You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: मोहन भागवत के भाषण से बदल जाएगी संघ की छवि?
- Author, प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा
- पदनाम, राज्यसभा सांसद, बीजेपी
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत का तीन दिनों का भाषण और प्रश्नोत्तर की श्रृंखला पिछले कुछ दशकों में देश के सामाजिक-सांस्कृतिक बहस में संघ का सबसे बड़ा और निर्णायक हस्तक्षेप है.
भारत ही नहीं दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का स्तर पिछले कुछ दशकों में तेजी से नीचे गिरा है जो हमें दिन-प्रतिदिन दिखाई देता है.
बौद्धिक बहस अवमानना की भाषा में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो गई है. बहस में तथ्य और तर्क ग़ायब हो गए हैं और धारणा प्रमुख बन गई है.
संघ ने अपने से असहमति रखने वाले, यहाँ तक कि कटु आलोचकों को भी आमंत्रित कर एक बड़ा संदेश दिया है.
राजनीति में विरोध और असहमति का मतलब परस्पर शत्रुता नहीं होनी चाहिए.
संघ का वास्तविक चेहरा
तीन दिनों का सार ये है कि मोहन भागवत ने संघ के वास्तविक चेहरे को दुनिया के सामने रखा है. संघ जो नहीं है उसे संघ बनाकर इसके विरोधी वर्षों ही नहीं दशकों से पेश करते आए हैं.
इसलिए संघ के समानांतर इसकी एक ऐसी छवि गढ़ दी गई कि यह लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता का घोर शत्रु है और इसके प्रभाव बढ़ने से मुसलमानों और ईसाइयों का अस्तित्व संकट में आ जाएगा.
इसे फ़ासिस्ट और साम्प्रदायिक बनाकर देश के भीतर परोसा जाता रहा है. हाल के वर्षों में वाममार्गी बुद्धिजीवियों और राहुल गांधी ने इसे दुनिया के सामने भी बेचना शुरू कर दिया था.
'मुस्लिम ब्रदरहुड' से तुलना
हाल में राहुल गांधी ने लंदन में आरएसएस की तुलना 'मुस्लिम ब्रदरहुड' से कर दी थी. हालांकि ये अलग बात है कि इस पर वो अपनी पार्टी के भीतर भी अलग-थलग पड़ गए थे.
अगर किसी ने समर्थन भी किया तो अगर-मगर लगाकर किया. संघ की समानांतर छवि बनने के पीछे एक दूसरा भी कारण था.
संघ के साहित्य में कुछ न्यूनताएं और बाहर से समर्थन करने वाले कुछ लोगों द्वारा हिन्दू महासभा के अंदाज में विचारों को रखना. इसका लाभ संघ के विरोधी संघ की छवि धूमिल करने के लिए लगातार उठाते रहे हैं.
1960 के दशक में...
संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) ने साठ के दशक में इसे महसूस किया था.
तब उन्होंने प्रख्यात् मुस्लिम विद्वान और पत्रकार डॉक्टर सैफुद्दीन जिलानी को 30 जनवरी, 1971 को कलकत्ता में एक लम्बा साक्षात्कार दिया था.
ये साक्षात्कार संघ की दृष्टि को अल्पसंख्यकों, राजनीति, आर्थिक प्रश्न, देश की संघीय व्यवस्था आदि पर स्पष्ट किया गया था.
ये साक्षात्कार संघ के स्वयंसेवकों के लिए संदर्भ बिंदु बना.
लगभग पांच दशकों के बाद मोहन भागवत ने फिर एक बार सार्वजनिक तौर पर उन सभी आशंकाओं, संघ के प्रति विरोध के कारणों और संघ के उद्देश्य पर निर्णायक बातें की हैं.
'बंच ऑफ़ थॉट्स'
विरोधी लगातार गोलवलकर के भाषणों का संकलन 'बंच ऑफ़ थॉट्स' को संदर्भ से हटकर उद्धृत करते रहे हैं.
इसमें तीन अध्यायों का शीर्षक आंतरिक ख़तरा 1,2,3 दिया गया है.
साल 1946-47 में जिस प्रकार से जिन्ना ने प्रत्यक्ष कार्रवाई कर निर्दोष लोगों की हत्या और साम्प्रदायिक जुनून पैदा किया था उस संदर्भ में दिए गए भाषण में जिन्ना के समर्थक मुस्लिम लीगियों को आंतरिक ख़तरा कहा गया था.
ठीक उसी प्रकार स्वतंत्रता के बाद 1948 में कम्युनिस्टों ने तेलंगाना में सशस्त्र संघर्ष कर नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राज्य की सम्प्रभुता और स्थिरता को चुनौती दी थी.
उस संदर्भ में कम्युनिस्टों को आंतरिक ख़तरा बताया गया था और तीसरा धर्म परिवर्तन और शिक्षा के मुद्दे पर ईसाई मिशनरियों और नेहरू सरकार मध्य प्रदेश सहित कई प्रान्तों में आमने-सामने हो गई थी.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियावाद
केरल में ईएमएस. नम्बूदरीपाद और रोमन कैथोलिक मिशनरियों के बीच सीधा संघर्ष चल रहा था.
तब नेहरू ने मिशनरी गतिविधियों को जांचने के लिए नियोगी कमीशन का गठन किया था तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नेता बीटी रणदीवे ने रोमन कैथोलिक को अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियावाद का हिस्सा बताया था.
उस संदर्भ में गोलवलकर ने इन्हें 'इंटरनल थ्रेट' कहा था. विरोधियों ने संदर्भ से हटकर इसको बार-बार प्रचारित किया.
गोलवलकर भारत के एक महान दार्शनिक और राष्ट्रवादी व्यक्तित्व के धनी थे.
उनकी छवि और विचारों को ग़लत तरीके से प्रस्तुत करने के कारणों को संघ ने समझा और संघ ने अधिकृत रूप से 'गोलवलकर: द मैन एंड मिशन' नामक पुस्तक की रचना की और बाद में कई खण्ड़ों में 'श्रीगुरुजी समग्र' करके प्रकाशित किया.
विरोधियों के खोखले विचार
मोहन भागवत ने सार्वजनिक रूप से 'बंच ऑफ़ थॉट्स' के तात्कालिक संदर्भों में दी गई बातों को आज के संदर्भ में अप्रासंगिक बताकर संघ विरोधियों के खोखले विचार को अपदस्थ कर दिया.
कोई भी समाज और संगठन लंबे समय तक भूमिका तब ही निभाता है जब वह बदलते वातावरण में नए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक यथार्थ को लगातार जांचता-परखता रहता है और उसके अनुकूल अपने दृष्टिकोण को निर्धारित करता है.
ये गतिशील संगठनों की एक विशिष्ट खूबी होती है. डॉक्टर हेडगेवार से भागवत तक संघ इस पद्धति को बखूबी से करता आया है.
मोहन भागवत ने कुछ वर्षों पहले एक साक्षात्कार में कहा था कि संघ का जो मूल सिद्धांत हिन्दू राष्ट्र का है वह अपरिवर्तनीय है और बाक़ी सबकुछ परिवर्तनीय है.
हिन्दू राष्ट्र को लेकर भी विरोधी अनेक भ्रांतियां पैदा करते रहे.
बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक जैसा विभाजन
भागवत ने साफ़ कर दिया कि ये एक जीवन पद्धति और सांस्कृतिक विरासत और सभ्यता से जुड़ी अवधारणा है जिसमें सभी धर्मों को समान और सम्मानित स्थान प्राप्त है.
उन्होंने देश के सामने जिस प्रश्न को विमर्श के लिए छोड़ा है वह भारत के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है.
अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत में वह सभी धर्म थे जो आज हैं परंतु बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक जैसा विभाजन नहीं था.
ये विभाजन अंग्रेजों ने पैदा किया, जिसका उद्देश्य 'बांटो और राज करो' था. ये अवधारणा हमारे मन-मस्तिष्क, विमर्श और संविधान से समाप्त हो, यह आवश्यक है.
यह बात तो भारत के संविधान सभा में भी स्वयं मुस्लिम लीग के नेता तजामुल हुसैन ने भी कही थी.
छद्म धर्मनिरपेक्षता की हार
संघ ने सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर जो अपना रूख़ साफ़ किया है उसमें इसने जो रेखा खींची है उससे कोई भी बाहर या बहिष्कृत नहीं है.
संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप का पहला चरण छद्म धर्मनिरपेक्षता को परास्त करने का था.
आज लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को बदल रहे हैं.
अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और बहुसंख्यक की उपेक्षा, दोनों बातें जो पहले गैर-भाजपा दलों के आचरण में था वह चमत्कारिक रूप से लुप्त होता जा रहा है. यह संघ की वैचारिक जीत है.
'आइडिया ऑफ़ इंडिया'
संघ ने 1975-77 में संविधान के पक्ष में आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेतृत्व किया था.
जिसके कारण 1977 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस पराजित हुई थी और जनता पार्टी का गठन हुआ था.
आज के संदर्भ में संघ एक नई भूमिका लेकर सामने आया है, जब 'आइडिया ऑफ़ इंडिया' के ऊपर सहमति पैदा करने की पहल के रूप में है.
अब तक इसे पश्चिम की नजरों से परिभाषित किया जा रहा था.
भागवत ने संघ के विचार को सामने रखकर इसे अपने इतिहास, विरासत और दृष्टि से परिभाषित करने की बात कहकर संघ विरोधियों के सामने चुनौती फेंक दी है.
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना
संघ का भाजपा के साथ निश्चितरूप से वैचारिक और संगठनात्मक संबंध है. उसका ऐतिहासिक कारण है.
संघ की विचारधारा और संगठन का जिस प्रकार से झूठ और प्रपंच का सहारा लेकर विरोध किया जाता रहा उसके कारण ही जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई.
लेकिन संघ की कल्पना किसी राजनीतिक दल का सहयोगी या निर्देशक बनकर नहीं होकर दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद को समृद्ध और मजबूत करने का है.
जिस अनुपात में बाक़ी दल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के क़रीब आएंगे और वोट बैंक की राजनीति से अपने आपको मुक्त करेंगे उसी अनुपात में संघ अपनी उस कल्पना के क़रीब पहुंचेगा.
भागवत ने आरक्षण, समलैंगिकता, लींचिंग सभी मुद्दों पर दो टूक शब्दों में संघ की राय बताकर संघ के विरोधियों ने जो संघ की काल्पनिक बनाई थी उस छाया को ध्वस्त कर दिया.
भारत का आधुनिक इतिहास
भागवत का ये साक्षात्कार आने वाले दशकों तक संदर्भ बिंदु बन जाएगा.
संघ एक प्रगतिशील सामाजिक-सांस्कृतिक ताक़त के रूप में जैसा है वैसा अब दुनिया के सामने भागवत के भाषण श्रृंखला से स्थापित हुआ है.
अब इसके विरोधियों का विचार खोखले डब्बे की तरह रह गया है.
एक ओर तो वे संवाद से भाग रहे हैं तो दूसरी तरफ भागवत द्वारा कही गई बातों और उठाए गए प्रश्नों से जूझने की जगह वे वही पुराना राग अलाप रहे हैं.
ये ऐसा ही है किसी लैम्प-पोस्ट के पास जाकर उसकी रोशनी की लाभ-हानि की बात करने की बजाय उसके खम्भे से सिर पीटना.
भारत के आधुनिक इतिहास में पुराना विमर्श और नया विमर्श का विभाजन भागवत ने अपने भाषण श्रृंखला से कर दिया है.
( ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)