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तेलंगाना: चुनाव के पहले क्यों हो रही है उल्लुओं की तस्करी
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत में चुनाव के दौरान अधिकारी आम तौर पर ऐसे 'बेशकीमती सामान' की तस्करी रोकने में व्यस्त रहते हैं जिन्हें वोटरों को प्रलोभन देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
लेकिन कर्नाटक के अधिकारी इन दिनों पड़ोसी राज्य तेलंगाना में की जा रही उल्लुओं की तस्करी रोकने में जुटे हैं. तेलंगाना में शुक्रवार को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है.
कर्नाटक पुलिस और वन अधिकारियों को कम से कम छह लोगों ने जानकारी दी है कि भारतीय उल्लू की एक प्रजाति की तेलंगाना में 'बहुत मांग' है. उल्लुओं की मांग इनकी 'खूबियों' के लिए नहीं बल्कि इस वजह से है कि 'उल्लू के शरीर के हिस्से विरोधी उम्मीदवार के लिए दुर्भाग्य की वजह बन सकते हैं.'
कर्नाटक के कलबुर्गी ज़िले के सेडम की पुलिस ने बीबीसी को बताया, "उन छह लोगों में से दो ने लोगों ने बागलकोट ज़िले के जामखंडी में दो पक्षियों को इस दौरान बेचने के लिए ही पाला है. "
चुनाव में काला जादू?
इन सभी को सेडम से गिरफ़्तार किया गया. ये इलाका तेलंगाना की सीमा से लगा हुआ है. तेलंगाना में शुक्रवार 7 दिसंबर को 119 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान होना है.
कलबुर्गी में वन विभाग के सहायक वन संरक्षक रामकृष्ण यादव ने बताया, "उनका कहना है कि तेलंगाना से एक व्यक्ति ने उनसे फ़ोन पर संपर्क किया था. उसने इन लोगों को बताया था कि विरोधी उम्मीदवार पर काला जादू करने के लिए उल्लू की ज़रूरत है."
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, "उनके संपर्कों के ज़रिए राजनेता तक पहुंचना मुश्किल काम होगा क्योंकि हम नहीं जानते कि क्या वो नेता ही ऐसा करना चाहते थे या फिर उनके कैंप के किसी और व्यक्ति की ऐसी चाहत थी."
ये अधिकारी मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं है. ऐसे में उन्होंने अपना नाम नहीं ज़ाहिर करने की गुज़ारिश की.
यादव ने बताया, "विरोधी खे़मे में डर फैलाने के लिए भी उल्लूओं का इस्तेमाल होता है. इससे ये माना जाता है कि विरोधी खेमे में कोई उनके ख़िलाफ काला जादू कर रहा है. ये कोशिश विरोधी के हौसले तोड़ने के लिए की जाती है."
यादव के सहयोगी फिलहाल दोनों राज्यों की सीमा की निगरानी में जुटे हैं.
उल्लुओं की अवैध तस्करी
भारत में उल्लुओं की कुल तीस प्रजाति पाई जाती हैं. इनमें से दो प्रजातियां- ईगल आउल और बार्न आउल- की अंधविश्वास और काला जादू के लिए अवैध बाज़ार में ख़ासी मांग है.
इस चलन से विशेषज्ञ भी चिंतित हैं.
वनचरों के वैध और अवैध व्यापार पर नज़र रखने वाले संगठन ट्रैफ़िक इंडिया के आला अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि अवैध व्यापार किस सत्र पर हो रहा है, ये बताने के लिए कोई सही आंकड़े नहीं हैं.
भारतीय वन सेवा (आईएफ़एस) के अधिकारी और ट्रैफ़िक इंडिया के प्रमुख डा. साकेत बडोला ने बताया, "हमारी अनौपचारिक जानकारी के मुताबिक़ अवैध व्यापार तेज़ी से बढ़ रहा है. उत्तर भारत के राज्यों में ये काफी बड़े पैमाने पर हो रहा है. दक्षिण भारत में भी इसकी मौजूदगी है. तंत्र करने वाले उल्लुओं का इस्तेमाल करते हैं."
डा. बडोला ने बताया, "दिवाली के दौरान उल्लुओं की मांग बढ़ जाती है. उन्हें धन की देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है. बीते महीने दीवाली के पहले हमने उल्लुओं के इस्तेमाल के ख़िलाफ चेतावनी जारी की थी."
इस एडवाइज़री में कहा गया था कि उल्लुओं को अवैध तरीक़े से रखना और उनका कारोबार वन जीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत अपराध है. इसके साथ पक्षी-विज्ञानी अबरार अहमद का एक शोध पत्र भी जारी किया गया था जिसमें उन्होंने उल्लुओं के शरीर के उन 39 हिस्सों का जिक्र किया है, जिनका इस्तेमाल काला जादू में किया जाता है.
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के पूर्व निदेशक और अबरार अहमद के रिसर्च गाइड डा. असद आर रहमानी ने बीबीसी को बताया, "उल्लुओं के पैर के नाखून, खून और चोंच का अलग अलग धर्मों में अलग तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है. ज़्यादातर धर्म उल्लुओं को अपशकुन की तरह देखते हैं. इसकी वजह ये है कि ये अंधेरी और उजाड़ जगह में रहते हैं. लोग मानते हैं कि ये जगह उल्लुओं के साथ आए दुर्भाग्य की वजह से उजड़ गईं. ये मान्यता सही नहीं है."
डा. रहमानी कहते हैं, "सिर्फ भारतीय प्रायद्वीप में ही उल्लू को दुर्भाग्य से जोड़कर देखा जाता है. पश्चिमी देशों में उल्लू को 'बुद्धिमान' माना जाता है. वहां कहावत भी है, 'उल्लू की तरह बुद्धिमान.' लेकिन हमारे यहां मान्यता अलग है. यहां किसी का अपमान करने के लिए उल्लू से तुलना की जाती है. मसलन 'उल्लू की तरह मूर्ख' या फिर 'उल्लू का पट्ठा (बेटा)'."
कम हो रहे हैं उल्लू
डा. रहमानी कहते हैं कि इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) में उल्लू की अहमियत को कोई नहीं समझता है. 'उल्लू बड़े चूहों, सांपों और कीड़ों को खाते हैं. उल्लुओं की कुछ प्रजातियां अच्छे पर्यावरण का संकेत देती हैं.'
डा. रहमानी कहते हैं, "उल्लू दुर्लभ होते जा रहे हैं. इसकी वजह ये है कि उनकी प्रजनन दर धीमी है. बड़े उल्लू एक साल में सिर्फ एक या दो उल्लुओं को जन्म देते हैं. कई बार ऐसा दो साल में होता है. उन्हें शिकार से भी ख़तरा है."
डब्लूडब्लूएफ ट्रैफिक के कॉर्डिनेटर शरत बाबू कहते हैं कि उन्होंने ये देखा है कि उल्लुओं की 'आंख में पिन चुभोई जा रही है या फिर उनके पंख तोड़े जा रहे हैं. अगर कोई किसी को मात देना चाहता है तो दूसरे व्यक्ति का एक कपड़ा उल्लू को बांध दिया जाता है और उसे उम्मीदवार के घर के आगे फेंक दिया जाता है. ऐसा करने की बड़ी कीमत ली जाती है.'
अवैध बाज़ार में उल्लुओं को 'टू व्हीलर' कहा जाता है. हालांकि अंधविश्वास के लिए जुल्म सिर्फ उल्लुओं पर ही नहीं होता. कछुए और कुछ अन्य जानवरों को भी जुल्म का शिकार होते हैं.
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