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क्या गुजरात के लिए बोझ हैं यूपी-बिहार के लोग
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
28 सिंतबर को गुजरात के साबरकांठा ज़िले में 14 साल की एक लड़की के साथ रेप हुआ था. इसमें रघुवीर साहू नाम के एक बिहारी मज़दूर को अभियुक्त बनाया गया है.
पुलिस ने साहू को गिरफ़्तार भी कर लिया है. इस घटना के बाद उत्तरी गुजरात में हिन्दी भाषियों पर हमले शुरू हो गए. हमले के तत्काल बाद कांग्रेस और बीजेपी में राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई.
बीजेपी नेताओं ने अल्पेश ठाकोर पर आरोप लगाया कि उन्होंने ठाकोर सेना से ऐसा करवाया है. बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कांग्रेस पर सीधा आरोप लगाया और कहा कि उनकी सरकार ने ऐसे हमलों को सख़्ती से रोका है.
क्या रेप के वाक़ये के कारण यह हमला अचानक से शुरू हो गया या फिर इसका कोई राजनीतिक मक़सद है? अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार आरके मिश्रा कहते हैं कि गुजरात में रेप का यह कोई पहला वाक़या नहीं है.
वो कहते हैं, ''रविवार को ही अहमदाबाद में 12 साल की एक लड़की के साथ रेप हुआ, लेकिन इसमें तो कोई ऐसा ध्रुवीकरण नहीं हुआ.''
क्या ये हमले राजनीतिक फ़ायदे के लिए कराए जा रहे हैं? आरके मिश्रा कहते हैं, ''बीजेपी ने तत्काल कहा कि इसमें अल्पेश ठाकोर की भूमिका है. अल्पेश ठाकोर पर ऐसे आरोप से लोगों के बीच शक इसलिए बढ़ सकता है क्योंकि रेप पीड़िता ठाकोर जाति से ही है. अल्पेश ठाकोर को कांग्रेस ने बिहार में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाकर भेजा है. बीजेपी का अल्पेश ठाकोर पर हमला पूरी तरह से राजनीतिक है. पूरे गुजरात में बिहार के नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और राजस्थान के सबसे ज़्यादा मज़दूर हैं. दोनों राज्यों में चुनाव है और कहा जा रहा है कि बीजेपी की हालत ठीक नहीं है.''
मिश्रा कहते हैं, ''ऐसे में बीजेपी एक संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस ने हिन्दी भाषियों पर हमले कराए और हमारी सरकार ने सुरक्षा दी. मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक हिन्दी भाषियों पर इस तरह के हमले नहीं हुए. लेकिन राजनीति में वक़्त के हिसाब से ध्रुवीकरण के तरीक़े बदलते हैं और आजमाए तरीक़े अप्रासंगिक होते हैं. मोदी के दौर में हिन्दू-मुस्लिम का ध्रुवीकरण था. अब ये तरीक़े पुराने पड़ गए हैं, इसलिए क्षेत्रवाद एक नया मुद्दा प्रयोग के तौर पर हो सकता है.''
कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी की सरकार है और क़ानून व्यवस्था उसके हाथ में है. कांग्रेस प्रवक्ता मनीष दोशी ने कहा है कि जो भी इसमें गुनाहगार हैं, सरकार कार्रवाई कर न कि राजनीतिक बयानबाजी करे.
क्या वाक़ई हिन्दी भाषियों और गुजरातियों में समस्या है? क्या गुजराती हिन्दी भाषियों के आने और नौकरी करने से ख़ुद को असुरक्षित समझ रहे हैं?
गुजराती भाषा के जाने-माने साहित्यकार भरत मेहता कहते हैं, ''यह हमला मेहषाणा के आसपास हुआ है. यह तात्कालिक प्रतिक्रिया हो सकती है. मैं वड़ोदरा में रहता हूं और इस शहर में ग़ैर-गुजराती भरे हुए हैं. यहां ऐसा कोई वाक़या नहीं हुआ. गुजरात में केवल हिन्दी भाषी ही बड़ी संख्या में नहीं हैं बल्कि ओड़िया बोलने वाले भी बड़ी संख्या में हैं. इन पर कभी इस तरह के हमले नहीं हुए हैं.''
मेहता कहते हैं, ''गुजरात में भारत के दूसरे राज्यों के कामगारों के ख़िलाफ़ नफ़रत जैसी कोई बात नहीं रही है. यह पहली बार ऐसा हुआ है. गुजरात के लिए हिन्दी कोई ग़ैरों की भाषा नहीं है. यहां घर-घर में हिन्दी न्यूज चैनल देखा जाता है. लोग शौक से हिन्दी बोलते हैं. मुंबई में हिन्दी और हिन्दी भाषियों को लेकर जो भावना है वो गुजरात में नहीं है. एक दिक़्क़त ये है कि यहां गुजरातियों को काम नहीं मिल रहा है. लेकिन दिक़्क़त ये है कि जितने कम पैसे और मुश्किल हालात में प्रवासी मज़दूर काम कर रहे हैं, वो गुजरातियों के वश की बात नहीं है.''
पिछले महीने ही गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा था कि एक ऐसा क़ानून लाया जाएगा जिससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रदेश की इंडस्ट्री में 80 फ़ीसदी नौकरी केवल गुजरातियों को ही मिले.
क्या सरकार ऐसी घोषणा कर यह जताने की कोशिश कर रही है कि गुजरात की नौकरियों पर दूसरे राज्यों के लोग कब्ज़ा कर रहे हैं?
सूरत में सेंटर फोर सोशल स्टडीज के निदेशक प्रोफ़ेसर किरण देसाई कहते हैं, ''सरकार कोई न कोई ऐसा भड़काऊ मुद्दा खड़ा करने की कोशिश करती है, जिससे उसकी नाकामियां छुपाई जा सकें. सबसे ज़्यादा प्रवासी सूरत में हैं. ज़्यादातर प्रवासी मजदूर यूपी-बिहार के हैं. यहां की इंडस्ट्री में ग़ैर-गुजराती भरे पड़े हैं. इसके बावजूद यहां पर कोई हमला नहीं हुआ है. जहां पर ये हुआ भी है वहां किसी किस्म का सांस्कृतिक टकराव नहीं है. यह मामला राजनीतिक है. बेरोज़गारी का मुद्दा बनाकर हमला किया जा रहा है. लोगों में बाहरी राज्यों को लेकर असुरक्षा की भावना कोई सहज और स्वाभाविक नहीं है. इसे जानबूझकर बढ़ाया जा रहा है. मुख्यमंत्री के बयान को कोई इससे अलग करके कैसे देख सकता है.''
देसाई कहते हैं कि बेरोज़गारों को इस तर्क पर उकसाना बहुत आसान होता है कि तुम्हारा हक़ कोई और मार रहा है.
उन्होंने कहा, ''यूपी-बिहार के लोग जितने कम पैसे और सुविधा पर काम करते हैं वो गुजराती कभी नहीं कर पाएंगे. शोषण के जिन हालात को सहते हुए प्रवासी मज़दूर काम करते हैं वो डराने वाला होता है. इसलिए ये काम गुजराती मजदूर नहीं करते हैं. मैं इस तरह के हमलों को राजनीति अवसाद से भी जोड़कर देखता हूं. पाटीदारों का आंदोलन भी बेरोज़गारी के कारण अवसाद का ही नतीजा है.''
देसाई कहते हैं कि हिन्दी भाषियों और गुजरातियों के बीच किसी किस्म का कोई सांस्कृतिक टकराव नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार आरके मिश्रा का मानना है कि बिना प्रवासी मजदूरों के गुजरात की इंडस्ट्री चलाना आसान नहीं है.
इस बात को किरण देसाई भी मानते हैं और कहते हैं कि गुजरात में 2002 में दंगा हुआ तो सूरत हिंसा की आग से बाहर रहा था. उनका कहना है इस तरह क्षेत्रवाद फैला तो गुजरात की इंडस्ट्री चौपट हो जाएगी.
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