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राजस्थान चुनाव में नेताओं के बिगड़ते बोल
- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान में राजनीति की भाषा के गिरते स्तर पर सत्तारुढ़ बीजेपी और विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने चिंता प्रकट की है. लेकिन, दोनों पार्टियां इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार बता रही हैं.
समाज शास्त्री कहते हैं कि मौजूदा राजनीति की भाषा ने समाज में भय और आक्रामकता पैदा की है जो समाज को मॉब लिंचिंग तक ले जाती है.
राजनीति में अपनी जगह तलाश रही महिलाओं का कहना है कि भाषा में जब मर्यादा के तट बंध टूटते हैं, तो सबसे अधिक महिलाएँ ही निशाने पर रहती हैं.
चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता के प्रबल दावेदार दोनों दलों ने चुनाव आयोग से एक-दूसरे के कुछ नेताओं के विवादित बयानों पर शिकायत की है. इनमें से कुछ मामलों में आयोग ने संबंधित नेताओं को नोटिस देकर सफाई भी मांगी है. मगर यह सिलसिला रुक नहीं रहा है.
सत्तारुढ़ बीजेपी ने इन चुनावों में कथित रूप से विवादित वाणी निकालते रहे अपने तीन विधायकों के टिकट काट दिए. इनमें धन सिंह रावत मंत्री है और ज्ञान देव आहूजा और बनवारी लाल सिंघल अलवर जिले से विधायक हैं.
मगर बीजेपी ने आहूजा को तुरंत पार्टी संगठन में उपाध्यक्ष पद देकर नवाज़ दिया. वहीं राहुल गांधी के बारे में विवादित बोल बोलने वाले बाड़मेर में बायतु से विधायक कैलाश चौधरी को फिर से उम्मीदवार बनाया है. जानकार कहते हैं कि जिन विधायकों का टिकट काटा गया है, उसके कारण कुछ अलग हैं.
क्यों काटे गए टिकट
बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी से पूछा गया कि क्या इन विधायकों के टिकट विवादित बोल के कारण काटे गए हैं?
त्रिवेदी ने इससे इंकार किया और कहा, ''आप यह कैसे कह सकते हैं? आहूजा को अभी उपाध्यक्ष बनाया गया है/ यहां पर कोई भाषा का विषय नहीं है. संगठन अपने अनुसार यह तय करता है कि किस कार्यकर्ता को किस भूमिका में रखना है, भूमिका और दायित्व में परिवर्तन संगठन में एक सहज प्रक्रिया है. इससे अधिक इसमें और कुछ देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए.''
हाल ही में कांग्रेस के पूर्व मंत्री सी पी जोशी के भाषण और कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के बयानों की शिकायत की गई है.
वहीं कांग्रेस ने भी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के भाषण के कुछ अंशों पर आपत्ति करते हुए शिकायत की है. लेकिन हर नेता ने विवाद सामने आने के बाद सफाई में कहा उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है.
कोई कहता है कि सियासत सेवा है तो कोई इसे व्यापार बताता है. मगर व्यापार भी कहता है मीठा बोल पूरा तौल. कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा इस पर कहते हैं कि इस तरह की बदज़ुबानी पहले कभी राजनीति में नहीं होती थी.
वे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के दौर को याद कर कहते हैं, ''पहले बीजेपी नेता वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने, हमने वो दौर भी देखा है, कभी भी ऐसी बदज़ुबानी एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं होती थी. लेकिन, अब एक नयी परंपरा डाली जा रही है. अफ़सोस की बात है कि यह सर्वोच्च नेतृत्व से आती है और इस सरकार में हमने देखा है कि जो भी ऐसी ज़ुबान इस्तेमाल करता है, उसकी पदोन्नति हो जाती है.''
साधु संत पीर फ़कीर सदियों से मीठी जबान का पैगाम देते रहे हैं. मगर सियासत इसे कहां मानती है. बीजेपी प्रवक्ता त्रिवेदी ने कहा, ''सभी दलों का दायित्व है कि वे भाषा का स्तर बनाए रखें. जो पार्टियाँ बड़ी हैं, उनका उत्तरदायित्व भी बड़ा है. इसमें कांग्रेस और बीजेपी बड़ी पार्टियां हैं, उनका उत्तरदायित्व और ज़्यादा है.''
त्रिवेदी कहते हैं कि भाषा का गिरता स्तर चिंता की बात है मगर वो पूछते हैं कि इसकी शुरुआत कब हुई? वो कहते हैं कि जब सर्वोच्च स्तर पर बैठे लोग खुलेआम अभद्र भाषा का प्रयोग करेंगे तब ऐसी स्थिति उतपन्न होगी ही. याद कीजिए साल 2007 को जब सोनिया गांधी जी ने नरेंद्र मोदी जी के लिए कैसे शब्द इस्तेमाल किये थे.
भाषा के गिरते स्तर का महिलाएं निशाना
भारत में शब्द को ब्रह्म माना जाता है. मगर अब शब्द ब्रह्म की सियासत के हाथों बेकद्री हो रही है. बीजेपी नेता और राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रहीं सुमन शर्मा कहती हैं कि भाषा के गिरते स्तर से सबसे ज्यादा महिलाएँ ही दुखी हैं.
वो कहती हैं, ''मैं किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं लेती. मगर जो लोग लाखों-लाखों वोट से जीत कर आते हैं, वे जनता के नेता होते हैं. जब मंचों पर ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो दुःख होता है. महिलाओं के प्रति तो सोच इतनी भद्दी हो गई है कि वो राजनीति में कैसे आएंगी यह भी एक बड़ा प्रश्न बन गया है.
सुमन शर्मा कहती हैं, ''जो महिलायें सोचती थीं कि वो आधी आबादी हैं और राजनीति का हम सफर बनाना चाहती हैं, वो बहुत चिंतित हैं क्योंकि कोई किसी को नचनिया कह रहा है तो कोई कुछ और कह रहा है.
समाज शास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता कहते हैं, ''इस भाषा ने समाज में डर और आक्रामकता पैदा की है, आतंक की स्थितियों को जन्म दिया है. इस भाषा ने ग़ैर संस्थागत ताकतों को सड़कों पर अपनी हिंसा दिखाने के लिए एक स्पेस दिया है.
डॉ गुप्ता कहते हैं, ''भाषा से शुरू हुई हिंसा को आप मॉब लिंचिंग तक ले आये. समूहों में टकराव और ध्रुवीकरण तक ले आए. अमरीका में ट्रंप भी वो ही भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं.
डॉ गुप्ता कहते हैं कि यह तो गाली से भी बुरा है क्योंकि कुछ समाजों में गाली संस्कृति का हिस्सा हैं.
गंगाघाट पर घूमते कबीर सैकड़ों साल पहले कह गए हैं, ''शब्द संभाले बोलिए, शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द औसध करे, एक करे घाव. अब यह सियासत पर मयस्सर करता है कि वो दवा दे या दर्द.
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