की होनी ही है, मगर इस बार भी जीत का फ़ासला काफ़ी कम रहने का अनुमान लगाया जा रहा है. हो सकता है कि ये फ़ासला बड़ा भी हो. मगर ये तो कुछ ही घंटों की बात है.
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