चुनावी 'लीला' में क्या इस बार राम करेंगे बेड़ा पार!

    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली की चांदनी चौक लोकसभा सीट से सांसद डा. हर्ष वर्धन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालते हैं. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ उनके पास पर्यावरण मंत्रालय का भी जिम्मा है.

तमाम व्यस्तता को परे रखकर डा. हर्ष वर्धन शुक्रवार को एक नई भूमिका में दिखे. उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र की एक रामलीला में राजा जनक का रोल निभाया.

रामलीला के मंच पर उतरने के पहले इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "मुझे जनक का रोल करना है. ये अभिनय में दिलचस्पी का मुद्दा नहीं है. साथियों ने कहा तो कर दिया. मैं एक्टर नहीं बनने जा रहा हूं."

लेकिन सवाल एक और है.

लोकसभा चुनाव में जब एक साल से भी कम वक़्त बाकी है तो क्या रामलीला के मंच पर उतरकर डा. हर्ष वर्धन किसी गणित को साधने की कोशिश में हैं?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "ये फालूत सवाल है."

रामलीला में भूमिका पर सवाल

लेकिन, चांदनी चौक संसदीय सीट से जुड़ा हर शख्स इस सवाल को 'फालतू' बताकर खारिज करने के मूड में नहीं है.

चांदनी चौक से सांसद रह चुके दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जेपी अग्रवाल कहते हैं, "ये (भारतीय जनता पार्टी) अपनी नाकामी छुपाने के लिए राम के नाम का सहारा लेते हैं. इन्होंने (डा. हर्ष वर्धन ने) पहले रामलीला में हिस्सा क्यों नहीं लिया? ये चुनाव के पहले होने वाली ये आख़िरी रामलीला है. लेकिन इन्हें कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा."

लेकिन यहां सवाल सिर्फ़ एक सीट का नहीं है. साल 2019 के चुनाव की आहट जैसे-जैसे करीब आ रही है, राजनीतिक गलियारों में राम के नाम की गूंज भी सुनाई देने लगी है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 'साधु स्वाध्याय संगम' नाम के एक कार्यक्रम में संतों से राम मंदिर मुद्दे को एक बार फिर से उठाने की अपील की.

इसके बाद इसी महीने के पहले हफ़्ते में विश्व हिंदू परिषद ने संतों की 'उच्चाधिकार समिति' की बैठक बुलाई जिसमें केंद्र सरकार से 'क़ानून बनाकर राम मंदिर के मार्ग की बाधाओं को दूर करने' की मांग की गई.

विकास बाद में, पहले 'राम'?

क्या ये कोशिश सिर्फ़ संतों की आस्था से जुड़ा मामला है या फिर ये मंदिर की राजनीति को गरमाने की कोशिश है, इस सवाल पर बीबीसी हिंदी रेडियो के कार्यक्रम इंडिया बोल में शरीक हुए वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "ये सातवां लोकसभा चुनाव होगा, जिसमें संघ परिवार राम मंदिर को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है."

लेकिन फिलहाल सिर्फ़ राम मंदिर की बात नहीं हो रही है. उत्तर प्रदेश में रामलीलाओं का भव्य आयोजन करने और स्कूलों में रामलीलाएं कराने की भी तैयारी है.

बीते साल उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या में दीवाली के मौके़ पर दीपादान कार्यक्रम आयोजित करवाए थे.

राम मंदिर मुद्दे को साल 1989 से ही भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में अहम जगह मिलती रही है लेकिन साल 2014 के आम चुनाव से पहले जारी 42 पन्ने के घोषणा पत्र में इस मुद्दे का ज़िक्र आख़िरी यानी 41 वें पन्ने पर था. यानी ये मुद्दा हाशिए पर दिख रहा था.

उस वक्त विश्लेषकों का ये भी कहना था कि ये मुद्दा अब वोट दिलाने का दम खो चुका है. तो फिर, अब इस मुद्दे को उठाने से क्या हासिल हो सकता है?

रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी विकास के नाम पर उतरे थे. लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि मौजूदा केंद्र सरकार आर्थिक मोर्चे पर फेल है. नोटबंदी से हुई दिक्कतें गिनाई जा रही हैं. ऐसे में जज्बाती सवाल उठाए जा रहे हैं."

वो ये भी कहते हैं कि भारत एक बड़ा देश है और यहां सिर्फ़ एक मुद्दा हर व्यक्ति को अपील नहीं करता.

राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं, "सबकी अलग प्राथमिकता हैं. कुछ लोग आर्थिक मुद्दों पर वोट देते हैं. कुछ उम्मीदवार की जाति देखते हैं. हिंदू समुदाय में जिन लोगों का विश्वास है कि राम का जन्म उसी जगह पर हुआ था, उन्हें ये मुद्दा उत्तेजित कर सकता है."

'सरकार काम करे तो बेहतर'

कांग्रेस नेता जेपी अग्रवाल दावा करते हैं कि इस मुद्दे को उठाकर सरकार की नाकामी से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है.

वो कहते हैं, "केंद्र सरकार ने साढ़े चार साल में कोई काम नहीं किया. हर तरफ हालात बुरे ही हुए हैं. आर्थिक स्थिति देख लें. डॉलर के मुकाबले रुपये गिरा हुआ है. महंगाई देखनी है तो पेट्रोल के दाम देख लें. अब तक शेयर में लाखों रुपये डूब गए. छोटे उद्योग इतने बंद हुए हैं कि लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं. प्रॉपर्टी के दाम गिरे हैं."

लेकिन, राम के नाम पर दांव सिर्फ संघ परिवार नहीं लगा रहा है. कांग्रेस पर भी राम के नाम का सहारा लेने का (यानी सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाने का) आरोप लग रहा है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता 'राम वन गमन पथ' यात्रा निकाल रहे हैं.

जेपी अग्रवाल का दावा है कि इस यात्रा का मक़सद राम के नाम का चुनावी इस्तेमाल नहीं बल्कि मध्य प्रदेश सरकार के अधूरे वादे को याद दिलाना है.

वो कहते हैं, "मौजूदा मुख्यमंत्री (शिवराज सिंह चौहान) ने राम वन गमन पथ बनाने का वादा किया था. ये यात्रा उसी का जवाब है. उन्हें ये बताना ज़रूरी है कि उन्होंने झूठ बोला था. हम (कांग्रेस) राजनीति में काम का सहारा लेते हैं धर्म का नहीं."

लेकिन, रामदत्त त्रिपाठी की राय अलग है. वो कहते हैं कि कांग्रेस साल 1971 के बाद से ही साफ़्ट हिंदुत्व का कार्ड आजमाती रही है.

वो कहते हैं, "साल 1971 के युद्ध के बाद कांग्रेस को लगा कि अल्पसंख्यकों के एक वर्ग में नाराजगी हुई है. इस बाद इंदिरा गांधी का झुकाव सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ हुआ."

"1982 में अयोध्या में राम कथा पार्क के लिए ज़मीन अधिग्रहीत की गई. उसी के ठीक बाद विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर आंदोलन शुरू किया."

क़रीब चार दशक बाद आज भी ये मुद्दा चुनावी ज़मीन के केंद्र में आ रहा है और राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं कि राजनीतिक दलों को समझना चाहिए अब हिंदू हो या मुसलमान सभी आर्थिक विकास चाहिए.

वो कहते हैं, "आप चीन को देखिए, वो इतनी तरक्की कर रहा है. अगर यहां भी लोग खुशहाल नहीं होंगें तो ये सिस्टम के लिए ख़तरा होगा."

लेकिन क्या चुनावों के पहले राजनीतिक दलों के मुद्दे तय करने वाले सियासी रणनीतिकार भी ऐसा ही सोच रहे हैं?

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