1971 की भारत-पाकिस्तान जंग: गुड़-चना देकर लड़ने गए थे मेरे पति, 47 साल हो गए पर लौटे नहीं

प्रिज़नर ऑफ़ वॉर

इमेज स्रोत, MOHIT Kandhari/BBC

    • Author, मोहित कांधारी
    • पदनाम, जम्मू से, बीबीसी हिंदी के लिए

लगभग 47 साल से निर्मल कौर अपने पति सूबेदार आसा सिंह के घर लौटने का इंतज़ार कर रही हैं.

लेकिन एक मुद्दत गुजर जाने के बाद भी उनके इंतज़ार की घड़ियां अभी ख़त्म नहीं हुई हैं.

उनकी उम्र 81 साल हो गई है. आजकल वो ज़्यादा चल फिर नहीं पातीं लेकिन फिर भी मौक़ा मिलने पर वो पाकिस्तान की जेल में कै़द अपने पति की रिहाई के लिए गुहार लगाने से बाज नहीं आती हैं.

कुछ समय पहले तक वो रोज़ाना गुरुद्वारा जाया करती थीं और अपने पति से मिलने की दुआ करती थीं. लेकिन अब वो घर पर रह कर ही पूजा करती हैं.

उनकी एक ही इच्छा है कि आँख बंद करने से पहले एक बार अपने पति से मिल सकें, उनकी देखभाल कर सकें.

निर्मल कौर के पति सूबेदार आसा सिंह 5 सिख रेजिमेंट में थे. साल 1971 में दिसंबर के पहले हफ़्ते में छिड़ी भारत-पाकिस्तान जंग में हिस्सा लेने के लिए वे छंब सेक्टर में मोर्चे पर गए थे.

युद्ध के दौरान पाकिस्तान की सेना ने उन्हें अन्य भारतीय सैनिकों के साथ बंदी बना लिया था और तब से लेकर आज तक आसा सिंह के परिवार के लोग उनके घर वापस आने की राह देख रहे हैं.

लाइन
लाइन

करतारपुर कॉरिडोर से जगी उम्मीद

जब से भारत-पाकिस्तान के बीच करतारपुर साहिब गुरुद्वारे के लिए कॉरिडोर बनाने की घोषणा हुई है निर्मल कौर ने अपनी मुहिम एक बार फिर शुरू कर दी है.

सूबेदार आसा सिंह की पत्नी

इमेज स्रोत, MOHIT Kandhari/BBC

उन्होंने दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों से ये अपील की है कि जिस तरह उनकी सरकारों ने दशकों से सिखों की लंबित मांग को पूरा किया है, ठीक उसी तरह साल 1971 की जंग के क़ैदियों की रिहाई के लिए फ़ैसला हो और कैदियों को उनके परिवारों के हवाले किया जाए.

निर्मल कौर ने पंजाब सरकार के मंत्री और क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू से भी अपील की है कि वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और उनके दोस्त इमरान खान से बात कर इस मसले को हल करवाने में अपना किरदार निभाएं.

निर्मल कौर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "लंबे संघर्ष के बाद साल 2007 में उन्हें पाकिस्तान जाने का मौक़ा मिला था लेकिन दोनों देशों की सरकारों के बीच तालमेल की कमी के चलते वो कोशिश नाकाम रही. हम वहां पाकिस्तान की जेल तो गए लेकिन, सिर्फ़ जेल अधीक्षक के दफ़्तर में बैठ कर वापस लौट आए."

आसा सिंह की तलाश में निर्मल कौर पाकिस्तान की लाहौर, कराची, सुक्कुर, मुल्तान, साहिवाल, फ़ैसलाबाद और मियांवली जेल तक गईं लेकिन नाकाम रहीं.

लाइन
लाइन

कैसे तय किया इतना लंबा सफ़र?

निर्मल कौर ने बताया, "जून, 2007 में भारत से 14 सदस्यों का दल पाकिस्तान गया था लेकिन भारत के उच्चायुक्त के दफ़्तर से वहां कोई भी हमारे साथ नहीं आया. हमें उर्दू नहीं आती थी, इसलिए हम किसी भी रिकॉर्ड की पुष्टि नहीं कर पाए और ख़ाली हाथ घर लौट आए."

"अगर दोनों देशों की सरकारें संजीदा होतीं तो हम जेल में बंद अपने लोगों से मिल सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमें नहीं पता इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाए."

इंडियन प्रिज़नर ऑफ़ वॉर इन पाकिस्तान किताब का एक अंश

इमेज स्रोत, MOhit kandhari/bbc

इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में क़ैद भारतीय सैनिकों के परिजन तत्कालीन रक्षामंत्री ए के एंटनी के साथ

निर्मल कौर कहती हैं, "17 दिसंबर, 1971 को ये जानकारी मिली थी कि जंग के दौरान वो शहीद हो गए हैं. हमें ये ख़बर सुन कर उस समय भी यक़ीन नहीं हुआ था. हमेशा एक आस दिल में बनी रहती थी कि सूबेदार आसा सिंह घर वापस लौट आएंगे."

"मैंने बच्चों को साथ लेकर बड़ी मुश्किल से परिवार की मदद से घर संभाला. उस वक़्त 323 रुपए पेंशन मिलती थी. पैसों की कमी पूरा करने के लिए मैं कुछ काम कर लिया करती थी जिससे मेरा गुज़ारा चल सके."

निर्मल कौर को 1971 की दिवाली आज भी याद है जो उन्होंने अपने पति के साथ अपने घर में मनाई थी.

वो कहती हैं, "उसके बाद वो ड्यूटी पर चले गए. निकलने से पहले वो हमारे लिए घर के आंगन में बंकर बनाने की बात कह कर गए थे ताकि मुश्किल वक़्त में उनका परिवार अपनी जान बचा सके."

"वो मुझे थोड़ा गुड़ और चना ख़रीद कर दे गए थे ताकि युद्ध के दौरान अगर कहीं भागना पड़े तो बच्चों के खाने के लिए कुछ सामान होना चाहिए. उस समय मैं चार बेटियों और दो बेटों के साथ जम्मू के नानक नगल इलाके में ही रहती थी."

सूबेदार आसा सिंह की पत्नी

इमेज स्रोत, MOHIT Kandhari/BBC

इमेज कैप्शन, सूबेदार आसा सिंह की पत्नी निर्मल कौर

निर्मल कौर की सबसे छोटी बेटी का जन्म उनके पिता के पकड़े जाने के दो महीने बाद हुआ था.

वो बताती हैं कि उनके पति की ग़ैरहाज़री में उनकी पलटन ने उनके परिवार की मदद की. मेरे बेटों को 10वीं क्लास तक पढ़ाई करवाई और बेटियों की शादी में आर्थिक मदद भी की.

लाइन
लाइन

कैसे पता चला सूबेदार ज़िंदा हैं?

सबसे पहले 20 अगस्त, 1972 को पाकिस्तान रेडियो पर कुछ भारतीय क़ैदियों ने अपने घर वालों के नाम सन्देश प्रसारित किए जिससे यह आस जगी थी कि भारत के युद्धबंदी पाकिस्तान की जेल में क़ैद हैं. आसा सिंह उनमें से एक थे.

ठीक एक महीने के बाद पता चला सूबेदार आसा सिंह ने फिर से पाकिस्तान रेडियो पर अपना हाल सुनाया था और जम्मू में अपने घर का पता भी बताया था.

निर्मल कौर ने कहा कि यह सूचना मिलने पर हमने बार-बार केंद्र सरकार के आगे गुहार लगाई लेकिन किसी ने हमारी आवाज़ नहीं सुनी.

वो कहती हैं, "जब कांग्रेस पार्टी की सरकार सत्ता में थी तो भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेता हमारे साथ इंसाफ मांगने के लिए खड़े होते. लेकिन आज उनकी अपनी सरकार है और अब इन्होंने भी चुप्पी साध रखी है. कोई हमारी मदद के लिए आगे नहीं आता. देश के सैनिकों को उनके हाल पर छोड़ दिया है पाकिस्तान की जेल में सड़ने के लिए."

इंडियन प्रिज़नर ऑफ़ वॉर इन पाकिस्तान किताब का कवर पेज़

इमेज स्रोत, Indian Prisoners of War in Pakistan

साल 2006 में सामने आई किताब "इंडियन प्रिज़नर्स ऑफ़ वॉर - हैपलैस एंड हेल्पलैस" में लेफ़्टिनेंट कर्नल आर के पट्टू और ब्रिग्रेडियर मनमोहन शर्मा दावा करते हैं कि 1975 में एक क़ैदी ने अपने पिता को चिठ्ठी लिख कर बताया था कि पाकिस्तान की जेलों में युद्ध के दौरान क़ैद किए गए 54 भारतीय कैदी फंसे हुए हैं और उनकी रिहाई की कार्यवाही शुरू होनी चाहिए.

1999 में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो ने भी भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से यह बात कही थी कि उनके देश में 43 भारतीय युद्धबंदी क़ैद हैं.

निर्मल कौर ने बताया, "1988 में परिवार की उम्मीद एक दफ़ा फिर जगी जब पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर घर लौटे एक कै़दी ने बताया कि पाकिस्तान की जेल में उनकी मुलाक़ात सूबेदार आसा सिंह से हुई है" .

"1990 में भी परिवार को सूचना मिली कि सूबेदार आसा सिंह की मुलाक़ात जेल हॉस्पिटल में एक दूसरे भारतीय कै़दी से हुई थी और उसने घर वापस आकर उनके परिवार को यह सूचना दी थी" .

पाकिस्तानी नागरिक का भेजा गया पत्र

इमेज स्रोत, MOHIT Kandhari/BBC

इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी नागरिक का भेजा गया पत्र

2003 में लाहौर की कोट लखपत जेल का निरक्षण करने गई मानवाधिकार की टीम ने भी वहां कम से कम 11 भारतीय युद्ध बंदियों से मुलाक़ात की थी जिसमें आसा सिंह भी शामिल थे.

लाइन
लाइन

लंबीक़ानूनी लड़ाई

सूबेदार आसा सिंह की सबसे छोटी बेटी रविंदर कौर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने अपने पापा को कभी नहीं देखा. मैं तो सिर्फ़ उनकी तस्वीर देख कर बड़ी हुई हूँ. उनकी याद में मैंने कविता भी लिखी और अपनी माँ के साथ लंबा संघर्ष भी किया लेकिन आज तक सफलता हाथ नहीं लगी."

"पिता के बिना घर में बच्चों का क्या हाल होता है यह हमसे ज्यादा कोई नहीं जान सकता. हमारी माँ ने हमारे लिए बहुत मेहनत की और अकेले अपने दम पर हमें बड़ा किया. हमारे पिता ने अपना पूरा जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया लेकिन हम आज भी उनकी एक झलक पाने के लिए तरस रहे हैं."

सूबेदार आसा सिंह के बेटे हरचरण सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, "अपने पिता की रिहाई को लेकर उन्होंने बाकि युद्ध बंदियों के परिवारों के साथ मिल कर एक लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी है."

इसी लड़ाई के चलते भारत सरकार ने दिसंबर 2011 में गुजरात हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारतीय सैनिकों के परिवारों को राहत राशि बांटी और साथ में सभी सैनिकों को सम्मान पूर्वक उनके ओहदे दिए.

सूबेदार आसा सिंह को कैप्टन की मानद उपाधि दिए जाने की पुष्टि करने वाला दस्तावेज़

इमेज स्रोत, MOHIT Kandhari/BBC

सूबेदार आसा सिंह को कैप्टन की मानद उपाधि से नवाज़ा गया. युद्ध बंदियों के परिवारों को इस फ़ैसले के बाद एक तरफ बड़ी राहत मिली और दूसरी तरफ इस बात की भी चर्चा शुरू हो गयी कि उनका हक़ दिलाने के लिए और उन्हें पाकिस्तान की जेल से रिहा करवाने के लिए इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (ICJ) में गुहार लगाई जाए.

हरचरण सिंह ने बताया भारत सरकार तो इस बात पर अभी तक राज़ी नहीं हुई है और यही वजह है इन युद्ध बंदियों की रिहाई का फ़ैसला अटका पड़ा है.

हरचरण सिंह कहते हैं, "इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि अगर भारत देश ने पाकिस्तान के 90,000 से ज़्यादा युद्ध बंदी सैनिक समझौते के बाद रिहा कर दिए थे और उनका इलाक़ा भी लौटा दिया था फिर भारत अपने युद्धबंदी आज तक रिहा क्यों नहीं करवा सका".

ये भी पढ़ेंः

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)