आंध्र और तेलंगाना में छात्र आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

    • Author, दीप्ति बत्तिनी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बीते दो महीनों में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में साठ से अधिक छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. एक बाल अधिकार संस्था के अनुसार ये सभी छात्र मेडिकल और आईआईटी जैसे संस्थानों में दाखिले की तैयारी कर रहे थे और प्रीपेरटरी कॉलेजों में पढ़ रहे थे.

17 साल के सचिन (बदला हुआ नाम) जूनियर कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं. उन्होंने इसी साल सितंबर में आत्महत्या करने की कोशिश की. वो कहते हैं कि प्रीपेरटरी स्कूल में उनके साथ जो व्यवहार किया जा रहा था वो बर्दाश्त करना मुश्किल था.

वो कहते हैं, "परीक्षा में फेल होने पर हमें अपमानित किया जाता है, भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है. जो बच्चे परीक्षाओं में बेहतर करते हैं उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है."

वो कहते हैं कि एक बार जब वो ब्रेक के दौरान अपने साथी छात्रों के साथ बात कर रहे थे तब उन्हें पकड़कर दूसरे कमरे में ले जाया गया. कमरे में तीन टीचरों ने उन्हें मारा और 'अनुशासनहीन' कहा.

वो कहते हैं कि टीचर्स ने उन्हें निलंबित करने की भी धमकी दी.

इस घटना के बाद जब सचिन घर पहुंचे तो उन्होंने आत्महत्या करने के बारे में सोचा. वो कहते हैं, "हम पर परीक्षा में बढ़िया प्रदर्शन करने का काफी दबाव रहता है. हम लगभग पूर दिन ही क्लासेस में होते हैं, हमें कोई ब्रेक भी नहीं मिलता."

सचिन के साथ कमरे में उनके पिता भी बैठे थे जो ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे. परदे के पीछे से सचिन की मां झांक रही थीं. दोनों थके हुए थे और बेहद दुखी नज़र आ रहे थे.

सचिन कहते हैं कि हम छात्रों का दुख सुनने वाला कोई नहीं. वो कहते हैं, "हमें बस साल में एक ही बार खेलने को मिलता है."

तनाव से जूझ रही हैं युवा ज़िंदगियां

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था बालाला हक्कुलु संगम के अनुसार बीते साठ दिनों में दो दक्षिण भारतीय राज्य तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कम से कम 60 छात्र अपनी जिंदगी ख़त्म कर चुके हैं.

हैदराबाद स्थित इस संस्था के चेयरमैन अच्युत राव कहते हैं, "कई छात्र ये कहते हुए इन प्रीपेरटरी कॉलेजों को छोड़ चुके हैं कि वो कॉलेज के सख्त प्रशासन और पढ़ाई का दबाव नहीं झेल पा रहे हैं."

इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए होने वाली एंटरेंस परीक्षाएं बेहद कंपीटीटिव हो गई हैं.

साल 2017 में इन दोनों राज्यों में कुल मिला कर देढ़ लाख छात्रों ने एंटरेंस परीक्षाएं दी थीं लेकिन उनमें से मात्र तीन हज़ार छात्र ही परीक्षाओं में पास हो पाए.

लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली इन एंटरेंस परीक्षाओं को पास करने के लिए दो लाख से भी अधिक छात्र प्रीपेरटरी कॉलेजों में कोचिंग क्लासेस कर रहे हैं.

तेलंगाना राज्य सरकार ने 146 निजी जूनियर कॉलेजों को नियमों का उल्लघंन करने के संबंध में नोटिस जारी किए हैं.

सरकार के अनुसार इन कॉलेजों में सुबह से छह बजे से ले कर रात के दस बजे तक छात्रों की क्लासेस हो रही हैं जबकि सरकार के नियमों अनुसार क्लासेस सवेरे 9 बजे से शाम के 4 बजे तक ही होनी चाहिए.

इस कॉलेजों में छात्रों के लिए ज़रूरत के अनुसार बाथरूम जैसी साधारण सुविधाएं भी नहीं हैं.

कॉलेजों की हालत

तेलंगाना बोर्ड ऑफ़ इंटरमीडिएट एजुकेशन के स्क्रेटरी डॉक्टर ए अशोक ने इस महीने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर बात की. उन्होंने कहा, "हमने देखा कि बच्चों को उनके खुद के लिए समय ही नहीं मिल रहा है और उन पर पढ़ाई का काफी दवाब है."

आंध्र प्रदेश सरकार ने रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डी चक्रपाणी के नेतृत्व में दो-सदस्यीय कमिटी का गठन किया है जो इस बात की जांच करेगी कि छात्र आत्महत्या जैसे कदम क्यों उठा रहे हैं.

इसी साल मई में कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की. कमिटी ने सिफारिश की कि प्रीपेटरी कॉलेजों में कम परिक्षाएं होनी चाहिए और साथ ही छात्रों को रोज़ खेलने या योगा करने का समय दिया जाना चाहिए.

राज्य सरकार ने अब तक इन सिफारिशों को लागू नहीं किया है.

लेकिन ये पहली बार नहीं है कि इस मुद्दे पर चिंता ज़ाहिर करते हुए जांच के लिए कोई कमिटी बनाई गई है. साल 2007 में आंध्र प्रदेश सरकार ने नीरदा रेड्डी कमिटी बनाई थी जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा था, "छात्रों को देखो तो लगता है कि उन्हें अगवा कर यातना शिविरों में रख दिया गया है."

छात्र भी कर रहे हैं विरोध

दोनों राज्यों के छात्र संगठन मांग कर रहे हैं कि सरकार निजी कॉलेजों को नियंत्रित करे. लेकिन कॉलेजों के प्रशासन का कहना है कि सरकार केवल छात्रों की मांग मान रही है.

चैतन्य एडुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स के कार्यकारी डीन वी कुमार कहते हैं कि कॉलेज छात्रों के ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं डालते. वो कहते हैं कि छात्रों के अभिभावक और खुद छात्र अपने लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य बनाते हैं.

वो कहते हैं, "समस्या तब शुरू होती है जब उनका प्रदर्शन उनकी उम्मीदों के अनुसार नहीं होता. हम इस मुद्दे पर बातचीत करने के लिए तैयार हैं लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि कॉलेज छात्रों पर दबाव बनाता है."

एक छात्र की कहानी इस मुद्दे पर और रोशनी डालती है.

डी वरुण तेजा चौधरी ने ज्वाएंट एंटरेंस परीक्षा में पूरे भारत में नौंवां स्थान हासिल किया. वो खुश हैं कि वो अब आईआईटची मद्रास में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं.

लेकिन वो कहते हैं कि उन्हें अपने सपने को पूरा करने के लिए 'कोचिंग लेनी पड़ी और कड़ी मेहनत' करनी पड़ी. वो कहते हैं, "मेरे लिए यह काफी तनावपूर्ण वक्त था लेकिन मेरे माता-पिता और दोस्त काफी सपोर्टिव थे."

वो कहते हैं, "कुछ निजी कॉलेजों की शाखाएं दोनों तेलूगु भाषी राज्यों में हैं लेकिन बस एक-दो कॉलेज के छात्र ही परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं. इन टॉप-परफॉर्मिंग कॉलेजों में अन्य कॉलेजों के मुकाबले अधिक अनुभवी टीचर्स हैं."

"अगर एक अच्छे छात्र को इन अनुभवी टीचरों के साथ कदम से कदम मिलने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है तो आप सोच सकते हैं कि जो छात्र पढ़ाई में औसत हैं उनका क्या हाल होता होगा."

उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश

जाने माने शिक्षाविद चुक्का रमैय्या कहते हैं कि अब शिक्षा किताबें रटने और परीक्षा पास करने तक ही सामित हो गया है, अब ये ज्ञान को बढ़ाने का ज़रिया नहीं रहा.

वो कहते हैं, "जब शिक्षा मुनाफे की चीज़ बन जाए तो उसके साथ कई जटिलताएं आ जाती हैं. कंपीटिशन उन जटिलताओं सं ही एक है."

वो मानते हैं कि वक्त आ गया है कि हम साथ मिल कर काम करें ना कि एक दूसरे के प्रतियोगी बन कर. वो कहते हैं "इंसान तभी सीख पाता है जब खुल कर चर्चा करना संभव होता है लकिन अब शिक्षा बस उपदेश देने और सुनने जैसा हो गया है."

हैदराबाद स्थित मनोवैज्ञानिक निरंजन रेड्डी कहते हैं कि वो हर दिन कम से कम छह छात्रों की काउंसेलिंग करते हैं.

वो कहते हैं, "छात्र अपने लिए ऐसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य बना लेते हैं. और फिर ऐसे अभभावक भी हैं जिन्हें लगता है कि कैरियर बनाने के दो ही रास्ते हैं- एक डॉक्टर बनना और दूसरा इंजीनियर बनना."

तेलंगाना बोर्ड ऑफ़ इंटरमीडिएट एजुकेशन ने निजी जूनियर कॉलेजों को आदेश दिया है कि वो जल्द से जल्द कॉलेज में काउंसेलर नियुक्त करें.

आदेश के अनुसार, "अभिभावकों को अपने सपने पूरा करने के लिए अपने बच्चों को हथियार नहीं बनाना चाहिए."

लेकिन कई अभिभावकों के लिए एक बढ़िया कॉलेज से मिलने वाली इंजीनियरिग की डिग्री सफलता का प्रमणपत्र होती है.

हालांकि वो कहते हैं कि अपने बच्चे पर वो उनकी काबिलियत से अधिक दबाव नहीं डालते, लेकिन वो मानते हैं कि उनके बच्चे को सफल होने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए.

रात के आठ बजे गौरी शंकर एक निजी कॉलेज के समने पहुंचे जहां उनका बेटा पढ़ता है. वो कहते हैं, "कड़ी मेहनत के बिना कुछ भी संभव नहीं है. मेरा बेटा कॉलेज में देर तक रहेगा तभी तो वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे पाएगा और अपने डाउट भी दूर कर पाएगा."

वो कहते हैं, "अगर आज वो पढ़ाई को अपने ज़िंदगी की पहली प्राथमिकता नहीं बनाएगा तो वो सफल कैसे हो पाएगा?"

लेकिन उनका ये सपना हकीकत से काफी दूर है.

सचिन फिलहाल अपने घर पर बिस्तर पर हैं. उन्हें उम्मीद है कि वो अपने माता-पिता के सहारे के साथ एक दिन इंजीनियर ज़रूर बनेंगे.

वो कहते हैं, "मैं फिलहाल अपने सिलेबस को रीवाइस करन चाहता हूं, ये मरी प्रथमिकता है. मैं खुद को तैयार कर रहा हूं ताकि परीक्षाओं में बैठ सकूं."

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