You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
#70yearsofpartition: विभाजन में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कैसे बची?
- Author, मिर्ज़ा ए.बी बेग
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली
जब भारत आज़ाद हुआ तो मैं 16 साल का था और मेरी सारी स्कूली शिक्षा ब्रिटिश राज में हुई थी.
जब कांग्रेस सन 1937 से 1939 के बीच आई तो हमारा पाठ्यक्रम बदल गया और शिक्षा राष्ट्रवादी हो गई. अलीगढ़ में सन 1941 के बाद से मुस्लिम लीग का ज़ोर बढ़ गया लेकिन हमारे पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं आया और हमारी शिक्षा राष्ट्रीय विचारधारा पर ही आधारित रही.
इस पर मुस्लिम लीग ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया. वे सांप्रदायिक ज़रूर थे, लेकिन उनका कोई सैद्धांतिक व्यवहार नहीं था कि सब कुछ इस्लामी सिद्धांतों से प्रेरित हो. ऐसा कुछ नहीं था.
'सोचा नहीं था कि वाकई पाकिस्तान बन जाएगा'
यह सही है कि मुसलमानों की एक बड़ी संख्या ने 1946 के चुनाव में 'पाकिस्तान' के नारे पर मुस्लिम लीग को वोट दिया था लेकिन कम से कम अलीगढ़ विश्वविद्यालय में तो किसी ने यह नहीं सोचा था कि पाकिस्तान बन जाएगा और एक दूसरा देश अस्तित्व में आ जाएगा.
सब यह समझते थे कि यह एक बारगेनिंग काउंटर है जिसके तहत मुसलमानों को विशेष रियायतें मिलेंगी- शायद यूपी (उत्तर प्रदेश) में ज़मींदारी ख़त्म न हो, सिविल सेवाओं में आरक्षण में विस्तार हो जाए या मुसलमान यह शर्त रखेंगे कि आधे मंत्री उनके हों. यह सब सपना था.
वे कहते हैं कि जब माउंटबेटन अवॉर्ड (अंग्रेज़ी हुकूमत का भारत और पाकिस्तान को आज़ाद करने का फ़ैसला) आया तो अलीगढ़ में उस समय छुट्टियां चल रही थीं और शिक्षक और कर्मचारी जो लीग समर्थक थे उनमें बहुत परेशानी थी.
कुछ लोग तो रो भी रहे थे क्योंकि किसी को यह विचार नहीं था कि पाकिस्तान बन जाएगा और एक अलग देश अस्तित्व में आ जाएगा.
यहाँ के कुलपति ज़ाहिद हुसैन ख़ुद पाकिस्तान चले गए और कई अन्य लोग भी बाद में चले गए, लेकिन विश्वविद्यालय क़ायम रहा और एडमिशन बिल्कुल वक़्त पर हुए, कलासेज़ बराबर जारी रहीं. अगर कोई शिक्षक चला जाता था तो दूसरा मौजूद रहता था.
अलीगढ़ के क़ायम रहने की बड़ी वजह सरकार की ओर से यह आश्वासन था कि विश्वविद्यालय जैसे चलता था वैसे ही चलता रहेगा और उसकी सहायता की जाएगी.
यह कहना होगा कि इसी आश्वासन के कारण विश्वविद्यालय स्थापित रहा.
'दोनों ओर हुआ था नरसंहार'
आप जानते हैं कि सुरक्षा के लिए विशेष सैन्य दल भेजा गया था क्योंकि यमुना तक तो दंगे आ चुके थे और मुसलमानों का नरसंहार हो रहा था और उधर पाकिस्तान की ओर हिंदू, सिखों का हो रहा था.
सेना की कुमाऊं रेजमेन्ट भेजी गई थी उनका काम बहुत अच्छा रहा और उन्होंने ज़िले में कम से कम कोई दंगा नहीं होने दिया.
स्वतंत्रता के बाद पहली राज्यपाल सरोजिनी नायडू भी एएमयू में आई थीं.
उन्होंने वहाँ भाषण दिया था जिसमें मैं भी मौजूद था क्योंकि मैं उस समय प्रथम वर्ष (बीए) के छात्र था. उन्होंने भी बहुत आश्वासन दिया लेकिन अफ़सोस कि उनका जल्द ही निधन हो गया.
विभाजन के बाद यहां बहुत से शरणार्थी छात्र भी आए. वर्ष 50-1949 का ज़माना था जब यहाँ एक तिहाई छात्र शरणार्थी (यानी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थी) थे.
सभी छात्रावासों में रहते थे. पहले उनके लिए अलग छात्रावास थे फिर सबको एक दूसरे में शामिल कर लिया गया.
सन 1952 में एक अधिनियम आया जिसके तहत सरकार ने विश्वविद्यालय को अपने नियंत्रण में ले लिया.
पहले तो यह प्राइवेट विश्वविद्यालय था और दिवालिया हो रहा था. यही हाल बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का था.
जो लोग 1952 में आए अधिनियम की बुराई करते हैं उन्हें जानना चाहिए कि इसी कारण दोनों विश्वविद्यालय बच गए क्योंकि सरकार ने सभी ख़र्च अपने ज़िम्मे ले लिए थे.
(इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब ने भारत-पाकिस्तान विभाजन को नज़़दीक से देखा था. ये लेख उनसे बातचीत पर आधारित है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)