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'जिन फ़ौजियों ने साथ काम किया वो अब हिंदू-मुस्लिम पोस्ट डाल रहे हैं'
- Author, ज़मीरुद्दीन शाह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सेना के पूर्व अधिकारी और अलिगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कुलपति के पद पर रह चुके पूर्व लेफ़्टिनेंट जनरल ज़मीरुद्दीन शाह अपनी नई किताब 'द सरकारी मुसलमान' लेकर आ रहे हैं. गुजरात दंगों के वक़्त ज़मीरुद्दीन को दंगाग्रस्त इलाकों में तैनात रहे थे.
ज़मीरुद्दीन शाह ने अपनी किताब में गुजरात दंगों के वक़्त के अनुभव साथ ही सेना में अपने कार्यकाल पर काफी विस्तार से लिखा है, पढ़िए उनके साथ बीबीसी हिंदी की पूरी बातचीतः
लोग समझते हैं कि मैं सरकारी मुसलमान हूं लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं. दरअसल सरकारी मुसलमान दो किस्म के होते हैं. एक तो सरकारी नौकर होते हैं, जिन पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि ये तो सरकार के आदमी हैं और अपनी कौम की खिदमत नहीं करेंगे.
दूसरे वो जिन्होंने अपना ज़मीर बेच दिया है, जिनकी पैदाइश तो मुसलमान थी लेकिन वो इस्लाम के ख़िलाफ़ लिखते हैं.
जब मैं सैकेंड लेफ्टिनेंट था तब मसूरी में मेरी मुलाकात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों से हुई जो घुड़सवारी करते थे. उन्हें मैंने समझाने की कोशिश की सेना में घुड़सवारी की कितनी अहमियत है और इन छात्रों को सेना में कमीशन (अफ़सर बनने) की तैयारी करनी चाहिए.
जब मेरी बात ख़त्म हो गई और मैंने उन छात्रों से पूछा कि कौन-कौन नौजवान सेना में जाना चाहता है तो किसी ने भी हाथ नहीं उठाया.
मैंने उनसे पूछा कि आखिर क्यों? तो जवाब में सभी ने यही कहा कि जनाब आप तो सरकारी मुसलमान हैं. उनका कहने का मतलब था कि मैं तो सरकारी पिट्ठू हूं. मैंने उनकी बात को हंसकर टाल दिया.
गुजरात दंगों का ज़िक्र
27 फरवरी को गोधरा में ट्रेन में आग लगाई गई और जब लाशों को अस्पताल ले जाया गया तो 28 की शाम तक पूरे गुजरात में दंगे भड़क चुके थे.
तब मुझे चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ जनरल पद्मानभन का फोन कॉल आया और उन्होंने पूछा कि क्या आप दंगों के बारे में जानते हो.
उन्होंने मुझे तुरंत सेना की टुकड़ियों के साथ दंगाग्रस्त इलाकों में जाने के लिए कहा. मैं तुरंत तैयार हो गया 28 फरवरी की रात 10 बजे जोधपुर के एयरबेस कमांड पर पहुंचा जहां हवाई जहाज तैयार थे हमें अहमदाबाद ले जाने के लिए.
जब मैं अहमदाबाद पहुंचा तो देखा कि जगह-जगह आग लगी हुई थी. मुझे बताया गया था कि मैं अपने साथ ज्यादा सामान ना लेकर जाऊं, और जरूरत का सब सामान मुझे अहमदाबाद में मुहैया करवा दिया जाएगा.
रात 12 बजे में वहां पहुंचा तो जो अधिकारी मुझे लेने आए थे मैंने उनसे सामान के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि वह तो राज्य सरकार मुहैया करवाएगी.
तब मैंने मुख्य सचिव से बात करवाने की बात की तो उन्होंने बताया कि वे तो विदेश गए हैं उनके स्थान पर कोई महिला काम देख रही थीं लेकिन उनसे भी संपर्क नहीं हो पाया.
तब मैंने सीधा सोचा कि अब मुख्यमंत्री से ही बात करनी होगी. मैं जब मुख्यमंत्री के पास मिलने पहुंचा तो वहां रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस भी मौजूद थे. खैर मैंने वहां बताया कि मुझे क्या-क्या सामान चाहिए और फिर मैं वापिस एयरफ़ील्ड पर लौट आया.
अगली सुबह तक कोई सामान नहीं आया ना ही कोई अधिकारी आए. करीब 10 बजे रक्षा मंत्री आए और उन्होंने सभी जवानों को संबोधित किया और कहा कि बिना किसी भेदभाव के कार्यवाही होनी चाहिए.
उसके बाद अगले दिन हमें कुछ गाड़िया और ज़रूरी सामान मिला फिर हमने अपना काम शुरू किया और जब लोगों को यह मालूम चला कि अब सेना मैदान में आ चुकी है तो अगले 48 घंटों में दंगे भी शांत हो गए.
मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक?
जिन मुसलमानों को आगे बढ़ने की चाहत है और जिनके पास अच्छी शिक्षा है उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. मुझे या मेरे बच्चों को कोई नहीं रोक सका.
हां, कुछ ज़रूर महसूस होता है, ख़ासतौर पर जब गौरक्षक लोगों को मार रहे थे तो मैंने प्रधानमंत्री के नाम खत लिखा था साथ ही सुप्रीम कोर्ट को भी इस पर ध्यान देने के लिए लिखा था.
इसके अलावा सोशल मीडिया पर होने वाली कुछ पोस्ट. जैसे उन फौजियों की पोस्ट जो किसी वक्त हमारे साथ ही थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी हमारे साथ ही गुज़ारी वो अब सांप्रदायिक पोस्ट लिख रहे हैं.
यह सब ख़तरनाक संकेत हैं, इसीलिए मुझे यह चिंता सताने लगी है कि एंटी-मुस्लिम बातें बढ़ने लगी हैं.
पहले और अब के मुसलमानों में फर्क
पहले और अब के मुसलमान युवाओं में बहुत फर्क आया है. जब मैंने सेना में कमीशन प्राप्त किया तब बहुत कम मुस्लिम युवक सेना में आते थे. लेकिन अब बहुत से मुस्लिम युवक सेना की तरफ आकर्षित होते हैं.
मैंने बहुत से युवाओं को इस तरफ़ आने के लिए प्रेरित किया. एएमयू में मैंने छात्रों से सेना में जाने के लिए कहा.
क्या सेना की छवि में फ़र्क़ आया
सेना हमेशा से ही धर्मनिरपेक्ष रही और अपने सेना के करियर के आख़िरी वक्त तक मैंने यह महसूस किया. मुझे कभी यह एहसास नहीं करवाया गया कि मैं किसी दूसरे मजहब से हूं.
मेरे साथ सौकड़ों की तादाद में हिंदू जवान रहते थे, हम मंदिर परेड या मस्जिद परेड करते थे. धर्म हमेशा से ही सेना में सभी के लिए उनका निजी मसला रहा है.
सेना में जाते है हम सभी का मज़हब सिर्फ फ़ौज हो जाता है, घर में यह अलग बात है.
मैं पूरे भरोसे के साथ बोल सकता हूं कि कभी भी मेरे बारे में यह नहीं कहा गया कि मेरी मौजूदगी किसी के लिए परेशानी पैदा करने वाली बनी.
सैन्य अधिकारी या वीसी क्या मुश्किल?
निश्चित तौर पर एएमयू का वाइस चांसलर बनना ज़्यादा मुश्किल काम था. सेना में तो हमें आदेश देना होता था और हमारे साथ जो जवान होते वो उसे पूरा करते थे.
सेना में एक अनुशासन होता है. जिसकी तामील सभी करते हैं.
जबकि किसी भी यूनिवर्सिटी में सबसे बड़ी कमी वहां अनुशासन की कमी है. यही वजह है कि देश की कोई भी यूनिवर्सिटी दुनिया की टॉप 200 यूनिवर्सिटी में शामिल नहीं है.
मुसलमानों के ख़िलाफ़ हमले
मुसलमानों पर ताज़ा हमलों को रोका जा सकता था अगर कड़ी कार्रवाई की जाती. लेकिन अफ़सोस की ऐसा नहीं किया गया.
इसके उलट जो लोग हमले करते हैं उन्हें हार पहनाए जाते हैं उनका सम्मान किया जाता है. जो भी आदमी वो किसी भी धर्म का हो अगर वो साप्रदायिक हरकतें करता है तो उसके ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाने चाहिए.
परिवार और भाई नसीर
इस किताब के ज़रिए मैंने अपनी ज़िंदगी की तमाम मुश्किलें और जो मज़े किए उनका जिक्र किया है. पिछले साल मई में इसे लिखना शुरू किया.
इसमें मैंने अपने परिवार का जिक्र किया है जो 19वीं सदी में अफ़गानिस्तान से हिंदुस्तान आया था. गदर के वक्त हमने अंग्रेजों का साथ दिया था. इसकी वजह भी समझायी है.
मेरे बड़े भाई पढ़ाई बहुत होशियार थे तो वे आईआईटी में चले गए जबकि मैं ज़्यादा नहीं पढ़ना चाहता तो सेना में चला गया हालांकि वहां भी खूब पढ़ना पड़ा.
छोटा भाई नसीर (अभिनेता नसीरुद्दान शाह) भी पढ़ाई में अच्छा नहीं था. एक बार उसने हमें बताया कि वो एक्टर बनना चाहते हैं तो हमें बड़ी हंसी आई.
वो मेरठ में पढ़ाई करता था एक दिन पता लगा कि वो मेरठ में जहां पढ़ने के लिए गया था वहां से ग़ायब हो गया है.
जब मैं वहां देखने गया तो पता चला कि वो अपना सारा सामान बेचकर मुंबई चला गया है. फिर हमने दिलीप कुमार साहब के ज़रिए पता लगाया तो मालूम चला कि नसीर मुंबई में जहां शूटिंग होती है वहां कुली का काम (स्पॉट बॉय) कर रहा है.
( बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा से बातचीत पर आधारित )
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