खेतों को महिलावादी आंदोलनों की ज़रूरत क्यों?: ब्लॉग

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- Author, अनघा पाठक
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मराठी सेवा
किसान और महिला किसान में क्या अंतर होता है? आदर्श रूप से इनमें कोई अंतर नहीं होना चाहिए.
एक कर्मी और महिलाकर्मी, एक खिलाड़ी और महिला खिलाड़ी और यहां तक कि मर्द और औरत के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.
लेकिन ऐसा नहीं है. हमलोग एक आदर्श दुनिया में नहीं जीते हैं. इसलिए हमलोग गैरबराबरी, पितृसत्ता, यौन दुर्व्यवहार जैसी चीज़ों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं. और महिलावादी आंदोलन भी इन्हीं सब चीज़ों की बात करता है.
समान अधिकार, समान वेतन, निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागिता और किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हल्ला बोलना ही इसका मक़सद है.
तो फिर महिलावादी आंदोलनों से हमने महिला किसानों को दूर क्यों रखा है?
हमारे देश में किसानों की स्थिति कैसी है, यह किसी से छिपा नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं, "हमारे सामने बहुत बड़ा कृषि संकट आ खड़ा हुआ है और अगर हमने इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की तो इसका भारी असर होगा."
शायद इसलिए किसान बार-बार आंदोलन कर रहे हैं. दिल्ली, मुंबई समेत पूरे देश में वो अपनी मांगों को लेकर मोर्चा और रैलियां निकाल रहे हैं.
लेकिन किसी ने भी महिला किसानों के मुद्दे पर बात नहीं की. बेशक महिला किसानों की परेशानियां पुरुष किसानों से अलग नहीं हैं, लेकिन वो निश्चित रूप से अधिक हैं.
सरकार, किसानों के संगठन और महिलावादी आंदोलन कब इस पर विचार करेंगे कि महिला किसानों को क़र्ज़माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के कहीं अधिक मदद की ज़रूरत है.

घरेलू हिंसा और यौन दुर्व्यवहार की शिकार महिला किसान
दिल्ली में किसानों के मार्च के दौरान मेरी मुलाक़ात महिला किसान अधिकार मंच की एक्टिविस्ट सीमा कुलकर्णी से हुई.
सीमा कहती हैं, "कोई महिला किसानों की तकलीफ़ों पर बात नहीं करता, जिसे उन्हें सिर्फ़ एक महिला होने के चलते झेलना पड़ता है. दुर्भाग्य से जब भी मीडिया किसानों की बात करता है, वो महिला किसानों के मुद्दों को किनारे कर देता है."
एक अध्ययन के मुताबिक़ क़रीब 78 फ़ीसदी महिला किसानों को यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है और यहीं से चिंताओं की शुरुआत होती है.
इसके अलावा उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है और उन्हें उनके अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है.
मैं महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाक़े मराठवाड़ा की एक महिला किसान से बात कर रही थी. उनके और उनके पति के पास एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर वो खेती करते हैं.
उनके पति उन्हें अक्सर पीटा करते हैं. एक बार उनके पति ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था और दूसरी महिला के साथ शादी रचा ली थी.
इसके कुछ दिन बाद उनके पति ने दूसरी महिला के साथ भी मारपीट शुरू कर दी. अब दोनों साथ रहती हैं और बच्चों के पेट भरने के लिए मज़दूरी करती हैं.
वो कहती हैं, "जिस खेत को मैं और मेरे पति जोता करते थे, अगर मैं उस ज़मीन पर मेरा भी हक़ होता तो मेरी स्थिति कुछ अलग होती."
महिलाएं जीवनभर खेतों में काम करती हैं पर उन्हें उस पर हक़ नहीं मिलता है.

निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर महिला किसान
भारतीय क़ानून के तहत 'किसान' की परिभाषा बहुत व्यापाक है. द नेशनल पॉलिसी फॉर फार्मर्स 2007 के मुताबिक़ जो कोई भी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित है, वो किसान है.
इसमें उन जनजातीय समूहों और परिवारों को भी शामिल किया गया है जो खेतों में सिंचाई का काम करते हैं और कृषि उत्पादों की ख़रीद-बिक्री में लगे हैं.
इसका मतलब यह है कि जिनके पास खेती के लिए अपनी ज़मीन नहीं है और दूसरे के खेतों में काम करते हैं, उन्हें भी किसान समझा जाता है.
उन्हें सभी तरह की योजनाओं का लाभ मिलता है जो जमीन वाले किसानों को दिया जाता है. पर असलियत क्या है?
सभी सरकारी योजनाओं के देखें. ये सभी तरह के किसानों के लिए होना चाहिए पर वास्तव में ये उन किसानों के लिए होते हैं जिनके पास अपनी ज़मीन है.
सीमा कहती हैं, "ऐसे में महिला किसानों का क्या? खेत के मालिक होने के उनके अधिकारों का क्या? श्रम वाले अधिकतर काम महिला किसान करती हैं पर उन्हें ज़मीन में मालिकाना हक़ नहीं मिलता. निर्णय लेने में भी उनकी कोई भूमिका नहीं होती है."
"कौन सी फ़सल उगाई जाएंगी, कौन सा उर्वरक इस्तेमाल किया जाएगा, किसी विधि से खेती होगी और कितना लोन लिया जाएगा, इन सभी निर्णयों में उनकी कोई भूमिका नहीं होती है."
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'किसान भाइयों' के लिए बजट, 'किसान बहनों' का क्या?
वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ सवाल करते हैं कि भारत में कृषि क्षेत्र के कुल श्रम में महिलाओं का योगदान 70 फीसदी है, फिर भी उनके योगदान पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता?
"कृषि से जुड़े उन तमाम मीडिया कवरेज को याद करने की कोशिश करें, किन्हें ज़्यादा तवज्जो मिलती है?"
"यह चेहरा एक थके और झुर्रियों वाले 'पुरुष' किसान का होता है. इसका मतलब यह है कि मीडिया भी 70 फीसदी महिला किसानों को नज़रअंदाज़ कर रहा है. "
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए बजट पेश करते हुए कहा था कि यह बजट हमारे 'किसान भाइयों' के लिए है. लेकिन 'किसान बहनों' के लिए क्या?
एमएकेएएम के किए एक सर्वे के मुताबिक़ महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में 54 फीसदी महिला किसानों के पास अपना घर नहीं है, वहीं विदर्भ में यह आंकड़ा 71 फीसदी है.
ऐसी महिलाएं जब भी ज़मीन पर अपने मालिकाना हक़ की मांग करती हैं, उन्हें घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है.
जिनके पतियों ने आत्महत्या की है, अक्सर पत्नियों को पति के संपत्ति के बेदख़ल कर दिया जाता है. जब वो उस संपत्ति के लिए लड़ाई लड़ती हैं तो उन्हें सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है.
दिल्ली के प्रदर्शन में शामिल होने आईं किसान महिलाओं से जब मैंने बात की तो मुझे लगा कि उनकी मांगें बहुत कम हैं.
कुछ को राशन कार्ड की ज़रूरत थी तो कुछ अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसा चाहते थे. ये महिलाएं मूलभूत ज़रूरत की चीज़ों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
ऐसे में घरेलू हिंसा, बराबरी और मालिकाना हक़ के बारे में तो भूल ही जाइए.
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यौन दुर्व्यवहार पर बात कम होती है
महिला किसानों के साथ यौन दुर्व्यवहार पर बात बहुत कम होती है.
ऐसे कई उदाहरण है जहां किसान विधवाओं का यौन शोषण परिवार के सदस्यों ने किया है. ये ग़रीब विधवाएं बदनामी के डर से इसकी रिपोर्ट तक नहीं लिखवा पाती हैं.
घर ही नहीं, उन्हें बाहर भी यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है. कुछ सरकारी अधिकारी काग़ज़ी कार्रवाई को आगे बढ़ाने के बदले महिला किसानों से यौन इच्छा को पूरा करने की मांग करते हैं.
ये सभी मुद्दे किसानों के आंदोलन में सुनाए नहीं देते हैं. सीमा कहती हैं, "जब आप शहरी क्षेत्रों के मीटू अभियान को प्रोत्साहित करते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं, तब आप महिला किसानों और मज़दूरों के साथ हो रहे यौन शोषण को नज़रअंदाज़ क्यों करते हैं?"

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महिला किसानों के हक के लिए खड़े होने की ज़रूरत
निर्णय लेने की प्रक्रिया में भारतीय मध्यम वर्ग के महिलाओं की सहभागिता, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में बढ़ी है.
उदाहरण के लिए पिछले 20 सालों में कोई ऐसे बड़े फ़ैसले नहीं लिए गए होंगे, जिनमें हमारी मांओं का सहमति न हो, लेकिन क्या किसानों के परिवारों में ऐसा होता है?
मैं जितनी भी महिला किसानों से मिली, उनमें सभी नक़दी फ़सल की खेती नहीं करना चाहती हैं. वो सभी उन फ़सलों की खेती करना चाहते हैं जिनसे उनके बच्चों का पेट भर सके.
लेकिन स्थिति ऐसी है कि उनके चाहने के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रही हैं.
खेतों को कौन से फ़सल उगाए जाएं, किस तकनीक का इस्तेमाल हो, कितना लोन लिया जाए, अगर इस तरह के फै़सले महिलाएं करती हैं तो खेती के क्षेत्र में कुछ सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं.
ऐसा हो, इसके लिए हमें महिलावादी नज़रिए से इसे देखने और उनके बराबरी के हक़ के लिए खड़ा होने की ज़रूरत है.
कुछ महीने पहले मेरे एक सहकर्मी ने कुछ विधवा महिला किसानों से मुलाक़ात की थी. उसने बताया कि ये सभी महिलाएं अपने पति की मौत के बाद पहली बार घर से बाहर निकली थीं. उन्होंने खेतों में साथ में काम किया होगा लेकिन फ़ैसला लेने की शक्ति उनमें नहीं थी.
कई महिलाएं ने विपरीत परिस्थियों का सामना किया और अपने पैरों पर खड़ी हुईं.
इन सब ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि अगर उन्हें फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में पहले शामिल किया गया होता तो उनके परिवारों में आत्महत्याएं नहीं होती.
कब पड़ेंगी इन पर नज़र
वर्तमान में महिलावादी आंदोलनों की आलोचना यह कह कर की जाती है कि ये कुलीन वर्ग तक सीमित है. इन आंदोलनों में उन महिलाओं की आवाज़ शामिल नहीं है, जो समाज की निचले स्तर पर हैं.
एक्टिविस्ट सीमा कुलकर्णी कहती हैं, "ग्रामीण इलाक़ों में भी महिलाओं के हक के लिए आंदोलन हो रहे हैं. ये महिलावादी आंदोलनों की तरह न हो, पर उनके उद्देश्य कमोबेश महिलावादी आंदोलन से मेल खाते हैं."
सिगरेट पीती महिलाओं की उदारवादी छवि की जगह देश की क़िस्मत तय करने वाली महिला किसानों से बदले जाने की ज़रूरत है.
तब तक लाखों को खिलाने वाली मां, बहनें, बेटियों को ख़ूनी पैरों के साथ इस उद्देश्य से मार्च करना होगा कि किसी की नज़र उन पर पड़े.
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