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बुलंदशहर में कैसे हुई पुलिस अफ़सर सुबोध कुमार सिंह की हत्या: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बुलंदशहर से
पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के लिए सोमवार की सुबह शायद किसी और दिन के जैसी नहीं थी.
उत्तर प्रदेश पुलिस में अपने 20 साल के करियर के दौरान सुबोध कुमार सिंह ने सुबह की अपनी रूटीन को कभी नहीं बदला.
सुबह सवेरे उठने के बाद सबसे पहले अख़बारों पर नज़र दौड़ाने के अलावा परिवार को फ़ोन करना वो कभी नहीं भूलते थे.
उसी तरह नाश्ते में वो कम तेल वाला परांठा खाना भी कभी नहीं भूलते. फ़िटनेस को लेकर हमेशा सजग रहने वाले इस पुलिस अधिकारी ने हाल ही में सेल्फ़ी खींचने का नया शौक़ भी पाल रखा था.
लेकिन सोमवार की सुबह उन्होंने अपने स्टाफ़ से ये कहते हुए नाश्ता नहीं किया कि वो दोपहर में दाल और रोटी खा लेंगे.
लेकिन उन्हें लंच करने का फिर मौक़ा नहीं मिला क्योंकि दोपहर के वक़्त पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह ग़ुस्से से भरी भीड़ को नियंत्रित करने में लगे थे.
बेक़ाबू भीड़ सुबोध और उनके साथी पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाज़ी कर रही थी और गोलियां भी चला रही थी.
ये भीड़ एक पुलिस थाने के पास ही पुलिसकर्मियों को निशाना बना रही थी. तो सबसे बड़ा सवाल है कि आख़िर हुआ क्या और इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की मौत कैसे हुई.
'कंकाल' मिलने से फैला आक्रोश
इस सबकी शुरुआत सोमवार सुबह नौ बजे हुई.
बुलंदशहर ज़िले के महाव गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने खेतों में कम से कम एक दर्जन गायों के कंकाल देखे थे.
एक स्थानीय निवासी धर्मवीर के अनुसार फ़ौरन ही लगभग दो सौ से ज़्यादा हिंदू खेत में जमा हो गए और इस बात को लेकर आपस में विचार विमर्श करने लगे कि आगे क्या करना है.
धर्मवीर का कहना है कि वो भाग्यशाली रहे कि वो ड्यूटी जाने के लिए वहां से फ़ौरन ही निकल गए थे. क्योंकि इस घटना के अगले दिन पूरा गांव वीरान पड़ा हुआ है.
मुसलमान भी गांव छोड़कर भाग गए हैं क्योंकि उन्हें इस बात का डर है कि कथित तौर पर गाय का कंकाल मिलने के बाद उनपर बदले की कार्रवाई हो सकती है. जबकि गांव के हिंदू निवासी पुलिस के डर से गांव छोड़ कर भाग गए हैं.
कथित तौर पर गाय का कंकाल मिलने के बाद कई गांव वाले बहुत ग़ुस्से में थे और उन्होंने फ़ैसला किया कि वो इसे लेकर थाने जाएंगे और पुलिस से फ़ौरन कार्रवाई की मांग करेंगे.
इस वक़्त तक साढ़े दस बज चुके थे और पास के गांववाले भी वहां जमा हो गए थे. इनकी तादाद तीन सौ से भी ज़्यादा हो गई थी. उन लोगों ने हाईवे पर स्थित चिंगरावठी पुलिस चौकी को घेर लिया. उस समय थाने में केवल छह लोग थे और वे घबराहट में पुलिस मुख्यालय बार-बार फ़ोन करने लगे.
पुलिस मुख्यालय से फ़ौरन ही अतिरिक्त पुलिस भेजने का आदेश दिया गया. पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध घटना स्थल से तीन किलोमीटर दूर थे. जैसे ही उन्हें ख़बर मिली वो अपनी गाड़ी में बैठे और ड्राइवर राम आसरे को आदेश दिया कि गाड़ी जितनी तेज़ भगा सकते हो भगाओ.
11 बजे तक वह घटनास्थल पर पहुंच गए और ग़ुस्से से भरी भारी भीड़ के बीच चले गए.
बल प्रयोग से बिगड़े हालात
प्रत्यक्षदर्शियों ने बीबीसी को बताया, "अपने अन्य सहकर्मियों की तरह उन्होंने बुलेटप्रूफ़ जैकेट नहीं पहना था और उनके हाथ में पिस्तौल भी नहीं थी."
जैसे-जैसे भीड़ का आकार बढ़ा और वह आक्रामक हुई, और अधिकारी भी मौक़े पर पहुंच गए.
दोनों पक्षों का संयम टूट रहा था और इसी नाज़ुक समय में पुलिस ने बल प्रयोग करने का फ़ैसला ले लिया. अगर यह फ़ैसला लेने में थोड़ी देर की गई होती तो सुबोध कुमार सिंह और एक अन्य शख़्स की जान बच सकती थी.
पुलिस स्टेशन के पास के ही गर्ल्स स्कूल में नौकरी करने वाले एक शख़्स ने कहा, "पुलिस और नाराज़ प्रदर्शनकारियों के बीच आधे घंटे से ज़्यादा समय तक संघर्ष चल रहा था. गोलियां चलने की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी."
इस शख़्स ने बताया कि उसके पास मोबाइल नहीं था और बचने के लिए वह कई घंटों तक महिलाओं के वॉशरूम में बंद रहा.
पुलिस कहती है कि नाराज़ भीड़ के पास देसी कट्टे थे और वह पुलिस टीम पर फ़ायरिंग कर रही थी.
दूसरी ओर प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हालात तभी हाथ से निकले जब पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के इरादे से हवा में गोली चलाई. इसके बाद दोनों पक्षों के लिए 'करो या मरो वाले हालात पैदा हो गए.'
जान बचाने की कोशिश करते पुलिसकर्मी
अब दोपहर हो चली थी और सुबोध सिंह समेत अधिकतर अधिकारी आड़ लेने के लिए सुरक्षित जगह तलाश रहे थे. अब तक इलाक़े में चल रही कथित गोहत्या को बंद करने की मांग कर रही हिंसक भीड़ के आगे पुलिसकर्मियों की संख्या बहुत कम रह गई थी.
कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने ख़ुद को पुलिस स्टेशन के छोटे से गंदे से कमरे में बंद कर लिया था. उधर सुबोध कुमार सिंह हमलावरों की ओर से फेंकी गई ईंट लगने से ज़ख़्मी हो चुके थे.
एक अन्य सरकारी कर्मचारी के साथ खड़े पुलिस अधिकारियों के ड्राइवर राम आसरे ने बताया, "हम बचने के लिए सरकारी गाड़ी की ओर दौड़े. साहब को ईंट से चोट लगी थी और वह दीवार के पास बेहोश पड़े थे. मैंने उन्हें गाड़ी की पिछली सीट पर बिठाया और जीप को खेतों की ओर घुमाया."
उनका दावा है कि भीड़ ने उनका पीछा किया और पुलिस स्टेशन से लगभग 50 मीटर दूर खेतों में फिर से हमला कर दिया.
सोमवार शाम को राम आसरे ने पुलिस को बताया, "खेत को हाल ही में जोता गया था ऐसे में गाड़ी के अगले पहिये फंस गए और हमारे पास गाड़ी से निकलकर भागने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था."
बाद में वायरल हुए एक वीडिया में नज़र आता है कि पुलिस अफ़सर अपनी सरकारी गाड़ी से बाहर की ओर लटके हुए हैं और उनके शरीर में कोई हरकत नज़र नहीं आ रही.
वीडियो में नाराज़ लोगों को यह जांचते हुए देखा जा सकता है कि वह "ज़िंदा हैं या मर चुके हैं." पीछे से गोलियां चलने की आवाज़ भी सुनाई दे रही है.
इस घटना के बाद से उनके तीन मोबाइल फ़ोन और एक .32 पिस्तौल गुम हैं.
कैसे हुई मौत
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बताती है कि सुबोध कुमार सिंह की बायीं भौंह के ठीक ऊपर गोली का ज़ख़्म है. मगर किस बोर की गोली उन्हें लगी है, इसका कोई ज़िक्र नहीं है.
कुछ अपुष्ट रिपोर्टों के मुताबिक़, ऐसा संभव है कि उन्हें उनसे ही छीनी गई पिस्तौल से ही गोली मारी गई हो.
पुलिस का कहना है कि जब सुबोध को नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया तो डॉक्टरों ने बताया कि वह अस्पताल लाए जाने से पहले से ही दम तोड़ चुके थे.
भीड़ के साथ प्रदर्शन कर रहे सुमित नाम के एक अन्य युवक को भी गोली लगी थी जिसकी बाद में मेरठ के एक अस्पताल में मौत हो गई. वह इस हिंसक घटनाक्रम में जान गंवाने वाला दूसरा शख़्स है.
सुबोध कुमार का कथित गोहत्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों से लड़ते हुए जान गंवाना विडंबना से कम नहीं है.
वह भारत में बीफ़ खाने की अफ़वाह के आधार पर हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं की पहली कड़ी की जांच करने वाले पहले अधिकारी थे.
2015 में दादरी में जिस जगह मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या हुई थी, वो जगह उन खेतों से दूर नहीं है जहां सुबोध ने दम तोड़ा.
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