राजस्थान चुनावः रहेंगी वसुंधरा या होगी विदाई?

    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान में अब नई सरकार चुनने में बहुत कम वक़्त बचा है. सत्तारूढ़ बीजेपी ने दावा किया है कि वो फिर से सत्ता में लौट रही है.कांग्रेस की नज़र में यह बीजेपी की विदाई वेला है.

राजनीति के जानकार कहते हैं कि राज्य में व्यवस्था विरोधी रुझान बहुत मजबूत है. यह बीजेपी का रास्ता रोक सकता है. चुनावी दंगल में इन दोनों दलों के कुछ विद्रोही भी मैदान में है. इनमें चार मंत्री भी शामिल हैं.

रियासत काल में इस मरुस्थली भूभाग ने अनेक युद्ध देखे हैं. मगर यह चुनावी जंग है. इसमें कोई दो हज़ार से ज़्यादा प्रत्याशी मैदान में हैं. राष्ट्रीय दलों के अलावा ऐसे अनेक दल उभर आए हैं, जिन्होंने अपने उम्मीदवार खड़े कर चुनावी परिदृश्य को उलझन भरा बना दिया है.

निर्दलीय भी बहुत हैं. नई बनी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और भारत वाहिनी पार्टी ने परस्पर समझ पैदा कर 123 उम्मीदवार खड़े किए हैं. निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल की इस नई पार्टी ने कुछ स्थानों पर मुक़ाबले को तिकोना बना दिया है.

जानकार यह हिसाब नहीं लगा पा रहे हैं कि इन सबका चुनाव परिणामों पर कैसा और कितना असर होगा. बहुजन समाज पार्टी ने भी 190 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार मैदान में उतारे है.

सत्ता में अपने पांच साल मुकम्मल कर चुकी बीजेपी फिर से सरकार बनाने को बेताब है. जबकि कांग्रेस अपना वनवास खत्म करना चाहती है. शुरुआती चुनावी सर्वेक्षणों में बीजेपी को अपनी प्रतिद्वंदी कांग्रेस पार्टी से पिछड़ते हुए बताया गया था.

मगर अब बीजेपी का दावा है कि चुनाव प्रचार के बाद फ़िज़ां बदल गई है. बीजेपी प्रवक्ता जितेंद्र श्रीमाली कहते है, "हम जीत रहे हैं."

पर कैसे? वो कहते हैं कि कांग्रेस ने मुद्दों से भटकाने की कोशिश की थी, लेकिन पहले हमने गौरव यात्रा निकाल कर जनता के समक्ष सरकार के काम काज का लेखा पेश किया. फिर लाभार्थी सम्मेलन किया और अपनी उपलब्धियां गिनाईं. जनता बीजेपी को फिर सत्ता सौंपने जा रही है.

माहौल बनाने का प्रयास

चुनाव प्रचार में एक तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी-अपनी पार्टी के लिए वोट मांग रहे थे.

प्रचार में कोई कमी न रह जाए, इसलिए दोनों दलों के देशभर से आये प्रमुख नेताओं ने जगह-जगह सभाएं कीं, रोड शो किए और अपने पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया.

इसमें नेता तो नेता, फ़िल्मी सितारे भी शामिल थे. कांग्रेस प्रवक्ता सत्येंद्र राघव कहते है, "हमारे पास जो फ़ीडबैक है वो यह बताता है कि कांग्रेस भारी बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है."

"बीजेपी मीडिया के ज़रिए यह प्रचारित करने का प्रयास कर रही है कि अब हालात बदल गए हैं. मगर धरातल पर ऐसा कुछ नहीं है."

जोड़-तोड़ और विद्रोह

राजस्थान की इस चुनावी जंग में बीजेपी सरकार के चार मंत्री पार्टी से बग़ावत कर मैदान में डटे हैं. बीजेपी का एक संसदीय सचिव और एक विधायक भी विद्रोह कर चुनाव मैदान में है.

कांग्रेस में भी कुछ पूर्व मंत्री और विधायक भी टिकट न मिलने पर बाग़ी हो गए और पार्टी प्रत्याशियों को चुनौती दे रहे हैं. मगर जानकारों की नज़रें विधायक बेनीवाल की पार्टी पर भी लगी है.

बेनीवाल प्रभावशाली जाट समुदाय से आते हैं. उनकी पार्टी ने पचास से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. इससे जानकारों के लिए यह आकलन करना कठिन हो गया है कि बेनीवाल की पार्टी के प्रत्याशी परिणामों पर क्या असर डालेंगे.

इन चुनावों पर नज़र रख रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय बोहरा कहते है, "जहाँ भी हमने देखा है, रोज़गार एक बड़ा मुद्दा है. किसान खफ़ा हैं और दलित भी नाराज़ हैं. ये जो तीन वर्ग हैं, बेरोज़गार, किसान और दलित, इनकी नाराज़गी सत्तारूढ़ पार्टी को भारी पड़ सकती है."

"यह नाराज़गी सिर्फ राज्य सरकार के खिलाफ़ ही नहीं बल्कि केंद्र के विरुद्ध भी है. लोग रोज़गार, जीएसटी और नोटबंदी को लेकर केंद्र सरकार से भी खफ़ा हैं."

बोहरा कहते हैं, "लोग कांग्रेस के प्रति भी बहुत उत्साहित नहीं हैं. चूँकि लोग बीजेपी सरकार से नाराज है, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते है."

पाथेय कण पत्रिका के सम्पादक केएल चतुर्वेदी इससे सहमत नहीं हैं. वो कहते हैं, "बीजेपी वापस सत्ता में लौट रही है. क्योंकि सरकार ने बहुत काम किया है. जनता को लगता है कि बीजेपी को जिताना राष्ट्र के हित में है."

क्या व्यवस्था विरोधी रुझान का फ़र्क नहीं पड़ेगा? वो कहते हैं कि एंटी इंकम्बेंसी हर सरकार के विरुद्ध होती है. अतीत में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ भी रही और वो क़ामयाब होते रहे. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी जीतती रही है. यहाँ भी बीजेपी जीतेगी.

बदलते गए मुद्दे

राज्य में अपनी ताज़पोशी की ख्वाहिश लेकर निकले इन दोनों पार्टियों के नेताओं ने शुरू में विकास को मुद्दा बनाने की बातें कही, लेकिन देखते-देखते इसमें, मंदिर, जाति और धर्म-आस्था आ गए और बात बढ़ी तो गोत्र भी शामिल कर लिया गया.

बीजेपी ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकास का डबल इंजन बताया है.

पर क्या इससे माहौल बदल गया है?

जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजीव जैन कहते है, "मुझे नहीं लगता कि ज़मीन पर कुछ बदला है. यह बीजेपी की शैली हो सकती है कि अपने कार्यकर्ताओ में जोश भरा जाए. पर धरातल पर लोग सरकार की कार्यशैली से बहुत नाराज हैं. इसका चुनाव पर असर पड़ना लाज़िमी है."

यह वो घड़ी है जब सियासी पार्टियाँ हर ज़रूरतमंद आँख में सुनहरे ख्वाब उतारती है. इसमें वादे हैं, दावे हैं.अब यह मतदाता की अंगुली तय करेगी कि उसे मशीन पर लगा कौन सी पार्टी का बटन पसंद है.

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