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गुजरात: डर के साये में कैसे जी रहे हैं प्रवासी मज़दूर
- Author, रॉक्सी गागदेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गुजराती सेवा
गरीबी की मार के चलते 20 साल के सुमित कठेरिया ने पढ़ाई छोड़ दी थी और काम की तलाश में उत्तर प्रदेश के अपने गांव से बाहर चले गए.
कानपुर में बालपुर गांव के रहने वाले सुमित कठेरिया गुजरात के गांधीनगर आए और वहां एक बेकरी में काम करने लगे.
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह-राज्य में प्रवासियों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा की चपेट में वो भी आए.
कुछ लोगों ने उन्हें मारा-पीटा और धमकी दी कि अगर उन्होंने 24 घंटे के अंदर गुजरात नहीं छोड़ा तो बुरे परिणाम भुगतने होंगे. इसके बाद कठेरिया दाहेगाम स्थित अपने किराए के मकान से भाग गए.
उनके मालिक ने अभी उन्हें उनके काम का पूरा पैसा नहीं दिया है, इसलिए अभी तक उन्होंने अपने गांव की टिकट नहीं कराई है.
सुमित कठेरिया ने बीबीसी से कहा, "यहां मैं असुरक्षित महसूस कर रहा हूं, इसलिए मैं जल्द से जल्द यहां से चला जाना चाहता हूं."
पिछले कुछ दिनों में गुजरात में रहने वाले कई प्रवासियों पर हमले हुए हैं. ये हमले बलात्कार की एक घटना के बाद से शुरू हुए हैं.
दरअसल 28 सिंतबर 2018 को पुलिस ने बिहार से आए एक मज़दूर को 14 महीने की बच्ची के बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया था. इसके बाद गुस्साई भीड़ ने राज्य के कई हिस्सों में प्रवासी मज़दूरों पर हमले किए.
इसी तरह की एक भीड़ ने 6 अक्टूबर को कठेरिया के घर पर हमला कर दिया था. बीबीसी से बातचीत में कठेरिया ने बताया, "पहले उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम कहां के रहने वाले हो. मैंने कहा कि मैं उत्तर प्रदेश का हूं. इसके बाद उन्होंने मुझे और मेरे साथ के लोगों को पीटना शुरू कर दिया. उन्होंने हमें 24 घंटे के भीतर जगह छोड़ देने की धमकी दी और वहां से चले गए."
सुमित की मां को जब उन पर हुए हमले के बारे में पता चला तो उन्होंने अपने बेटे को जल्द से जल्द घर लौट आने के लिए कहा.
सुमित बताते हैं, "मेरे पास वापस जाने के भी पैसे नहीं हैं, इसलिए मैं मजबूरी में यहां रह रहा हूं."
'अकेले कमाने वाले'
गुजरात में रहकर सुमित महीने में साढ़े सात हज़ार रुपए तक कमा लिया करते थे, जिसमें से 6 हज़ार वो अपने गांव (अपने परिवार के पास) भेज दिया करते थे.
सुमित अपने घर में अकेले कमाने वाले हैं. घर चलाने के साथ-साथ वो अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ा भी रहे हैं.
सुमित गुजरात में रहकर काम करना चाहते थे, लेकिन मौजूदा माहौल के बाद वो अब अपने घर लौट जाना चाहते हैं. उनके परिवार को उनकी सुरक्षा की चिंता सता रही है.
सुमित सेना में भर्ती होना चाहते थे. लेकिन माली हालत के चलते वो अपने सपने पूरे ना कर सके. वो कहते हैं, "घर की हालत को देखते हुए मैंने पढ़ाई छोड़कर फैक्ट्रियों में काम करने का फैसला किया."
गुजरात की फैक्ट्रियों में काम करने वाले सुमित जैसे कई लोग हैं. लेकिन वहां हिंदी बोलने वाले राज्यों के प्रवासियों पर हुए हालिया हमलों के बाद वो गुजरात छोड़कर चले जाना चाहते हैं.
हाल के दिनों में जिन लोगों पर हमले हुए वो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान से आए थे.
हिंसा शुरू होने की वजह
कथित तौर पर 14 महीने की एक बच्ची के बलात्कार का आरोप बिहार के एक 19 वर्षीय लड़के पर लगा था.
अभियुक्त व्यक्ति साबरकांठा के हिम्मतनगर टाउन ज़िले की एक सिरेमिक इकाई में काम करता था. घटना 28 सितंबर 2018 की है. पुलिस ने अभियुक्त को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया था.
मामला तब चर्चा में आया, जब कांग्रेस विधायक और ओबीसी-एससी-एसटी एकता मंच और ठाकोर सेना के अध्यक्ष अल्पेश ठाकोर ने एक फेसबुक लाइव किया.
29 सिंतबर को ठाकोर के आधिकारिक फेसबुक पेज पर पोस्ट की गई वीडियो में उन्होंने फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासियों को रेप की घटनाओं का ज़िम्मेदार बताया.
इसमें उन्होंने बलात्कार के अभियुक्त के लिए 'प्रवासी युवक' शब्द का इस्तेमाल किया था.
फ़ेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में कई गिरफ्तार
सत्ताधारी बीजेपी ने कांग्रेस पार्टी, खासकर अल्पेश ठाकोर पर हिंसा और नफरत भड़काने का आरोप लगाया है. कांग्रेस और ठाकोर ने इन आरोपों से इनकार किया है और बीजेपी सरकार से दोषियों पर कार्रवाई करने को कहा है.
हालांकि हिंसा भड़कने के बाद ठाकोर ने कई फेसबुक लाइव कर अपने समर्थकों से शांत रहने और हमले ना करने की अपील की थी.
हिंसा की घटनाएं उत्तर गुजरात के साबरकांठा और मेहसाणा, अहमदाबाद के शहरी और ग्रामीण इलाकों के अलावा गांधीनगर में सामने आईं.
घटनाओं के बाद डीजीपी शिवानंद झा ने पत्रकारों से कहा कि ऐसे अपराधों के ख़िलाफ़ 'ज़ीरो टॉलरेंस' है. वहीं गुजरात के गृहमंत्री ने बताया कि पूरे राज्य में 57 शिकायतें दर्ज हुई हैं और करीब 400 लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की साइबरक्राइम सेल ने वॉट्सएप और फेसबुक के ज़रिए फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में 35 लोगों को गिरफ्तार किया है.
अहमदाबाद के कलेक्टर विक्रांत पांडे ने बीबीसी से कहा, "जांच में पाया गया है कि इन मैसेज की वजह से ही डर का माहौल बना. इसलिए साइबर क्राइम ने पूरे प्रदेश से 35 लोगों को गिरफ्तार किया है. ये लोग अपने फेसबुक अकाउंट से ग़लत जानकारी फैला रहे थे, जिसकी वजह से हिंसा भड़की."
इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर जेएस गेदाम ने बीबीसी से कहा, "उन लोगों ने नफरत फैलाने वाली सामग्री पोस्ट की, जिनमें तस्वीरें और मैसेज थे. प्रशासन को उम्मीद है कि इस कार्रवाई के बाद अफवाहें कम फैलेंगी."
ग़रीब प्रवासी
हिंसा से बचकर भागे उत्तर प्रदेश के करीब 60 युवा अहमदाबाद ज़िले के एक इलाके में मौजूद राहत शिविर में रह रहे हैं.
इनमें से कई लोग उत्तर प्रदेश के कानपुर ज़िले के रहने वाले हैं और कई सालों से गुजरात में काम कर रहे थे.
उन पर 6 अक्टूबर को लोगों के एक समूह ने हमला कर दिया था. उन्हें थप्पड़ मारे गए और राज्य छोड़कर जाने के लिए धमकाया गया.
19 साल के अंशु कुमार कानपुर से हैं. आठवीं के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी और पास के खेत में काम करने लगे.
अंशु बताते हैं, "गांव में ज़्यादा कमाई नहीं हो पाती थी. वहां खेती के लिए पानी नहीं है और गुजरात में जैसी नौकरियां भी हैं वो भी नहीं है. मैं दिन में 12 घंटे काम करता था."
बीबीसी ने राहत शिविर में रह रहे 40 लोगों से बात की. उनमें से कई लोग आज तक अहमदाबाद के प्रमुख बाज़ार तक नहीं गए हैं. ना ही उन्होंने सिनेमा हॉल में जाकर कोई फ़िल्म ही देखी है.
कानपुर के ही राहुल कुमार कहते हैं, "हम काम करने के बाद घर चले जाते हैं, खाना बनाते हैं, खाते हैं और फिर सो जाते हैं. अगली सुबह उठकर हम दोबारा काम पर निकल जाते हैं. यही हमारी दिनचर्या है."
50 साल के भोला तिवारी गुजरात आकर बसे अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी से हैं. उनके दादा 70 साल पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर से आकर गुजरात में बस गए थे.
उन्होंने कहा, "गुजरात में बहुत-से प्रवासी मज़दूर काम करते हैं. ये यहां की कंपनियों की रीढ़ की हड्डी हैं और प्रदेश की तरक्की में इनका बड़ा हाथ है."
वो कहते हैं कि प्रवासी मज़दूरों के चले जाने से गुजरात के कुछ इलाकों में अर्थव्यवस्था को धक्का लगा है.
एक मोबाइल शॉप चलाने वाले हरिश राजपुरोहित ने बीबीसी से कहा, "मेरे 10 में से आठ ग्राहक प्रवासी थे. लेकिन अब उनमें से सिर्फ तीन लोग ही आते हैं."
उन्होंने कहा, "लोग डर के मारे अपने गांव चले गए हैं."
प्रवासियों का पलायन
गुजरात में प्रवासियों के लिए काम करने वाली संस्था - उत्तर भारतीय विकास संगठन के मुताबिक़ अब तक करीब 80 लाख प्रवासी गुजरात छोड़कर जा चुके हैं.
संस्था के अध्यक्ष श्याम ठाकुर कहते हैं, "साबरकांठा में हिंसा की पहली घटना के बाद से ही पलायन शुरू हो गया था. लोग ट्रेनें और बसें भर-भर के अपने घरों की ओर जा रहे थे."
ठाकुर कहते हैं कि उन्होंने 56 यात्रियों का क्षमता वाली एक बस में 150 लोगों को जाते हुए देखा है.
अहमदाबाद के कलेक्टर विक्रांत पांडे मंगलवार को रेलवे स्टेशन पहुंचे. वो ये सुनिश्चित करना चाहते थे कि कोई भी प्रवासी डरकर प्रदेश ना छोड़े.
कलेक्टर ने दावा किया, "ज़्यादातर लोग छठ मनाने के लिए जा रहे हैं. बहुत कम लोग हैं जो डर की वजह से जा रहे हैं. हमने उन लोगों से बात की और उन्हें सुरक्षा देने का भरोसा दिलाया."
पांडे ने बताया कि "सरकार प्रवासी मज़दूरों के लिए किसी तरह की पंजिकरण की प्रक्रिया का पालन नहीं करती है, लेकिन अब हम प्रवासियों का डेटा ज़रूर तैयार करेंगे."
उनका कहना है कि सरकार स्थानीय नेताओं, पुलिस और औद्यौगिक इकाईयों की मदद से उन लोगों से बात करने की कोशिश कर रही है.
उत्तर भारतीय विकास संगठन के श्याम ठाकुर ने भी कहा कि वो टीमें बनाकर प्रवासियों के पास जाएंगे और उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश करेंगे.
क्या सब सामान्य हो पाएगा?
इधर गुजरात चेंबर ऑफ कॉमर्स प्रवासी मज़दूरों के पलायन को रोकने के लिए राज्य सरकार से चर्चा कर रही है. उनके मुताबिक़ राज्य में काम करने वाले 30 प्रतिशत मज़दूर हिंदी भाषी राज्यों से हैं.
गुजरात चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ने जयमिन वासा बीबीसी से कहा, "स्थानीय नेताओं, पुलिस और सरकार की मदद से बहुत से लोगों को विश्वास में लिया गया है. अब ये लोग गुजरात छोड़कर नहीं जा रहे."
उन्होंने बताया "मज़दूरों के पलायन से उत्तरी इलाकों के उद्योगों पर असर पड़ा है. हालांकि अब तक कोई भी इकाई बंद करने की नौबत नहीं आई है."
मध्यप्रदेश की इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अनंत सुगंदे ने गुजरात के प्रवासियों पर एक अध्ययन किया है.
बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत के दौरान उन्होंने बताया, "मुंबई में जब प्रवासी मज़दूरों पर हमले शुरू हुए थे तो ये मज़दूर महाराष्ट्र से गुजरात आ गए. 2008 के बाद गुजरात में इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ी."
सुगंदे ने एक अध्ययन में पाया था कि प्रवासियों की कम से कम 38.93 प्रतिशत आबादी अकेले सूरत में रहती है. इसके बाद 18.29 प्रतिशत आबादी अहमदाबाद में बसती है.
वो कहते हैं, "लोग गुजरात को महाराष्ट्र से ज़्यादा सुरक्षित मानते थे. इसलिए वो यहां आ गए थे."
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