दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई धर्मसभा की आंखों देखी

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली से
दुदुंभी बजाती महिला, हाथों में ध्वज पताका लिए युवक, कुछ भगवा टी-शर्ट और कैप्स धारण किए हुए और राम के गीत गा रहे नौजवान, सब हिस्सा थे उस रैली का जो रविवार को विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित की थी.
अयोध्या धर्मसभा में जमा हुई कम भीड़ से सचेत संघ परिवार से जुड़े संगठन ने किसी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी थी - नतीजा: तुर्कमान गेट से राजघाट को जानेवाली सड़क पर घंटे-आधे घंटे तक बस रैली में शामिल होने के लिए आनेवालों की क़तार ही नज़र आई.
अगर भीड़ बड़ी थी, तो धर्मसभा का आयोजन भी भव्य था - विशाल स्टेज जिसपर कम से कम दो दर्जन हिंदू साधु-संत बैठे थे, मैदान के चारों कोनों पर पुलिस के मचान और जगह-जगह लगे विशालकाय टीवी स्क्रीन, जिसपर बारी-बारी से मंच पर भाषण दे रहे वक्ता और भीड़ को देखा जा सकता था.
रैली में शामिल होनेवालों के लिए कुर्सी की व्यवस्था भी की गई थी.
अलग-अलग साधु-संतों के भाषणों के बाद बारी आई आरएसएस में नंबर दो के सबसे बड़े अधिकारी सह- कार्यवाह भैयाजी जोशी के बोलने की.
भैयाजी जोशी ने "मंदिर वहीं बनाएंगे की घोषणा करनेवाले जो लोग आज सत्ता में बैठे हैं" को याद दिलाया कि लोकतंत्र में संसद का भी अधिकार है.
संघ का भी समर्थन
सत्ता में बैठे उन लोगों को संसद के दायित्व की याद दिलाते हुए सुरेश जोशी ने कहा कि वो साधु-संतों के ज़रिए इस मामले पर लाये गए प्रस्तावों से पूरी तरह सहमत हैं.

जय श्री राम और मंदिर वहीं बनाएंगे के नारों के बीच एक के बाद एक साधु संत ने कहा कि हिंदू समाज का धैर्य समाप्त हो गया है और अब सरकार को चाहिए कि वो अयोध्या में एक भव्य मंदिर के निर्माण के लिए संसद में क़ानून लाए.
उनकी मांग थी कि ये क़ानून संसद के इसी यानी शीत सत्र में ही आना चाहिए और अगर विधेयक संसद में पास न भी हो पाता है तो सरकार को उसकी फर्क़ नहीं होनी चाहिए क्योंकि उससे ये साफ़ हो जाएगा कि कौन-कौन से राजनीतिक दल मंदिर के समर्थन में हैं और कौन विरोध में.
हिंदू संतों की तरह रैली में आनेवाले संयुक्ता केसरी, रोहन केसरी और बहुत सारे लोग मंदिर निर्माण पर क़ानून लेकर बहुत साफ़ राय रखते थे.
कभी न कभी मंदिर बनेगा ज़रूर
बिहार में जन्मी और बलिया में ब्याही संयुक्ता केसरी दिल्ली में ही राम मंदिर को लेकर तीन या चार रैलियों और प्रदर्शनों में शामिल हो चुकी हैं लेकिन अब भी चाहती हैं कि मामला अगर सुलह सफ़ाई से तय हो जाए तो ठीक रहेगा.
विवेक विहार, दिल्ली से रैली में शामिल होने आए रोहन कुमार का कहना था कि 10 बार हो या 15 बार वो ऐसी रैलियों में तबतक सम्मलित होते रहेंगे जबतक अयोध्या में राम मंदिर बन नहीं जाता.
"कभी न कभी मंदिर बनेगा तो ज़रूर," विवेक कहते हैं.

जब ये बातें हो रही होती हैं तो उनके साथ खड़े नौजवान उत्तेजित हो जाते हैं और कहते हैं सुप्रीम कोर्ट आतंकवादियों की सुनवाई आधी रात को कर सकती है लेकिन राम मंदिर केस के मामले में बोलती है कि ये उसकी प्राथमिकता में नहीं.
अक्टूबर में जब राम मंदिर का टाइटिल सूट सुप्रीम कोर्ट के सामने आया तो उसने उसकी तारीख जनवरी तक के लिए टाल दी थी.
सामग्री् उपलब्ध नहीं है
सोशल नेटवर्क पर और देखिएबाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.पोस्ट Facebook समाप्त
सुप्रीम कोर्ट में है मामला
पिछले दिनों एक चुनावी सभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कांग्रेस के एक राज्यसभा के सदस्य सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में देरी की वजह बने.
नरेंद्र मोदी का इशारा कपिल सिब्बल की तरफ़ था जिन्होंने सुन्नी वक्फ़ के वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि बाबरी-मस्जिद राम जन्मभूमि का मामला मई 2019 के तक टाल दिया जाना चाहिए क्योंकि बीजेपी राम मंदिर के मामले को राजनीतिक तौर पर भुनाना चाहती है.

इधर रामलीला मैदान में भैयाजी जोशी के भाषण के बाद बोलने आए एक संत ने कह दिया कि मोदी जी ने हमसे वादा किया था कि वो राममंदिर बनवाएंगे चूंकि वो ऐसा नहीं कर पाए तो हम कहना चाहते हैं कि हम मोदी जी को तबतक नहीं छोड़ेंगे जबतक मंदिर निर्माण का काम पूरा नहीं हो जाता.
पास ही खड़े दीपक कुमार राजूपत से मैंने पूछा कि वो संत के इस बयान पर क्या कहना चाहेंगे तो वो बोले, "मंदिर भी बनेगा और मोदी जी प्रधानमंत्री भी बनेंगे."
उनके पास खड़े युवक इस सवाल पर कि आख़िर साढ़े चार साल में मोदी साहब क्यों नहीं बना पाए खीझकर कहते हैं अरे तब नहीं बना पाए पर अब बनाएंगे न.
उनके साथी कहते हैं, 70 सालों में नहीं बना तो आपलोग कुछ नहीं कहते, अब मोदी से पांच सालों में सवाल पूछने लगे?
तो कितना समय मिलना चाहिए मोदी जी को, जबाव था, कम से कम 10 साल तो मिलने ही चाहिए.















