सबरीमला : सुप्रीम कोर्ट के आदेश को 'शुरुआती जीत' मान रहे हैं भक्त

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
केरल सरकार और संघ परिवार के बीच सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर एकबार फिर टकराव के आसार बन रहे हैं.
ये स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि उसने सभी उम्र की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा को लेकर दिए अपने पहले के फ़ैसले पर रोक नहीं लगाई है.
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ बीती 28 सितंबर को सुनाए गए अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार को सहमत हो गई है.
इस फ़ैसले में स्वामी अयप्पा के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं को दाखिल होने की इजाज़त दी गई थी.

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फ़ैसले पर रोक नहीं
कोर्ट के इस फ़ैसले की समीक्षा के साथ करीब 50 याचिकाएं दाखिल की गई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वो 22 जनवरी को ओपन कोर्ट में इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. पीठ ने ये फ़ैसला चीफ जस्टिस गोगोई के चैंबर में बंद दरवाजे के दौरान हुई सुनवाई में लिया.
कोर्ट ने अपने संक्षिप्त आदेश में कहा, "सभी समीक्षा याचिकाओं और लंबित आवेदनों पर 22 जनवरी 2019 को समुचित पीठ के सामने ओपन कोर्ट में सुनवाई होगी. हम ये साफ करते हैं कि 28 सितंबर को इस कोर्ट की ओर से दिए गए फ़ैसले पर कोई रोक नहीं लगाई गई है."
लेकिन तथ्य ये है कि कोर्ट के अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए तैयार होने को उन भक्तों के लिए 'शुरुआती जीत' के तौर पर देखा जा रहा है जिन्होंने अक्टूबर और इस महीने के शुरुआत में मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध किया था.

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17 नवंबर को खुलेगा मंदिर
इसके बाद ऐसे संगठन, जो राजनीतिक लिहाज से विपरीत ध्रुवों पर दिखते हैं, (एक तरफ संघ परिवार और बीजेपी तो दूसरी तरफ कांग्रेस) ने केरल की वाम मोर्चा सरकार से मांग की है कि वो ये तय करे कि 22 जनवरी तक 10 से 50 साल के बीच की उम्र वाली महिलाएं मंदिर में दाखिल न हों.
सबरीमला मंदिर 17 नवंबर को खुलेगा. इस दौरान दो महीने तक मंदिर में धार्मिक रुप से सबसे अहम सत्र मंडल मकारविल्लाक्कू का आयोजन होता है. इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से करोड़ों की संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं.
अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के राष्ट्रीय सचिव प्रतीश विश्वनाथ ने बीबीसी से कहा, "मुख्यमंत्री (पिनरई विजयन) ने कहा है कि कोर्ट ने 28 सितंबर के फ़ैसले पर रोक नहीं लगाई है. ऐसे में सरकार महिलाओं को सुरक्षा देगी. हम किसी भी महिला को परंपरा तोड़कर मंदिर में जाने नहीं देंगे जैसा हमने पिछले महीने किया था. जब मंदिर पांच दिन के लिए खुला था और इस महीने की शुरुआत में दो दिन के लिए खुला था."

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'सरकार छोड़े ज़िद'
क्या इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं होगा?
विश्वनाथ ने इस सवाल पर कहा, "नहीं. ऐसा नहीं होगा. अगर कोर्ट किसी व्यक्ति को फ़ांसी की सज़ा देता है और फिर इसकी समीक्षा का फ़ैसला करता है तो क्या उस व्यक्ति को फांसी दी जाएगी? अब सरकार को सोचना है कि जब इतना विरोध हो रहा है तब उसे सुप्रीम कोर्ट के 22 जनवरी के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए."
मुख्यमंत्री विजयन ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 28 सितंबर के फ़ैसले पर रोक नहीं लगाई है तो सरकार को इसका पालन कराना ही होगा. उन्होंने ये भी कहा कि सरकार कोई फ़ैसला लेने के पहले 'कानूनी सलाह' लेगी.
कांग्रेस नेता रमेश चेन्नीतला ने केरल सरकार को 28 सितंबर के फ़ैसले को लागू कराने की 'ज़िद' छोड़न को कहा है.

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कानून हाथ में न लें
उधर, संघ परिवार से संबद्ध सबरीमला कर्म समिति ने कहा है कि वो अपना रुख तय करने के पहले कानूनी सलाह लेगी.
समिति के समन्वयक एसजेआर कुमार ने बीबीसी से कहा, "हम किसी को नहीं रोकेंगे लेकिन ये अच्छा होगा कि महिलाएं कानून को अपने हाथ में नहीं लें और कानून व्यवस्था को बने रहने दें. वास्तव में कोर्ट अपने फ़ैसले की 22 जनवरी को समीक्षा कर रहा है, ऐसे में उसे फ़ैसले पर रोक लगा देनी चाहिए थी."
त्रावणकोर देवासम बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और याचिका दाखिल करने वालों में से एक प्रायर गोपालकृष्णन ने कहा, "भक्तों के लिए ये शुरूआती जीत है. हमें भरोसा है कि स्वामी अयप्पा के भक्तों की इच्छाएं और प्रार्थनाएं पूरी होंगी."
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