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दिल्ली: आंखों में जलन, सीने में तूफान सा क्यों है?
- Author, अजय शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली की दीवाली यूँ तो यहां के बाशिंदों को अच्छी लगती है पर मुझे नहीं. इसीलिए दीवाली से एक रात पहले मैं शहर छोड़कर भाग जाता हूँ ताकि यहां की बारूदी हवा में सांस न लेनी पड़े.
इस बार भी मैं दिल्ली से भाग निकला था. दो दिन बाद पंजाब से लौटा और जैसे ही दिल्ली के क़रीब पहुँचा, मेरा दिल बैठ गया. दीवाली के बाद की दिल्ली का नाम मीडिया में 'गैस चैंबर' हो गया था.
हो सकता है इसमें कुछ सच हो. मगर जब तक मेरे फेफड़े इस 'चैंबर' में काम कर रहे हैं, तब तक मैं इतनी जल्दी इस नतीजे पर नहीं पहुँचना चाहूँगा. फिर भी सब कुछ पहले जैसा नहीं. बल्कि बहुत कुछ ख़राब हो गया है.
पिछले कुछ दिनों से रोज़ सुबह जब मैं बिस्तर से उठकर खिड़की से बाहर नज़र डालता हूँ तो धुंध में लिपटी इमारतें, गाड़ियां और लोग मुझे निराशा से भर देते हैं. आंखों में बेवजह जलन रहती है. कम से कम मेरी याद में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था. मैंने यहां पिछले 16 साल में बेहद घना फ़ॉग (कोहरा) तो देखा है लेकिन इतना घना स्मॉग (धुंध) नहीं.
मुझे डर है कि मेरा अस्थमा जो अब तक सिर्फ़ मौसम बदलने वाले पर क़हर ढाता था, अब अचानक किसी रोज़ मुझे अस्पताल न पहुँचा दे.
मैं खुले और हवादार घर का हिमायती हूँ पर अगर धुआं घर में घुसने को बेताब हो तो दरवाज़े और खिड़कियां बंद करना ही शायद अक़्लमंदी है और अब मैंने घर के हर खिड़की-दरवाज़े को पूरी तरह सील कर दिया है.
मगर घर को सील करने से समस्या तो ख़त्म नहीं होती. सांस लेने के लिए हवा तो चाहिए ही और लगता है कि वह अब दिल्ली में नहीं है.
मैं एयर प्योरीफ़ायर ख़रीदने के बारे में सोच रहा हूँ. हालांकि वो सिर्फ़ एक छोटे से दायरे में ही हवा को साफ़ रख सकते हैं. पूरे घर के लिए ऐसे कई एयर प्योरीफ़ायर चाहिए. मगर हवा ख़रीदने की क़ुव्वत हर शख़्स में नहीं होती. मुझमें नहीं है.
प्योरीफ़ायर नहीं तो क्या मास्क लगाकर मैं अपने तईं हवा छान सकता हूँ. मगर मेरा डॉक्टर इससे इत्तिफ़ाक नहीं रखता. उनका कहना है कि मास्क सिर्फ़ आंशिक तौर पर ही धुएं को नाक में घुसने से रोक सकता है. फिर भी मैंने इसे एक ट्राई देने की ठानी है. सौ नहीं तो 50-60 फ़ीसदी तक शायद राहत मिल जाए.
मुझे ख़ुद से ज़्यादा चिंता बेटे की है, जिसका खांसकर और छींककर बुरा हाल है. उसके स्कूल ने छुट्टियों का ऐलान कर दिया है ताकि उसे और उस जैसे बच्चों को घर के बाहर गंदी हवा में सांस न लेनी पड़े. बच्चों को बड़ों से ज़्यादा ताज़ी हवा चाहिए ताकि उनके फेफड़े ताक़तवर बनें. मगर दिल्ली की हवा उनके फेफड़ों की आज़माइश पर उतारू है.
मैं अक्सर ट्रैकिंग के लिए पहाड़ों पर जाता हूँ, मगर वहां मेरा दम नहीं फूलता. मेरा दम फूल रहा है यहां दिल्ली की सड़कों पर.
सरकारें लोगों की उखड़ती सांसें थामने में नाकाम दिख रही हैं और अब सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है कि वह इस 'जन आपातकाल' में कुछ करेगा.
जब तक सुप्रीम कोर्ट कुछ सोचकर अमल करने को कहे, तब तक मैं सोच रहा हूँ कि अपना इन्हेलर बैग में ही रखूँ, ताकि अगर किसी वक़्त मेरी सांसें उखड़ने लगें तो मैं उसे इस्तेमाल कर सकूँ.
मुझे इस बात का अफ़सोस है कि अब सिर्फ़ दीवाली पर दिल्ली छोड़ने से काम नहीं चलेगा.
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