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ब्लॉग: संसद के रास्ते राम मंदिर बनाने के भागवत के बयान का मतलब
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी न्यूज़ हिंदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी पर अपने 84 मिनट के विशेष संबोधन में बहुत सारी बातों के साथ, ये भी कहा है कि "सरकार क़ानून बनाए, क़ानून बनाकर मंदिर बनाए. इस मामले में हमारे संत जो भी कदम उठाएंगे हम उसके साथ हैं".
अयोध्या में विवादित ज़मीन पर 'राम मंदिर बनाने का आंदोलन राजनीतिक था, धार्मिक नहीं', यह बात लालकृष्ण आडवाणी लिब्राहन जाँच आयोग के सामने कह चुके हैं. ख़ुद को सांस्कृतिक संगठन कहने वाले आरएसएस के सरसंघचालक का ताज़ा बयान भी पूरी तरह राजनीतिक है.
सरकार वह पार्टी चला रही है जिसके नेताओं के लिए मोहन भागवत आधिकारिक तौर पर 'परम पूज्य' हैं, सरसंघचालक को इसी तरह संबोधित करने की परंपरा है. आरएसएस भाजपा का मातृसंगठन है इसलिए इसे एक मामूली बयान नहीं समझा जाना चाहिए.
खेल की बारीकी को समझिए. भागवत ने कहा है कि हमारे संत जो कदम उठाएंगे हम उसके साथ हैं. ये संत कौन हैं? वे सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्था विश्व हिंदू परिषद के संत-मंहत हैं जिन्होंने चार अक्तूबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलकर कहा है कि अध्यादेश लाकर मंदिर बनवाया जाए.
मंदिर तो वहीं बनेगा और हर हाल में बनेगा, ऐसा भागवत पहले भी कई बार कह चुके हैं. मगर उनका ताज़ा बयान ऐसे समय आया है जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव और अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, यही नहीं 29 अक्तूबर से अयोध्या की विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ के मुकदमे की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में शुरू होने वाली है.
उठेंगे जो सवाल
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने से पहले, संसद में अध्यादेश लाकर या विधेयक पास कराकर मंदिर बनाने की मोदी सरकार की किसी भी कोशिश पर कई नैतिक और राजनैतिक सवाल खड़े होंगे.
सबसे पहला सवाल तो यही होगा कि क्या ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और संविधान की भावना के अनुरूप है?
ज़मीन पर मालिकाना हक़ का विवाद और बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की आपराधिक साज़िश, ये दो मुकदमे हैं जो अभी चल रहे हैं.
उनके निबटारे से पहले संसद के रास्ते मंदिर बनाने की कोशिश देश की न्याय व्यवस्था का अपमान करने से कम नहीं होगी.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट का ऐसा अपमान पहले भी हो चुका है, जब उसने तलाकशुदा मुसलमान औरतों को गुज़ारा भत्ते का हक़ दिया था तो राजीव गांधी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने 1986 में संसद के रास्ते ही सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक और प्रगतिशील फ़ैसले को धो डाला.
दूसरा सवाल निश्चित रूप से यह उठेगा कि किसी एक संप्रदाय के लिए उपासना स्थल बनाने का सरकार का कदम, देश के संविधान की मूल भावना के ठीक विपरीत है. भारत का संविधान सेक्युलर है और वह सभी नागरिकों को न्याय के मामले में बराबरी का हक़ देता है.
दोनों हाथों में लड्डू और दबाव भी
जय शाह कांड, नीरव मोदी का भागना, रफ़ाल पर उठ रहे सवाल, रोज़गार की बुरी हालत, तेल के ऊँचे दाम और मोदी की निजी लोकप्रियता में गिरावट बीजेपी और संघ दोनों के लिए चिंता की बात है. बीजेपी को लगातार यह तंज़ सुनने को मिल रहा है कि राम मंदिर के निर्माण का वादा भी एक जुमला था, राम मंदिर तो नहीं बना लेकिन पार्टी ने अपना भव्य मुख्यालय ज़रूर बना लिया वगैरह.
एक दौर था जब बीजेपी कहती थी कि वह विकास के अपने ट्रैक रिकॉर्ड पर अगला चुनाव लड़ेगी, लेकिन आज उसके पास विकास के नाम पर दिखाने को शायद ही कुछ है. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण उसे सबसे आसान और कारगर समाधान दिख रहा है, और ध्रुवीकरण के लिए राम मंदिर से अच्छा मुद्दा क्या हो सकता है.
यह भी ग़ौर करने की बात है कि महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल, राजस्थान-हरियाणा में जाट असंतोष दिखता रहा है. एससी-एसटी एक्ट को लेकर पहले दलित-पिछड़े नाराज़ हुए, और अब बदलावों के बाद सवर्ण मोदी सरकार से नाराज़ हैं. जाति के आधार पर वोटरों के बंटने का नुकसान बीजेपी को ही सबसे अधिक होता है. मंडल का मुकाबला बीजेपी 1990 की तरह कमंडल से करती दिख रही है.
संघ और बीजेपी को लगता है कि मंदिर के मुद्दे के ज़ोर पकड़ने का मतलब होगा कि लोग जाति के हिसाब से नहीं, बल्कि हिंदू की तरह वोट डालेंगे तो बीजेपी को फ़ायदा होगा.
मज़ेदार बात ये भी है कि इसके लिए उसे मंदिर बनाना नहीं है, मंदिर बनाने की कोशिश करते हुए दिखना है, और सभी विरोधियों को 'हिंदुओं का दुश्मन' साबित करना सबसे आसान काम होगा.
शायद सबसे बड़ा सवाल ये है कि मुसलमान या संविधान का मुद्दा कौन उठाएगा? मोहन भागवत साफ़ कह चुके हैं कि कोई भी पार्टी राम मंदिर का विरोध नहीं कर सकती. उनकी बात सही है, 'टेंपल रन' में मोदी को टक्कर दे रहे राहुल गांधी सॉफ़्ट हिंदुत्व को पहले ही अपना चुके हैं, वे राम मंदिर के मुद्दे पर संघ और भाजपा से क्या ही लड़ेंगे?
बीजेपी अगर अयोध्या में मंदिर के लिए संसद में बिल या अध्यादेश ले आती है तो उसे ठोस राजनीतिक चुनौती मिलने की कोई ख़ास संभावना नहीं है, और जो भी चुनौती मिलेगी वह बीजेपी के लिए ही टॉनिक का काम करेगी. बीजेपी इस बात को अच्छी तरह समझती है इसलिए संसद के शीतकालीन सत्र में अगर ऐसी कोई कोशिश होती है तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए.
बीजेपी आरएसएस की इस कोशिश को क़ानूनी चुनौती ज़रूर मिल सकती है, उसका परिणाम चाहे कुछ भी निकले, बीजेपी का प्रचार तंत्र इसी बात पर वोट मांगेगा कि हिंदुओं के देश में, भगवान राम जहां पैदा हुए थे वहां मंदिर बनाने में कितनी बाधाएं हैं, हिंदू अपने ही देश में कितना विवश है वगैरह...
कुल मिलाकर यही दिख रहा है कि स्मार्ट सिटी, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया के रास्ते होते हुए बीजेपी 1990 के उसी मोड़ पर पहुंच गई है जहां 'मंदिर वहीं बनाएंगे' की गूंज फिर सुनाई देने लगी है.
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