सुप्रीम कोर्ट के कई अहम आदेश क्यों लागू नहीं हो पाते

    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अब भी घमासान जारी है. 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से लेकर अब तक यहां पर अशांति बनी हुई है.

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के आधार पर महिलाओं को प्रवेश दिलाने के लिए सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम करने का दावा किया है. मगर मंदिर के पास जुटे प्रदर्शनकारी दर्शन करने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं. मंगलवार को जब एक महिला ने मंदिर जाना चाहा तो प्रदर्शन कर रहे लोगों ने मीडिया को भी निशाना बनाया.

आलम यह है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए निर्णय के आधार पर मंदिर में दर्शन करने की इच्छा रखने वाली महिलाओं को सुरक्षित ढंग से मंदिर ले जाने की भरोसेमंद व्यवस्था नहीं कर पाई है.

यह शीर्ष अदालत का इकलौता फ़ैसला नहीं है जिसके अनुपालन में मुश्किल हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिवाली पर दिल्ली में पटाखे जलाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है और यह भी निर्देश दिया है कि रात के आठ बजे से 10 बजे के बीच सिर्फ़ ग्रीन पटाखे जलाए जाएं.

लेकिन दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में पटाखों की बिक्री, पुलिस की छापेमारी और पटाखों की ज़ब्ती की ख़बरें आ रही हैं.

इस बीच सवाल उठता है कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट जब कई अहम और संवेदनशील मामलों पर आदेश सुनाता है तो ऐसा क्यों देखने को मिलता है कि उन आदेशों की पूरी तरह से तामील नहीं की जाती? कई बार मामला विधायिका के स्तर पर अड़ जाता है तो कई बार कार्यपालिका के स्तर पर. अगर इस तरह का गतिरोध बना रहता है तो शीर्ष अदालत के कई जनोपयोगी फ़ैसले ज़मीन पर प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाते.

कहां होती है दिक्कत

हैदराबाद स्थित नैलसर लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा बताते हैं कि अदालत का आदेश लागू करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है और कई बार वह ऐसा करने में गंभीर नहीं होती.

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं, "कोर्ट के ऑर्डर लागू न होने के पीछे कई कारण होते हैं. सबसे बड़ा कारण तो यह है कि सरकार उस ऑर्डर को लागू करना चाहती है या नहीं. ज़्यादातर मामलों में तो कार्यपालिका ही गंभीर नहीं होती. ऐसा प्रदूषण, ताजमहल और पुलिस सुधार जैसे सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों को लेकर देखने को मिला है."

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने केरल दौरे के दौरान सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना की थी. उन्होंने यह कह दिया था कि अदालत को फ़ैसले देने से पहले यह सोचना चाहिए कि उनका अनुपालन करना संभव है या नहीं.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा बताते हैं कि इस तरह का रवैया धमकी भरा है मगर ऐसा पहली बार नहीं हुआ.

वह बताते हैं, "बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे आदेश देने चाहिए जो लागू किए जा सकें. यह कोर्ट को धमकाने वाली बात है. मगर यह नई बात नहीं है, अमरीका में भी ऐसा हुआ था जब वहां एक बार राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को यह कहते हुए मानने से इनकार कर दिया था कि भले ही चीफ़ जस्टिस ने हमें आदेश दिया है मगर उसकी अनुपालना हमारे लिए बाध्यकारी नहीं है. इस तरह की परिस्थितियां दिखाती हैं कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट में एक राय नहीं है. अदालत कुछ और चाहती है और सरकार की मंशा कुछ और है."

अदालत की इच्छाशक्ति

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ज़मीन पर लागू न हो पाने की एक वजह सुप्रीम कोर्ट की इच्छाशक्ति में कमी भी है.

वह बताते हैं, "कोर्ट के आदेशों को लागू तो कार्यपालिका को करवाना होता है. वही नहीं करना चाहे तो कुछ नहीं होता है. पुलिस सुधारों पर 2016 में फ़ैसला आ गया था. मगर आज तक लागू नहीं हुआ क्योंकि सरकार लागू नहीं करना चाहती. वह चाहती है कि पुलिस उसके चंगुल में ही रहे. कई बार और कारण भी होते हैं. सबरीमला की ही बात करें तो राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू करवाना चाहती है मगर भारतीय जनता पार्टी और अन्य दल ऐसा नहीं होने देना चाहते."

प्रशांत भूषण बताते हैं कि ऐसी स्थिति में सख़्ती से काम लिया जा सकता है मगर यह काम अदालत को ही करना होगा. वह बताते हैं, "कई बार सुप्रीम कोर्ट की भी इच्छाशक्ति की कमी होती हैं. अगर पूरी इच्छाशक्ति हो तो अवमानना के आधार पर संबंधित लोगों को नोटिस भेजकर या जेल भेजकर लटकाए गए आदेशों को लागू करवाया जा सकता है."

हालांकि, उनका यह भी मानना है कि कई बार चाहकर भी कोर्ट के लिए कुछ मामलों में सख़्ती बरतना मुश्किल हो जाता है.

प्रशांत भूषण कहते हैं, "कुछ फ़ैसले होते हैं जहां पर भावनाओं को भड़काया जा सकता है, जैसे कि राम मंदिर और सबरीमला. इस तरह के मामलों में आदेशों को लागू करने में कितने लोगों को जेल में डाला जा सकता है और भला कितने लोगों को अवमानना का दोषी पाया जा सकता है? मूल बात यह है कि सरकार और राजनीतिक पार्टियां अगर किसी फ़ैसले को लागू नहीं होने देना चाहतीं तो कोर्ट के लिए भी लागू करवाना मुश्किल हो जाता है."

सरकार और कोर्ट के अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों को लागू न करने के अलावा कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि सरकारें क़ानून में ही बदलाव कर देती हैं. सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश से सहमति न होने पर रिव्यू पिटिशन डाली जा सकती है या फिर संसद में क़ानून बनाकर फ़ैसले को बदला जा सकता है.

भारत के लीगल सिस्टम में यह व्यवस्था है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलने का अधिकार संसद को है तो सही, मगर ऐसा करने के लिए उसे पहले जजमेंट के आधारों को हटाना पड़ेगा. ऐसा नहीं हो सकता कि सुप्रीम कोर्ट ने जो बात कही हो, सरकार उससे कुछ एकदम अलग बात कह दे."

ऐसा कई बार देखने को मिला है जब सरकार ने कोर्ट के फ़ैसलों को अनडू कर दिया यानी एकदम बदल दिया. वोडाफ़ोन, शाह बानो और एससी-एसटी एक्ट को लेकर यह देखने को मिला. जैसे कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जब एससी-एसटी एक्ट को नरम किया तो सरकार ने इसे बदल दिया. यह सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलने का संवैधानिक तरीका है क्योंकि संसद को ऐसा करने का अधिकार मिला है."

सुप्रीम कोर्ट 'सुप्रीम'

लेकिन प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर होने वाली सियासत ठीक बात नहीं है.

वह बताते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के पास यह शक्तियां है कि वह पावर की लड़ाई में मध्यस्थता कर सकता है. यानी कार्यपालिका और विधायिका में लड़ाई हो, दो राज्यों में विवाद हो या अधिकारों को लेकर नागरिकों की सरकार के साथ खींचतान हो तो कोर्ट दख़ल दे सकता है."

"सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों का गारंटर और प्रॉटेक्टर कहा गया है. वह स्वतंत्र है. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 12 में स्टेट की परिभाषा में नहीं गिना जाता. इसलिए मैं समझता हूं कि सरकारों को डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ पावर को मानना चाहिए और कोर्ट की अवमानना नहीं करनी चाहिए."

कोर्ट को सख़्ती बरतनी चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट अगर कोई फ़ैसला सुनाता है और कुछ निर्देश देता है तो उसकी अनुपालना न होने की स्थिति में उसके पास संबंधित अधिकारियों या संस्थानों आदि पर अवमानना के आधार पर कार्रवई करने का अधिकार होता है. तो क्या कोई विशेष व्यवस्था देते समय अदालत को यह भी कह देना चाहिए कि अगर उसका आदेश या निर्देश लागू नहीं किया गया तो ज़िम्मेदार पक्षों पर कार्रवाई हो सकती है?

इसे लेकर प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "मैं कंटेप्ट ऑफ कोर्ट के फ़ेवर में नहीं हूं. लेकिन अगर कोई जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को न माने तो अदालत की साख़ बचाने के लिए कंटेंप्ट पावर का इस्तेमाल होना चाहिए. "

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का मानना है कि ऐसा करना प्रभावी हो सकता है मगर कई बार हालात बहुत अलग हो जाते हैं. वह कहते हैं कि यह देखना चाहिए कि किसी फ़ैसले के लागू न होने के लिए अधिकारी ज़िम्मेदार हैं या अन्य लोग.

वह कहते हैं, "जहां अधिकारी आदेशों को लागू कर सकते हैं वहां कोर्ट की सख़्ती का असर पड़ सकता है. लेकिन कोर्ट अगर पहले ही किसी पुलिस अधिकारी को किसी फ़ैसले को लागू करवाने के लिए जवाबदेह बना दें लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने ऐसे हालात बना दिए कि वह अधिकारी फ़ैसला ही लागू न करवा पाए तो क्या करेंगे?"

"हालांकि कोर्ट को कंटेंप्ट के तहत कार्रवाई ज़रूर करनी चाहिए. लेकिन देखना चाहिए कि अगर वह पूरी कोशिश के बाद भी आदेश लागू नहीं करवा पाए तो उसे जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता. सबरीमला में देखें तो राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष नेता ऐसा कर रहे हैं. सभी पार्टियां इसमें शामिल हैं और कोर्ट के आदेश को लागू न होने देने के लिए प्रयास कर रहे हैं. ऐसे में उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए."

आदर्श स्थिति क्या होनी चाहिए?

ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जब सुप्रीम कोर्ट या अन्य अदालतों के आदेशों को या पूरी तरह से लागू नहीं किया जाता या फिर उन्हें लागू करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए जाते.

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा बताते हैं कि सबसे अच्छा तो यह होगा कि जो विधायिका का काम है, वह विधायिका करे और जो अदालत का काम है, अदालत करे.

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा का यह भी मानना है कि कोर्ट को धर्म के मामले में रिफ़ॉर्म नहीं लाना चाहिए क्योंकि ऐसे संवेदनशील विषयों पर बदलाव की पहल संसद को करनी चाहिए.

वह कहते हैं, "कोर्ट को इन बातों से परे रहना चाहिए. देश अभी भी संविधान की कई मान्यताओं को अपनाने के लिए राज़ी नहीं है. देश का संविधान एक प्रगतिशील दस्तावेज़ है. यह जहां लोगों को ले जाना चाहता है, वहां पर बहुत से लोग अभी पहुंच नहीं पाए हैं. भारत धर्म प्रधान देश है और इसकी बहुत सी चीज़ें संविधान के प्रावधानों से टकरा रही हैं. चूंकि अदालतों पर संविधान के तहत ही फ़ैसले करने की ज़िम्मेदारी है, इसलिए उनके फ़ैसले स्वाभाविक तौर पर धार्मिक आस्थाओं से टकराते हैं."

वह कहते हैं, "बहुत से क़ानून हैं जो मौजूद तो हैं, मगर समस्याएं बरक़रार हैं. जैसे कि फ़ूड अडल्ट्रेशन पर क़ानून है मगर मिलावट जारी है, दहेजप्रथा और कन्याभ्रूण हत्या भी हो रही है. क़ानून और समाज में एक गैप बना रहता है. इसके लिए ज़रूरी है कि पहले समाज को बदलाव के लिए तैयार किया जाए."

प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि आदर्श स्थिति में इस तरह के रिफ़ॉर्म का काम संसद को करना चाहिए क्योंकि संसद में जब किसी बात पर फ़ैसला होता है तो उसमें बहुत सारे विचारों का समावेश होता है.

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