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दिल्ली की हवा साफ़ क्यों नहीं हो सकती?
- Author, कविता पुरी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सर्दियों की आहट से ही दिल्ली की आबो-हवा बिगड़ने लगी है. सुबह शाम ही नहीं, दिन में भी धुंध छाने लगी है.
प्रदूषण की वजह से दिल्ली वालों का दम घुट रहा है. दफ़्तर जाने और वहां से लौटने के वक़्त प्रदूषण का स्तर इस क़दर बढ़ जाता है कि जीना मुश्किल हो जाता है.
पिछले साल हालात इतने बिगड़ गए थे कि कि नवंबर में स्कूल बंद करने पड़े थे, ताकि बच्चों को दमघोंटू धुएं से बचाया जा सके.
उस वक़्त दिल्ली में प्रदूषण का स्तर, विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानक से तीस गुना ज़्यादा दर्ज किया गया था.
यानी दिल्ली की हवा ऐसी थी कि मानो यहां के बाशिंदे रोज़ 50 सिगरेट पीने के बराबर धुआं अपने अंदर भर रहे थे.
इस बार भी हालात उसी तरफ़ बढ़ रहे हैं. पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने से लेकर, गाड़ियों से निकलने वाला धुआं और फैक्ट्री से लेकर पटाखों तक से होने वाले प्रदूषण तक, वो सब कुछ हो रहा है, जो दिल्ली का दम घोंटता है.
मगर, जिनके लिए घर से निकलना मजबूरी है, उन्हें रोज़ाना इस प्रदूषण का सामना करना पड़ता है.
सांस के साथ उनके फेफड़ों में ज़हर आहिस्ता-आहिस्ता पैबस्त होता जा रहा है.
पिछले कुछ साल में दिल्ली की हवा में ज़हर बढ़ता ही जा रहा है. इसे साफ़ करने के ज़िम्मेदार सरकारी विभागों के काम करने का अपना तरीक़ा है. यही वजह है कि आज दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है.
ऐसे में सवाल ये कि क्या दिल्ली अपनी हवा को साफ़ कर पाएगी?
बीबीसी की रेडियो सिरीज़ 'द इन्क्वायरी' में इस बार कविता पुरी ने इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की.
क्या दिल्ली की हवा साफ़ हो सकती है?
हम दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों, आज वायु प्रदूषण से कोई भी अछूता नहीं है. दिल्ली में हालात इतने बुरे हैं कि लोग अब साफ़ हवा को इंसान का बुनियादी अधिकार बताने लगे हैं.
बेहतर पर्यावरण के लिए काम करने वाली भारती चतुर्वेदी कहती हैं कि दिल्ली और आस-पास के लोग अगर खुले में जाते हैं, तो, वो अपने फेफड़ों में ज़हर भरते जाते हैं.
भारती ने पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंतन के नाम से एक स्वयंसेवी संस्था बनाई है.
वो कहती हैं कि दिल्ली में आप अपने परिवार का पेट पालने या ज़िंदगी बसर करने के लिए बाहर निकलते हैं, तो अपनी सांसें घटाते हैं. क्योंकि यहां की हवा में जितना प्रदूषण है, वो आपकी ज़िंदगी में से दिन घटाता जाता है.
हवा के प्रदूषण के प्रमुख कारक हैं - पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम, सल्फ़र डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और ओज़ोन.
पार्टिकुलेट मैटर यानी वो काला धुआं जो गाड़ियों और कारखानों से निकलता है.
साथ ही वो खाना बनाने के लिए जलाई जाने वाली लकड़ी से भी पैदा होता है. यही पीएम पराली जलाने से भी हवा में घुलता है.
कारों से सल्फ़र डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन और ओज़ोन के तौर पर प्रदूषण फैलाने वाले केमिकल निकलते हैं.
कब से ख़राब हुई दिल्ली की हवा
भारती चतुर्वेदी कहती हैं कि दिल्ली की आबो-हवा अस्सी के दशक में बहुत ख़राब हो गई थी. हर वक़्त शहर पर काला ग़ुबार छाया रहता था.
मुक़दमा चला. कोर्ट के दख़ल से दिल्ली में डीज़ल से चलने वाली बसों और ऑटो के बजाय सीएनजी से चलने वाली बसें और ऑटो लाए गए.
इससे हालात कुछ वक़्त के लिए सुधरे. दिल्ली की हवा बेहतर हुई.
लेकिन, जल्द ही हालात फिर बिगड़ने लगे. भारती इसके लिए दिल्ली वालों को ही ज़िम्मेदार मानती हैं.
वो कहती हैं कि लापरवाही की वजह से दिल्लीवालों ने ख़ुद अपनी क़ब्र खोद डाली है.
इसकी पहली वजह तो ये है कि दिल्ली में निजी गाड़ियां यानी कारें और एसयूवी वग़ैरह ख़ूब बिकती हैं.
रोज़ 1400 के क़रीब नई गाड़ियां दिल्ली की सड़कों पर उतरती हैं.
फिर, डीज़ल से चलने वाले ट्रक शहर से होकर गुज़रते हैं. इनके लिए बाई-पास बहुत पहले बन जाने चाहिए थे. लेकिन, ऐसा हुआ नहीं और ट्रकों की आवाजाही ने प्रदूषण के स्तर को और उठा दिया.
अरावली पहाड़ियों के गायब होने का असर
भारती चतुर्वेदी कहती हैं कि दिल्ली की हिफ़ाज़त का जो प्राकृतिक कवच था, उसे भी उधेड़ डाला गया. उनका इशारा अरावली की पहाड़ियों की तरफ़ है.
दुनिया की सबसे पुरानी कही जाने वाली अरावली की पहाड़ियां, बाहर से आने वाली प्रदूषित हवा को दिल्ली आने से रोकती थीं. मगर अवैध खनन और पेड़ों की कटाई के चलते, दिल्ली का ये क़ुदरती कवच ख़त्म हो गया.
सर्दियों में दिल्ली ज़्यादा प्रदूषित हो जाती है. वजह ये कि ठंड से पार्टिकुलेट मैटर हवा में ही रह जाते हैं. फिर आस-पास के राज्यों में फ़सलें जलाने की वजह से भी धुआं यहां की हवा ख़राब करता है.
सरकार कोशिश कर रही है कि किसान पराली न जलाएं. मगर, इसके ठोस नतीजे नहीं निकल सके हैं.
किसानों को लगता है कि उनके लिए जुर्माना भरना आसान है. क्योंकि नई फ़सल के लिए खेत ख़ाली करना है, तो ये पराली तो उन्हें जलाकर ख़त्म करनी ही होगी.
भारती कहती हैं कि सरकार ने दिल्ली में कोयले से चलने वाले बिजलीघर को भी बंद कर दिया. और हवा को साफ़ करने के लिए जेट इंजन भी मंगाए. मगर ये कारगर नहीं रहा.
भारती को उम्मीद है कि दिल्ली के लोग और सरकार, हवा को साफ़ करने के लिए कड़े क़दम उठाएंगे.
दिल्ली की हवा कैसे होगी साफ़?
मगर, वो क्या क्रांतिकारी क़दम हो सकते हैं, जिनकी मदद से दिल्ली की हवा साफ़ हो सकती है.
नीदरलैंड के कलाकार डैन रोज़गार्टर चार बरस पहले बीजिंग में थे.
एक दिन उन्होंने अपने होटल की खिड़की से बाहर झांका, तो कुछ भी नहीं दिखाई दिया.
प्रदूषण की वजह से धुंध इस क़दर थी, कि पूरा माहौल काला हो गया था. सड़कों पर सिर्फ़ गाड़ियां दिख रही थीं. कुछ दिन बाद तो वो दिखना भी बंद हो गया.
उसी वक़्त डैन के ज़हन में एक ख़याल आया. उन्होंने सोचा कि अगर शहर ऐसी मशीन बन गया, जो ख़ुद का गला घोंट रहा है. तो, ऐसी मशीन भी तो बनाई जा सकती है जो इस मुश्किल से निजात दिलाए.
नीदरलैंड में अपने शहर रॉटर्डम लौटकर डैन ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की मदद से दुनिया का सबसे बड़ा वैक्यूम क्लीनर तैयार किया. ये गंदी हवा को सोख कर उसे साफ़ करता है.
हवा साफ़ करने वाला वैक्यूम क्लीनर?
ये वैक्यूम क्लीनर एल्यूमिनियम के 7-8 मीटर ऊंचे टॉवर जैसा है, जो प्रदूषित हवा को सोख कर साफ़ हवा छोड़ता है.
डैन बताते हैं कि उन्होंने इसे रॉटर्डम के कई पार्कों में लगाया. इन वैक्यूम क्लीनर्स की मदद से पार्क की हवा में 20 से 30 फ़ीसद तक सुधार आया.
शहर के कई हिस्सों में डैन के डिज़ाइन किए हुए एल्यूमिनियम टॉवर या वैक्यूम क्लीनर लगाए गए हैं. इससे शहर की हवा में प्रदूषण 41 प्रतिशत तक कम हुआ है.
डैन की मशीनें प्रदूषित हवा से हीरा भी बना रही हैं. असल में हवा में प्रदूषण की असल वजह होती है कार्बन. इस कार्बन को अगर आधे घंटे तक बहुत दबाव में रखा जाए, तो ये हीरे में तब्दील हो जाता है.
शुरू में डैन के आइडिया का मज़ाक़ भी उड़ा. पर, उन्होंने अपनी कामयाबी से दिखा दिया है कि तकनीक की मदद से कई चुनौतियों पर जीत हासिल की जा सकती है.
डैन के विशाल वैक्यूम क्लीनर नीदरलैंड से लेकर चीन और पोलैंड तक काम कर रहे हैं.
जानवरों को पसंद हैं ये वैक्यूम क्लीनर
पोलैंड और नीदरलैंड में तो वायु प्रदूषण में कमी को जानवर भी महसूस कर रहे हैं.
पोलैंड के क्राकोव शहर में डैन ने देखा कि एल्यूमिनियम के टॉवर के पास कुत्ते जमा हो रहे थे.
कुत्तों के सूंघने की ताक़त बहुत ज़्यादा होती है.
डैन का कहना है कि अपने मालिकों के साथ आए कुत्ते उन्हें खींच कर एल्यूमिनियम के टॉवर यानी वैक्यूम क्लीनर के पास ले जा रहे थे. ज़ाहिर है, उन्हें वहां साफ़ हवा सूंघने को जो मिल रही थी.
डैन के अपने शहर राटर्डम में उनके विशाल वैक्यूम क्लीनर के इर्द-गिर्द ख़रगोश डेरा डाले रहते हैं. इसे भी वैक्यूम क्लीनर का असर बताया जाता है.
छोटे इलाक़ों की बात तो ठीक, मगर क्या डैन के बनाए वैक्यूम क्लीनर, दिल्ली जैसे बड़े शहर की हवा साफ़ कर सकते हैं.
डैन कहते हैं कि डिज़ाइन और तकनीक सही साबित हो चुकी है. जो शहर इनका इस्तेमाल करना चाहते हैं, वो इन वैक्यूम क्लीनर का आकार बड़ा करके मदद ले सकते हैं. हालांकि दिल्ली के अधिकारी इस बात से बहुत मुतमईन नहीं.
इसके अलावा वो किसी नए शहर, इमारत या हाइवे के निर्माण के दौरान ऐसे वैक्यूम क्लीनर को योजना में शामिल करने की सलाह देते हैं. ताकि हवा साफ़ रहे.
भविष्य की बात तो ठीक, मगर दिल्ली को तुरंत राहत की ज़रूरत है.
दिल्ली की ही तरह फिलीपींस की राजधानी मनीला भी बहुत प्रदूषित शहर है.
यहां की रहने वाली लुईसा मलीना पर्यावरण की बेहतरी के लिए काम करती हैं.
उन्होंने ओज़ोन लेयर के बारे में रिसर्च से करियर शुरू किया था.
मगर बहन के प्रदूषण की शिकार होने की वजह से वो पर्यावरण प्रदूषण कम करने के लिए काम करने लगीं.
डॉक्टर लुइसा ने अमरीका के सैंटियागो में एक रिसर्च सेंटर स्थापित किया.
कभी दिल्ली जैसा था मेक्सिको
अपनी युवावस्था में एक बार वो मेक्सिको सिटी गईं. मेक्सिको सिटी को एक वक़्त में दुनिया का सब से प्रदूषित शहर कहा जाता था.
70 के दशक में ऐसे हालात थे कि कहा जाता था कि प्रदूषण की वजह से परिंदे मरकर मेक्सिको के आकाश से टपका करते थे.
हालांकि, इस क़िस्से की सच्चाई पर किसी ने मुहर नहीं लगाई. मगर डॉक्टर लुइसा कहती है कि वो जब मेक्सिको सिटी के हवाई अड्डे पर उतरीं, तो बाहर आते ही उनकी आंखें जलने लगीं. खांसी आने लगी.
लुइसा कहती हैं कि मेक्सिको सिटी ऊंचाई पर बसा शहर है. ये तीन तरफ़ से पहाड़ियों से घिरा है. तो गाड़ियों और कारखानों से निकलने वाली प्रदूषित हवा इसे गैस चैम्बर बना देती थी.
80 के दशक में जब प्रदूषण की निगरानी करने वाला पहला स्टेशन शहर में लगा, तो यहां की हवा में पीएम, नाइट्रोज़न और सल्फ़र डाई ऑक्साइड, ओज़ोन और दूसरे ज़हरीले तत्व पाए गए.
इसके बाद कई संस्थाओं ने मेक्सिको सिटी के हालात सुधारने के लिए काम तेज़ कर दिया.
लोगों से अपील की गई कि वो हफ़्ते में एक दिन अपनी निजी गाड़ियां न चलाएं. यानी जनता ने ख़ुद ही मेक्सिको सिटी की हवा को साफ़ करने की शुरुआत की.
लुइसा बताती हैं कि इससे मेक्सिको सिटी की हवा काफ़ी बेहतर हुई. पेट्रोल की बिक्री कम हो गई. सड़कों पर गाड़ियां कम दिखने लगीं.
1989 में सरकार ने हफ़्ते में एक दिन निजी गाड़ियां न चलाने का फ़ैसला अनिवार्य कर दिया. मेक्सिको सिटी ऑड-इवेन फॉर्मूला लागू करने वाला दुनिया का पहला शहर बना.
कुछ दिन तो ठीक रहा. पर, जल्द ही शहर की आबो-हवा फिर बिगड़ने लगी.
विकास का नतीज़ा है प्रदूषण
मगर, कुछ दिन बाद ही लोगों ने इस पर नाराज़गी जतानी शुरू कर दी. उनका आरोप था कि सरकार के ऑड-इवेन फ़ैसले का सबसे ज़्यादा असर कामकाजी तबक़े पर पड़ा है. लोगों ने इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू कर दिया. बहुत से लोगों ने दूसरी गाड़ी ख़रीद ली. ताकि हफ़्ते में हर दिन गाड़ी से ऑफ़िस जा सकें.
दिल्ली ने भी दो बार ऑड-इवेन फॉर्मूला लागू किया. हालांकि इसका प्रदूषण के स्तर पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ा.
लुइसा ने मेक्सिको सिटी में जो रिसर्च की, उससे पता चला कि ऑड-इवेन फॉर्मूले से हवा में पार्टिकुलेट मैटर, नाइट्रोजन-सल्फ़र डाई ऑक्साइड तो कम हो रहे थे. मगर ओज़ोन का स्तर नहीं घट रहा था. ये दमघोंटू गैस हिलने का नाम नहीं ले रही थी.
दिल्ली भी ऐसे ही हालात की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रही है.
ब्रिटेन की यॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एलिएस्टर लुइस कहते हैं कि प्रदूषण असल में तरक़्क़ी की क़ीमत है, जो हम जान देकर, बीमार होकर चुका रहे हैं.
प्रोफ़ेसर एलिएस्टर के मुताबिक़ लंदन शहर पिछले 400 सालों से प्रदूषण का शिकार रहा है. औद्योगिक क्रांति के बाद से ही यहां की हवा गंदी होनी शुरू हो गई थी. 1950 के दशक में तो लंदन के हालात इतने बुरे थे कि प्रदूषण की वजह से हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी.
इसके बाद जाकर शहर के हालात सुधारने के लिए काम शुरू किया गया.
कोयले से चलने वाले पावर प्लांट बंद किए गए. काला धुआं उगलने वाले कारखाने शहर के बाहर ले जाए गए. कम प्रदूषण करने वाली तकनीक को बढ़ावा दिया जाने लगा.
प्रोफ़ेसर एलिएस्टर कहते हैं कि कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाला धुआं जब हवा में मिलता है, तो वो ज़हरीली हो जाती है. इससे ओज़ोन गैस बनती है. ओज़ोन की परत, जब वायुमंडल में यानी धरती से 30-40 किलोमीटर ऊपर होती है, तो ये हमारे लिए सुरक्षा की छतरी का काम करती है.
लेकिन, अगर यही ओज़ोन धरती के क़रीब रहती है, तो ये ज़हरीले, नुकीले भाले की तरह काम करती है.
ये इंसानों और जानवरों से लेकर पेड़-पौधों तक में सुराख़ कर देती है. अगर आप ने कुछ सब्ज़ियों में छेद देखा हो, तो इसकी वजह ओज़ोन हो सकती है.
ओज़ोन की वजह से फेफड़ों पर बहुत बुरा असर पड़ता है. खांसी से लेकर, ब्रॉन्काइटिस और अस्थमा जैसी कई बीमारियां ओज़ोन से हो जाती हैं.
ओज़ोन बनने के लिए कई केमिकल ज़िम्मेदार होते हैं. इन्हें वीओसी यानी वोलेटाइल ऑर्गेनिक कम्पाउंड कहते हैं. जो नहाने के साबुन से लेकर रोज़मर्रा की तमाम चीज़ों जैसे टॉयलेट-होम क्लीनर और बर्तन धोने के साबुन तक में होते हैं.
आज से 25 साल पहले इनके बारे में पता नहीं था. मगर हम रोज़ जितने तरह के केमिकल इस्तेमाल करते हैं, इससे वातावरण में वीओसी मिलते जाते हैं, जो ओज़ोन को धरती के क़रीब जमा होने के ज़िम्मेदार होते हैं.
ऑड-इवन भी क्यों रहा बेअसर
अब आप को समझ आ रहा होगा कि वायु प्रदूषण, ऑड-इवेन फॉर्मूले से क्यों कम नहीं हुआ. वजह साफ़ थी. गाड़ियों से सल्फ़र डाई ऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड निकलते हैं.
गाड़ियां कम होने से ये केमिकल तो पर्यावरण में कम होते हैं मगर, ओज़ोन जस की तस रहती है. क्योंकि घरों से लेकर दफ़्तरों-कारखानों तक में वीओसी वाले केमिकल का लगातार इस्तेमाल होता रहता है.
कुल मिलाकर, ये कहें कि वायु प्रदूषण कम करने के लिए हमें अपने आज के रहन-सहन के बारे में सोचना होगा. हम जितने कीटनाशक और केमिकल इस्तेमाल करते हैं, उतना ही ओज़ोन निर्माण होता है. ये हवा में घुला सबसे ख़तरनाक ज़हर है.
प्रोफ़ेसर एलिएस्टर कहते हैं कि अगर हम सारे कारखाने, गाड़ियां और केमिकल हटा दें, तो भी हवा में थोड़ा-बहुत प्रदूषण रह जाएगा. क्योंकि क़ुदरती तौर पर भी आग लगने की वजह से पार्टिकुलेट मैटर हवा में मिलता है.
अब सवाल ये नहीं कि हवा को पूरी तरह से शुद्ध कैसे किया जाए. सवाल ये है कि हवा में न्यूनतम प्रदूषण का वो स्तर कौन सा हो, जो हमारी सेहत पर बुरा असर न डाले.
ये सवाल दुनिया के सामने भी है और दिल्ली के सामने भी. दिल्ली को तो अभी फ़सलों को जलाने से होने वाले धुएं को झेलना है. और जब तक सरकार ठोस क़दम नहीं उठाती, तब तक दूसरे तरह के प्रदूषण को भी झेलना होगा.
बस ये उम्मीद की जा सकती है कि ये नवंबर महीना, पिछले साल जैसा न हो.
कारों और कारखानों पर तो क़ाबू किया जा सकता है. मगर, हम सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाली रोज़मर्रा की आदतों यानी साबुन, क्लीनर के इस्तेमाल से कितना बच सकते हैं, ये हमें भी सोचना होगा.
तभी दिल्ली को साफ़ हवा मिल सकेगी.
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