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दिल्ली-एनसीआर पर फिर 'गैस-चेंबर' का खतरा?
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अगले हफ़्ते के बाद दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ सकता है.
वजह है उत्तर भारत में रबी फ़सलों की कटाई के बाद गेंहूँ के सूखे तनों को जलाए जाने की परंपरा की जो ज़्यादा दूर नहीं है.
ऐसा मानना है वायु प्रदूषण के मौजूदा कारणों और इससे निबटने के लिए काम कर रहे कुछ विशेषज्ञों का.
ग़ौरतलब है कि साल 2016 के आखिर में दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु-प्रदूषण के बढ़ते मामलों पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान सरकारों से पूछा था कि क्रॉप-बर्निंग को लेकर उनकी क्या तैयारियां हैं.
'गैस चेंबर'
दरअसल, नवंबर महीने में दिल्ली में वायु प्रदूषण भयावह स्तर तक पहुँच गया था और खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राज्य को 'गैस चेंबर' की तरह बताया था.
दिल्ली सरकार ने अदालत में पिछले कुछ वर्षों की सैटेलाइट तस्वीरों वाली एक रिपोर्ट भी पेश की थी जिसमें क्रॉप-बर्निंग को प्रदूषण या स्मॉग की बड़ी वजह बताया गया था.
स्कूलों में अवकाश घोषित कर दिया गया था और लोगों को घर से काम करने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा था.
जानकारों ने इसकी वजह पड़ोसी राज्यों में लगातार जारी रही क्रॉप-बर्निंग बताई थी और कहा था कि ये अगली फ़सल कटने पर दोबारा हो सकती है.
हाल ही में एक सेमिनार में तमाम विशेषज्ञों की राय ये भी रही कि क्रॉप-बर्निंग का दोषी पाए जाने वाले किसानों पर सरकार के जुर्माने से ज़्यादा ज़रूरत नए और असरदार क़ानूनों की है.
जुर्माना
पर्यावरण मामलों की अदालत नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी ) ने फ़सलों की कटाई के बाद बचे सूखे कूड़े को जलाने पर पाबंदी लगते हुए जुर्माना तय कर रखा है.
दो एकड़ खेत से कम वाले किसानों पर फ़सल जलाने का जुर्माना 2,500 रुपए है जबकि पांच एकड़ तक के खेत वालों पर जुर्माने की रक़म 5,000 रुपए है.
वैसे पांच एकड़ से ज़्यादा बड़ी ज़मीन पर खेती करने वालों पर क्रॉप-बर्निंग का जुर्माना 15,000 रुपए होगा.
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरन्मेंट की अनुमिता रॉय चौधरी को भी लगता है कि जब-जब फसलें काटने का सीज़न आएगा ये समस्या फिर से गहराएगी.
उनके अनुसार, "सिर्फ क़ानून बनाने से ज़्यादा, ज़मीनी स्तर पर उनका पालन करवाया जाना ज़रूरी है."
लेकिन सेंटर फॉर ससटेनेबल एग्रिकल्चर के रमनजायेलु के मुताबिक़ ये तरीका बहुत कारगर नहीं है और इसमें सुधार की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, "आप ये कैसे तय करेंगे कि फ़सल किस किसान ने जलाई, कब जलाई और कहाँ जलाई? दूसरी बात, किसान ये मजबूरी में ही करते है. दरअसल सरकारों को पंचायत स्तर पर ऐसे तरीके ईजाद करने होंगे जिससे सूखे तनों या भूसे से खाद बनाई जाए. किसान को भी इस प्रक्रिया में आर्थिक फ़ायदा दिखेगा".
सहयोग ज़्यादा ज़रूरी
अदालत से जुर्माने की बात कहे जाने के बाद कई सरकरों ने मामले पर सख्त कानून भी बना डाले हैं.
लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक़ मामले पर सरकारी सहयोग और हस्तक्षेप की ज़्यादा ज़रूरत है.
आईआईटी-दिल्ली के प्रोफ़ेसर सागनिक डे का मानना है कि, "नीति बनाने वाले लगता है सिर्फ़ पारम्परिक तरीकों को ही अपनाना चाहते हैं".
उन्होंने बताया, "1980 के बाद से करीब 21 मेडिकल शोधों ने कहा है कि भारत में वायु प्रदूषण के चलते नवजात शिशुओं का वजन काम होने से लेकर फेफड़ों की बीमारियां बढ़ती जा रहीं हैं".
जानकारों के मुताबिक़, बढ़ती गर्मी में क्रॉप-बर्निंग से 'गैस-चेंबर' जैसी स्थिति होगी कि नहीं ये तो कहना मुश्किल है, लेकिन हवा में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक ज़रूर हो सकता है.
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