सबरीमला मंदिर जा रही तीन महिलाएं बगैर दर्शन वापस लौटीं

- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, सबरीमला मंदिर (केरल) से
केरल के सबरीमला मंदिर में प्रवेश करने के लिए शुक्रवार को भारी पुलिस सुरक्षा के बीच तीन महिलाएं ऊपर चढ़ीं लेकिन भक्तों के भारी विरोध प्रदर्शन के कारण उन्हें मंदिर परिसर के पास से ही बिना दर्शन किए वापस लौटना पड़ा.
तीन में से दो महिलाएं, कविता जक्काला और रेहाना फ़ातिमा पुलिस की सुरक्षा में ऊपर चढ़ी थीं.
वहीं 46 वर्षीय मैरी स्वीटी तीसरी महिला थीं जिन्होंने मंदिर तक पहुँचने के लिए चढ़ाई शुरू की थी.
लेकिन मंदिर का सबसे निचला एंट्री पॉइंट बताये जाने वाले 'पाम्बा गेट' पर ही उन्हें रोक दिया गया.
इसके कुछ देर बाद ही ये ख़बर आई कि मैरी स्वीटी के घर पर भी भक्तों ने हमला किया है.
कविता और रेहाना फ़ातिमा जो कि पुलिस की सुरक्षा में मंदिर की तरफ बढ़ रही थीं, उनके बारे में केरल पुलिस के आईजी (क्राइम) एस श्रीजित ने बताया कि "भारी विरोध प्रदर्शन के कारण दोनों महिलाओं को पाम्बा लौटना पड़ा."

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उन्होंने मीडिया से कहा कि "हमने ये निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों से बात की."
सबरीमला मंदिर के पुजारी ने केरल पुलिस के आईजी (क्राइम) एस श्रीजित से कहा कि "अगर वो मंदिर में ज़बरन घुसने की कोशिश करेंगे तो वो मंदिर का गर्भग्रह बंद कर देंगे."
इसके बाद पुलिस ने महिलाओं को वापस लौटने के लिए राज़ी किया.
जिस वक़्त मानवाधिकार कार्यकर्ता रेहाना फ़ातिमा मंदिर में दाख़िल होने का प्रयास कर रही थीं, उसी दौरान उनके कोच्चि स्थित घर पर कुछ लोगों ने हमले भी किए.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि "पड़ोसियों ने उनके घर पर कुछ आवाज़ें सुनी और जब उन्होंने हल्ला किया तो दो लोग घर से निकलकर बाहर की ओर भागे. उनके घर पर फूल के गमले और खिड़कियों के शीशे तोड़े गए हैं."

मंदिर में प्रवेश नहीं
पिछले तीन दिनों से हिंदू संगठन सबरीमला मंदिर में 10 से लेकर 50 वर्ष तक की महिलाओं को प्रवेश से रोकने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. शुक्रवार को भी ये विरोध प्रदर्शन जारी रहा.
सुप्रीम कोर्ट से प्रतिबंधित आयुवर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की इजाज़त मिलने और मंदिर के कपाट बुधवार को खुलने के बाद भी कोई 10-50 आयुवर्ग की महिला अब तक मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकी हैं.
दोनों महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनज़र पुलिस ने इन्हें हेलमेट पहना दिये थे. लेकिन उन्हें रोकने के लिए प्रदर्शनकारी लगातार नारेबाज़ी करते रहे.
रेहाना के पति मनोज श्रीधरन ने बीबीसी को रेहाना के बारे में बताया कि "वो लिंग के आधार पर भेदभाव के ख़िलाफ़ हैं. वो हमेशा से यहाँ आना चाहती थीं. आज महिलाएं अंतरिक्ष में जा रही हैं. इसलिए उनका मानना है कि आस्था के नाम पर भेदभाव नहीं होना चाहिए. महिलाओं को पुरुषों के समान ही मंदिर में पूजा का अधिकार है."

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'सक्रियता दिखाने की जगह नहीं'
केरल के देवस्वम मंत्री के. सुरेंद्रन ने कहा कि सबरीमला सक्रियता दिखाने की जगह नहीं है.
उन्होंने कहा, "हम जानते हैं कि वो एक्टिविस्ट हैं. यह सक्रियता दिखाने की जगह नहीं है. सरकार का आदर्श है भक्तों की सुरक्षा करना."
उन्होंने कहा, "पुलिस को भक्तों और एक्टिविस्ट की पहचान को लेकर भी बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है."
शुक्रवार सीपीएम के राज्य सचिव कोडियरी बालाकृष्णन ने केरल के मंत्री के. सुरेंद्रन के बयान का खंडन करते हुए कहा कि "ये पार्टी की राय नहीं है. ये उनकी निजी राय है."

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प्रदर्शनकारियों की राय
हालांकि मंदिर के बाहर जुटे श्रद्धालुओं की राय इस मामले पर काफ़ी अलग है.
एक शख़्स ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि "ये कार्यकर्ता लोग ही सारा माहौल ख़राब कर रहे हैं. केरल सरकार और पुलिस पूरे मामले को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. क़ानून व्यवस्था बिगड़ी तो हालात और भी ख़राब हो सकते हैं."
मंदिर परिसर के पास चल रहे प्रदर्शन में शामिल एक अन्य शख़्स ने कहा कि "मंदिर के नियमों के हिसाब से किसी महिला को अंदर नहीं जाना चाहिए. मैं यहाँ पिछले 13 साल से आ रहा हूँ. ये नियम हज़ारों सालों से बने हुए हैं. इनका पालन होना चाहिए. लेकिन अब आप मंदिर में घुसना चाहते हैं, आप कोर्ट में मुक़दमा कर रहे हैं और भगवान में आपकी कोई आस्था नहीं है. इन लोगों को सिर्फ़ अपना प्रचार करना है. इन महिलाओं के साथ इतनी पुलिस है, जितनी किसी मंत्री के साथ भी नहीं होती."

कोर्ट के आदेश की अवमानना
पत्रकार कविता जक्काला मोजो टीवी के लिए काम करती हैं. उनकी कंपनी की सीईओ रेवथी पोगोद्डांडा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "कविता हिंदू हैं. वो भगवान स्वामी अयप्पा के दर्शन करना चाहती थीं. लेकिन वो महिला हैं, इसलिए उन्हें रोक दिया गया. उनके साथ चार लोगों की टीम थी."
सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन बताया था.
संवैधानिक बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि संविधान के मुताबिक़ हर किसी को, बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए.
देश भर में युवा महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया था.
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