नरेंद्र मोदी सरकार में इस्तीफ़े क्यों नहीं होते?

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- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'नहीं...नहीं इसमें मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते हैं भैया. यूपीए सरकार नहीं है, ये एनडीए सरकार है.'
मोदी सरकार की शपथ से लेकर आज की तारीख़ तक नज़र दौड़ाएं तो जून 2015 में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की कही ये बात सच साबित होती है.
ललित मोदी मसले पर वसुंधरा राजे, सुषमा स्वराज का बचाव करते हुए राजनाथ सिंह ने ये बातें कही थीं. ये वही दौर था, जब तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी कई मामलों को लेकर विपक्ष के निशाने पर थीं. इन मसलों पर संसद में हंगामा, ट्विटर पर टॉप ट्रेंड, न्यूज़ चैनलों में घंटों डिबेट तो हुईं, लेकिन बस एक वो चीज़ नहीं हुई, जिस मोर्चे पर विपक्ष सीना ताने सबसे आगे खड़ा था...इस्तीफ़ा.
#MeToo अभियान में केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर भी यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं. अकबर ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है. अकबर पर जब ये आरोप लगे, तब वो नाइजीरिया में थे. कयास लगाए जा रहे थे कि अकबर लौटने पर इस्तीफ़ा देंगे. अकबर की मुल्क वापसी तो हुई मगर इस्तीफ़े की उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हासिल हुई. अकबर ने उनके ख़िलाफ़ आरोप लगानेवाली महिला प्रिया रमानी के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा दर्ज करा दिया.
'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' नारा देने और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दावे करने वाली सरकार में एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफ़ा न देना चौंकाता नहीं है. इससे पहले कई ऐसे मामले हुए जिनमें बीजेपी से जुड़े नेताओं और मंत्रियों के किसी विवाद में फँसने पर इस्तीफ़ा नहीं हुआ.
ऐसे ही मामलों पर एक नज़र. साथ ही ये सवाल भी कि इस्तीफ़ा लेने में क्यों यक़ीन नहीं रखती है मोदी सरकार? हमने यही सवाल राजनीति के जानकारों से जानने की कोशिश की.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ''#MeToo अभियान में पहली बार महिलाएं ऐसा खुलकर कह रही हैं. जांच होने तक अगर एमजे अकबर को सरकार जाने के लिए नहीं कह रही है तो 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी बातें जुमले ही हैं.''
पत्रकार अजय सिंह इस राय से इत्तेफ़ाक नहीं रखते हैं.
वो कहते हैं, ''मांग पर न लोग रखे जाते हैं और न इस्तीफे होते हैं. ये अच्छी बात है कि इस्तीफ़े नहीं हो रहे हैं. जब तक एमजे अकबर संपादक रहे, तब तक किसी को दिक्कत नहीं हुई. इस्तीफे किसी के आरोप से नहीं दिए जाते हैं. हां अगर कोई जांच एजेंसी ये आरोप लगाती है, तब स्थिति अलग हो जाती है.''
मोदी सरकार: विवादों पर एक नज़र...

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निहाल चंद मेघवाल
2014 में मोदी सरकार जब शपथ ले रही थी, तब राजस्थान के गंगानगर से सांसद बने निहाल चंद मेघवाल को भी केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री बनाया गया.
जून 2014 में मेघवाल पर रेप का आरोप लगा, लेकिन उनका मंत्रीपद नहीं गया. सात महीने में मेघवाल का विभाग ज़रूर बदल दिया गया.
वैसे तो मेघवाल पर चलने वाला मामला साल 2011 का था, लेकिन मोदी सरकार में मंत्री बनने के बाद वो मामला मीडिया के सामने एक बार फिर से आया.
उनका मंत्रालय 2016 में छीना गया. यानी जब उन पर आरोप लगे, उसके दो साल बाद तक वो मंत्री पद पर कायम रहे.

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स्मृति इरानी
अमेठी से 2014 में लोकसभा चुनाव हारीं स्मृति ईरानी 26 मई को राष्ट्रपति भवन में मंत्री पद की शपथ ले रहीं थीं. स्मृति को अहम माने जाने वाला मानव संसाधन विकास मंत्रालय दिया गया.
मंत्रालय संभालने के बाद स्मृति इरानी अपने उठाए कदमों की बजाय अलग वजहों से ख़बरों में रहीं.
- रोहित वेमुला की आत्महत्या पर स्मृति इरानी के बयान
- स्मृति की डिग्री
- जेएनयू में 'भारत विरोधी नारे' और छात्रों का एकजुट होना
- बिहार के शिक्षा मंत्री के डियर कहने पर आपत्ति
- दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू चार साल के अंडर ग्रैजुएट प्रोग्राम को लेकर विवाद
ये वो कुछ मामले हैं जिनमें विपक्ष के नेताओं से लेकर सोशल मीडिया तक एक तबका स्मृति इरानी का विरोध करता दिखा. हालांकि स्मृति का बचाव करने वाले भी कम नहीं थे.
मगर ये एक ऐसा मसला रहा जिसपर कांग्रेस फ्रंटफुट पर नज़र आई. प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्मृति का इस्तीफ़ा मांगा गया. छात्र संगठनों ने एकजुट होकर सरकार विरोधी नारों के बीच स्मृति से मानव संसाधन विकास मंत्रालय छोड़ने के लिए कहा. मगर विपक्ष की इस मांग पर सरकार ने कान बंद रखे और वक़्त बीतने का इंतज़ार किया.
2016 में स्मृति को शिक्षा मंत्रालय से हटाकर कपड़ा मंत्रालय दिया गया. तब सरकार में उनका कद कम करने की चर्चा जोरों पर थी. लेकिन फिर से हुए मंत्रिमंडल के फेरबदल में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा गया. लेकिन मंत्रालय बदलने का कोई असर स्मृति के विवादों से नाते पर नज़र नहीं आया.
इसी साल अप्रैल 2018 में स्मृति इरानी के फ़ेक न्यूज़ लिखने वाले पत्रकारों को ब्लैकलिस्ट करने का फ़ैसला चर्चा में रहा. स्मृति के इस फ़ैसले का विरोध इस कदर हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से इस फ़ैसले को वापस लिया गया.
इस विवाद के सामने आने के बाद सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय छीन लिया गया. लेकिन आज भी वो केन्द्र सरकार में केन्द्रीय मंत्री हैं.

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सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे
जून 2015
भारतीय मीडिया में उन दस्तावेजों को लेकर काफी बहस हुई जिसमें ललित मोदी की मदद करने को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर आरोप लगे.
ऐसी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर छाईं जिनमें वसुंधरा राजे और ललित मोदी एक-दूसरे के साथ दिख रहे थे. एक निजी चैनल से बात करते हुए ललित मोदी ने ये स्वीकार किया था कि वसुंधरा राजे ने उनके पक्ष में लिखित गवाही दी थी.
हालांकि वसुंधरा ने इन आरोपों को ख़ारिज तो किया, लेकिन ये माना कि ललित मोदी से उनके परिवारिक संबंध रहे हैं.
मदद के आरोप सुषमा स्वराज पर भी थे. सुषमा स्वराज ने तब कहा था, ''चूंकि ललित मोदी की पत्नी के कैंसर का इलाज पुर्तगाल में चल रहा था, इसलिए पुर्तगाल जाने को लेकर की गई मदद मानवीय आधार पर थी.''
लेकिन सुषमा स्वराज का 'मानवीय आधार' तर्क और वसुंधरा राजे के ललित से 'परिवारिक संबंध' का कारण कांग्रेस को रास नहीं आया.
कांग्रेस ने दोनों नेताओं के इस्तीफ़े की मांग की. एक वक़्त ऐसा भी आया, जब ये माना जा रहा था कि वसुंधरा राजे इस्तीफ़ा दे देंगी. मगर चुप्पी बरतने का तरीका सरकार के पक्ष में रहा और वक्त के साथ मामला दब गया.

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सुरेश प्रभु
शिवसेना छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के कुछ घंटों बाद ही नवंबर 2014 में रेल मंत्री बनाए गए. सुरेश प्रभु के काल में कई रेल हादसे हुए.
इन हादसों को लेकर सुरेश प्रभु को आलोचनओं का सामना करना पड़ा. विपक्ष ने इस्तीफ़े की मांग भी की. अगस्त 2017 में अपनी तरफ से सुरेश प्रभु ने इस्तीफ़े की पेशकश की. संभवत: मोदी सरकार में सुरेश प्रभु इकलौते मंत्री हैं, जिन्होंने कोई ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा देने की बात की थी.
लेकिन सुरेश प्रभु का इस्तीफ़ा मंज़ूर नहीं किया गया. लेकिन एक महीने बाद प्रभु से रेल मंत्रालय लेकर उन्हें कॉमर्स और इंडस्ट्री मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी गई.
अप्रत्यक्ष रूप से ही सही ये बात एक बार फिर साबित हुई कि मोदी सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते.

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अरुण जेटली
आपको वो माफ़ी याद है, जो हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अरुण जेटली से मांगी थी.
ये मामला था 'दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन' DDCA में कथित भ्रष्टाचार का. साल 2015 में अरविंद केजरीवाल ने अरुण जेटली पर DDCA की अध्यक्षता के दौरान भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था.
इस केस के वक़्त प्रदेश स्तर पर जेटली के इस्तीफ़े की मांग जमकर हुई थी. लेकिन जेटली के इस्तीफे की मांग सिर्फ इसी मसले पर नहीं हुई है.
विजय माल्या ने दावा किया कि वो भारत छोड़ने से पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले थे. भारतीय बैंकों के नौ हज़ार करोड़ रुपये लेकर फरार हुए विजय माल्या के इस दावे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जेटली से इस्तीफ़े की मांग की.
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लेकिन वो आज भी देश के वित्त मंत्री हैं.

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यूपीए में इस्तीफ़े होते थे?
ज़ाहिर है कि मोदी सरकार में इस्तीफ़ों की मांग महज़ एक मांग बनी रही.
लेकिन अगर यूपीए के 10 सालों पर नज़र दौड़ाई जाए तो तब विपक्ष में बैठी बीजेपी ने मनमोहन सरकार के दो मंत्रियों का इस्तीफा ले ही लिया था.
- अश्विनी कुमार: कोयला ब्लॉक केस में आरोपों को लेकर क़ानून मंत्री के पद से 2013 में इस्तीफ़ा
- पवन बंसल: रेलवे रिश्वत केस में आरोपों के चलते रेल मंत्री के पद से 2013 में इस्तीफ़ा
- ए राजा: 2010 में यूपीए सरकार में दूरसंचार मंत्री ए राजा को टू-जी केस में इस्तीफ़ा देना पड़ा. बाद में टू-जी कोई घोटाला ही साबित नहीं हुआ.

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क्या है इस्तीफ़े की राजनीति?
पत्रकार अजय सिंह ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, ''मुश्किल ये है कि अगर कोई आरोप क़ानूनी रूप से साबित हो सकता है और वो आरोप किसी के मंत्री पद पर रहते हुए हुआ तो ये अलग केस हो जाता है. लेकिन यहां तो कुछ लोग बोल रहे हैं तो सुन लीजिए. इसमें इस्तीफ़ा कहां से आ गया?''
क्या मोदी सरकार इस्तीफ़ों में यक़ीन नहीं रखती है?
इस पर नीरजा चौधरी कहती हैं, ''यूपीए के दौर में अशोक चह्वाण से शुरू होकर कई लोगों को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. बाद में वो मैनेज नहीं कर पाए थे. मौजूदा सरकार भी उसी से सबक लेती नज़र आती है. ये सरकार की रणनीति भी है और ये विश्वास भी है कि हमें जो करना है हम वो करेंगे, कर लो जो कर लो.. ये रवैया है. पहले के ज़माने में नैतिकता होती थी, वो अब नहीं है. आप सत्ता में बैठे हैं. इससे चल रही जांच में एक सिग्नल जाता है. इसको नकार देना सही नहीं है.''
अजय सिंह कहते हैं, ''यूपीए में हुए इस्तीफ़े उस वक़्त हुई घटनाओं को लेकर हुए थे. अगर सोशल मीडिया पर इस्तीफ़े की मांग हो रही है तो उसे आप ज़िम्मेदार नहीं मान सकते. सोशल मीडिया की बात छोड़ दीजिए. ''
यूपीए और एनडीए में इस्तीफ़े को लेकर रवैये पर अजय सिंह ने कहा, ''टू-जी केस में सीएजी की रिपोर्ट थी. एमजे अकबर केस में किसी जांच एजेंसी की कोई रिपोर्ट नहीं है. जांच होने तक पद छोड़ने की बात की जाए तो राजीव गांधी ने बोफोर्स और नरसिम्हा राव ने लखुभाई पाठक केस में कहां पद छोड़ा था? पवन बंसल केस में सीबीआई ने उनके भतीजे को गिरफ्तार किया था. पवन बसंल का ऑफिस शामिल था. कई चीज़ों को एक साथ मिक्स करने से दिक्क़त होगी. राजनीति को राजनीति के हिसाब से देखना चाहिए.''
पत्रकार नीरजा चौधरी कहते हैं, ''यूपीए सरकार के दौरान हम एक चीज़ तो कह सकते हैं कि मंत्रियों को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. मोदी सरकार को लगता है कि इन सबसे असर नहीं पड़ता है. उल्टा कहीं हम पर ही असर न पड़े. लोग हम पर उंगली उठाएंगे. लोकतंत्र की नींव ही यही है कि जनता की भावना का सम्मान करें. पहले की तुलना में अब वो नैतिक स्टैंड नहीं लिया जाता है. औरतों के हिम्मत दिखाने पर आप एक्शन की बजाय उन्हीं के ऊपर हमला करना शुरू कर रहे हैं. इस केस की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. आप मंत्री पद पर हैं तो जांच के दौरान ये संकेत जाएगा कि आप ताकतवर हैं. बराबरी की बात फिर कैसे हो पाएगी.''
राजनाथ सिंह ने साढ़े तीन साल पहले जब एनडीए में त्यागपत्र नहीं होने की बात कही थी, तब केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस बयान के फ़ौरन बाद कहा था, 'एक बात जोड़ दूं कि हमारे मंत्री वो करते भी नहीं हैं, जो उनके मंत्री करते थे.'
आज के संदर्भ में देखें तो रविशंकर प्रसाद की बात को ध्यान से समझने की ज़रूरत तो नहीं?
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