अब महाराजा को बचाने के लिए ग़रीबों के पैसे लगाए जाएंगे?

एयर इंडिया

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    • Author, कीर्ति दूबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एयर इंडिया को संभालने के लिए एकबार फ़िर भारत सरकार आगे आई है.

सरकार ने एयर इंडिया को राष्ट्रीय लघु बचत निधि (एनएसएसएफ़) से 1000 करोड़ का कर्ज़ दिया है. इसके अलावा आने वाले हफ़्तों में एयरलाइन छोटी अवधि वाले कर्ज़ के ज़रिए 500 करोड़ की रकम भी हासिल करेगी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पिछले हफ़्ते एनएसएसएफ़ से मिले इस कर्ज़ पर सस्ती ब्याज दरें रखी गई है और एयरलाइन को अगले साल मार्च में ये कर्ज़ सरकार को लौटाना होगा. हालांकि कितनी ब्याज़ दर तय की गई है इसे लेकर कोई साफ़ जानकारी नहीं है.

लगभग 50 हज़ार करोड़ के घाटे में चल रहे एयर इंडिया के लिए एनएसएसएफ़ से कर्ज़ देने के सरकार के इस फ़ैसले की आलोचना हो रही है. लोग सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठा रहे हैं कि आख़िर छोटी बचत में निवेश करने वाले लोगों के पैसे को घाटे में चल रहे सौदे के लिए क्यों खर्च किया जाना चाहिए.

पिछले साल से एयर इंडिया को फ़ंड जुटाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. कर्मचारियों की सैलरी और रोज़ाना के तेल के भुगतान के लिए भी एयर इंडिया परेशानियों का सामना करना पड़ा रहा है. ऐसे में ये मदद एयर इंडिया के लिए कितनी मददगार होगी ये भी सवाल पूछे जा रहे हैं.

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एयर इंडिया के लिए सरकार के इस फ़ैसले के नफ़े-नुकसान को समझने के लिए बीबीसी हिंदी ने आर्थिक मामलों के जानकार शंकर अय्यर से बात की.

क्या एयर इंडिया के लिए एनएसएसफ़ का इस्तेमाल सरकार का सही क़दम है? इस सवाल के जवाब में आर्थिक मामलों के जानकार शंकर अय्यर कहते हैं, '' इसमें दो बात हो सकती है. एक तो ये की एयर इंडिया एक लॉस मेकिंग कंपनी है. सरकार ने अपने बजट से तो पैसे नहीं दिए लेकिन जिस फ़ंड की गारंटी वो करती है उस फ़ंड से उसे पैसे दे दिए.''

''एयर इंडिया जो पहले से बीमार है उसे जब आप लघु बचत निधि से कर्ज़ देते हैं तो ये सही फ़ैसला नहीं हो सकता क्योंकि इनकी ब्याज़ दर बैंक की ब्याज दरों से ज्यादा होती है. दूसरी बात ये कि इन फ़ंड की खासियत है कि सरकार ही इनसे कर्ज़ ले सकती है. ऐसे में अगर सरकार एयर इंडिया जैसी घाटे में चल रही पीएसयू को इस फ़ंड से मदद देने लगी तो इससे छोटी बचत योजनाओं की विश्वसनीयता भी कम होती है. जिन लोगों के लिए फ़्लाइट ही लग्ज़री है उनके पैसे का इस्तेमाल सरकार घाटे में चल रही एयरलाइन को बचाने के लिए कर रही है.''

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ये पहली बार नहीं है कि सरकार ने इस फ़ंड का इस्तेमाल एयर इंडिया के लिए किया हो. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल की शुरूआत में भी सरकार ने एयरलाइन को वीवीआईपी एयरक्राफ़्ट खरीदने और उसके मॉडिफ़िकेशन के लिए एनएसएसएफ़ का इस्तेमाल किया था.

हालांकि एयर इंडिया ने इसके लिए बैंक ऑफ बड़ौदा से 180 मिलियन डॉलर का कर्ज़ चाहती थी लेकिन कंपनी ने एनएसएसएफ़ का इस्तेमाल किया और एयर इंडिया को बैंक से कर्ज़ की ज़रूरत नहीं पड़ी.

सरकार की ये मदद AI के लिए कितनी मददगार

एक रिपोर्ट के मुताबिक एयर इंडिया लगभग 20 करोड़ रूपये का एविएशन तेल हर दिन इस्तेमाल करती है. इस साल अप्रैल में आई एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक संसदीय कमिटी को दिए गए जवाब में उड्डयन मंत्रालय ने माना था कि एयर इंडिया 200-250 करोड़ रुपये के हर महीने नकद संकट के कारण ज़रूरी स्पेयर ख़रीदने में असमर्थ है और विमानों के रखरखाव के लिए भी एयरलाइन फ़ंड की कमी से जूझ रहा है.

क्या ये रकम एयर इंडिया की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा कर पाएगी? इस सवाल पर अय्यर कहते हैं, ''ऐसा लगता है कि आदमी को गंभीर चोट लगी है लेकिन उसे कहा जा रहा है अभी बैंडेज से काम चलाओ.''

''सरकार की कोशिश है कि बस इस कंपनी को वह ज़िंदा रख पाएं तब तक, जब तक इसे कोई ख़रीदार ना मिल जाए. एक हज़ार करोड़ की रकम एयर इंडिया के स्टॉफ़ की तनख्वाह और इसके खर्चे के लिए है. एयर इंडिया के स्टॉफ़ को तनख्वाह भी वक़्त पर नहीं मिल पा रही है. इस कर्ज़ की मदद से बमुश्किल दो से तीन महीने ही निकल पाएंगे.''

कर्ज लौटाना कितना मुश्किल?

क्या अगले साल मार्च तक एयर इंडिया ये कर्ज़ लौटा पाएगी? क्या इससे लघु बचत योजनाओं की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा? इन सवाल पर वो कहते हैं, '' जरूर इसकी लोकप्रियता पर असर पड़ेगा. मार्च तक एयर इंडिया ये पैसे नहीं लौटा सकेगी और अगर ये पैसे लौटा दिए तो किसी और का कर्ज़ नहीं लौटा सकेगी. इसके अलावा मार्च तक का वक़्त इसलिए भी दिया गया होगा क्योंकि उससे पहले सरकार बजट पेश कर देगी.''

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''जहां तक ऐसी स्कीम की विश्वसनीयता की बात है तो लोगों के पैसों की सरकार गारंटी लेती है और वो पैसे तो उन्हें मिलेंगे ही. लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है जब लघु बचत निधि का सीधे तौर पर एयर इंडिया के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. मैं मानता हूं ये ग़लत फ़ैसला है. ''

एयरलाइन के बढ़ते घाटे के बीच इस साल अप्रैल में सरकार ने इसके 76 फ़ीसदी शेयर बेचने का फ़ैसला लिया था और सरकार इसके मैनेजमेंट कंट्रोल भी ट्रांसफ़र करने के पक्ष में थी लेकिन एविएशन की दुनिया में घटते मुनाफ़े को देखते हुए कोई भी कंपनी भारी कर्ज़ में डूबी एयर इंडिया को खरीदने के लिए तैयार नहीं हुई.

एयर इंडिया को जानकार सरकार के लिए 'लॉस्ट गेम' बताते हैं और इसका निजीकरण ही इसे वापस पटरी पर लाने का इकलौता तरीका मानते हैं. लेकिन एयर इंडिया के पूर्व अध्यक्ष रोहित नंदन इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा, '' एयर इंडिया सरकार की एयरलाइन है. ऐसे में ये मालिक की ही ज़िम्मेदारी है कि वह इसे बनाए रखने के लिए समय -समय पर मदद करता रहे. मैं नहीं मानता कि एयर इंडिया 'लॉस्ट गेम' है.

'सरकार की कंपनी को वही तो बचाएगी'

एयर इंडिया को बचाने के लिए एनएसएसएफ़ के इस्तेमाल पर वह कहते हैं, ''आख़िर मदद सरकार कैसे करेगी इस तरह के फ़ंड के जरिए ही तो करेगी या बैंक लोन के ज़रिए ये संभव होगा. हर साल भारत सरकार को दो से ढाई हज़ार करोड़ रूपये एयर इंडिया को देने होते हैं. ये सरकारों का प्रबंधन है कि वो कैसे और कहां से इस पैसे को देना चाहती है. ये कोई असाधारण बात नहीं है. ''

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''नए वित्तीय वर्ष के शुरू के साथ ही हर साल चार साढ़े चार करोड़ की देनदारी हमेशा बैकों और अन्य तरह की देनदारी होती है. एयर इंडिया का नुकसान हर साल चार से पांच करोड़ तक का होता है. इन देनदारी को अलग कर दे तो एयर इंडिया का परफ़ॉमेंस बाकी अन्य कंपनियों के जैसी ही है. 'इसमें काफ़ी पोटेंशियल है बस इसके लिए सही फ़ैसले और संयम की ज़रूरत है.''

रोहित नंदन नहीं मानते कि इस क़दम से छोटी बचत के निवेश की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा. वह कहते हैं, ''भारत सरकार किसी इस तरह के फ़ंड से पैसे निकालती है तो ये पूरी तरह सुरक्षित होता है. अगल एयर इंडिया ये रक़म नहीं भी भर पाती है तो भी सरकार अपने पास से लोगों के पैसे तो लौटाएगी. ऐसे में पैसों को लेकर परेशान होने की ज़रूरत ही नहीं है. ''

NSSF क्या है और सरकार के लिए कितना ज़रूरी?

सरकार की लघु बचत निधि पर निर्भरता काफ़ी ज़्यादा होती है. कई सरकारी कामों और संस्थाओं को इस फ़ंड से मदद दी जाती है. आम बजट के एक अनुमान के मुताबिक सरकार इस साल वित्तीय घाटे के 75,000 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तपोषण इस फ़ंड से करेगी.

रूपया

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ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में इस फ़ंड से वित्तीय घाटे का लगभग एक लाख करोड़ तक का वित्तपोषण किया गया था. ये कुल वित्तीय घाटे का 17 फ़ीसदी हिस्सा था. ऐसे में ये साफ़ है कि सरकार इस फ़ंड पर बड़े पैमाने पर निर्भर रहती है.

किसान विकास पत्र, एनएससी ( नेशनल सेविंग सर्टिफ़िकेट), सुकन्या समृद्धि योजना, पेंशन योजना जैसी बचत योजनाओं में किए गए निवेश से लघु बचत निधि चलता है. जिस पर सरकार साधारण बैंक की तुलना में ज़्यादा ब्याज़ दर रखती हैं.

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