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ओबीसी के बंटवारे की महत्वाकांक्षी योजना का क्या हुआ?
- Author, दिलीप मंडल
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
ओबीसी की केंद्रीय लिस्ट को बांटने के मकसद से गठित रोहिणी कमीशन ने ठीक एक साल पहले यानी 11 अक्टूबर, 2017 को अपना काम शुरू किया था.
सरकार ने आयोग के गठन के दिन कहा था कि "आयोग की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद केंद्र सरकार ओबीसी के सभी वर्गों को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के लाभ के समान वितरण के लिए प्रकिया शुरू करेगी."
इस आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए इसका गठन संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत किया गया. इसी अनुच्छेद के तहत गठित मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू है.
इस कमीशन को 12 हफ्ते में अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी. अब ठीक 12 महीने बाद स्थिति यह है कि आयोग ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट भी सरकार को नहीं सौंपी है. लगता नहीं है कि सरकार इस रिपोर्ट को लेकर जल्दबाजी में है क्योंकि इस आयोग को तीन बार कार्यकाल विस्तार दिया जा चुका है.
अब आयोग के पास रिपोर्ट देने के 20 नवंबर तक का समय है. लेकिन यह बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती कि सरकार इस आयोग को एक और विस्तार नहीं देगी. सवाल उठता है कि जिस आयोग को लेकर सरकार और बीजेपी एक साल पहले इतने जोश में थी, उसे लेकर उसके कदम ठिठक क्यों रहे हैं.
23 अगस्त 2017 को केंद्रीय कैबिनेट की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में ये फ़ैसला किया गया था कि ओबीसी की केंद्रीय सूची का बंटवारा किया जाएगा. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी घोषणा की थी. उन्होंने कहा कि अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से वर्गीकरण की पहल की जा रही है.
लेकिन इसके बाद से ही सरकार स्लो मोशन में चली गई. 23 अगस्त के कैबिनेट के फ़ैसले पर अगर सरकार गंभीर होती तो अयोग का गठन तत्काल कर दिया जाता क्योंकि आयोग के गठन से लेकर उसकी रिपोर्ट आने और उस बारे में कानून का मसौदा बनाकर उसे संसद में पारित करने और नोटिफिकेशन लाने के लिए काफ़ी समय की जरूरत पड़ने वाली थी.
सरकार ने आखिरकार 02 अक्टूबर, 2017 को इस आयोग के गठन की घोषणा की. आयोग की अध्यक्षता का जिम्मा रिटायर्ड जस्टिस जी रोहिणी को सौंपा गया.
गांधी जयंती के दिन इस आयोग के गठन के महत्व के बारे में सरकार ने कहा कि "महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर लिया गया यह निर्णय गांधी जी की शिक्षा के अनुरूप सरकार के सभी को सामाजिक न्याय दिलाने के लक्ष्य को प्राप्त करने और विशेष तौर पर अन्य पिछड़े वर्ग के सदस्यो सहित सभी को सम्मिलित करने के प्रयास को दर्शाता है. अन्य पिछड़े वर्गो का उप-वर्गीकरण अन्य पिछड़े वर्ग समुदाय में अधिक पिछड़े लोगों को शैक्षणिक संस्थानो और सरकारी नौकरियो में आरक्षण का लाभ सुनिश्चित करेगा."
आयोग को निम्नलिखित कार्यभार सौंपे गए
- केंद्रीय सूची में शामिल ओबीसी जातियो को मिले आरक्षण के लाभ के असमान वितरण की समीक्षा करना
- ओबीसी के उप-वर्गीकरण यानी बंटवारे के लिए प्रक्रिया, मानदंड और मानक तय करना और
- ओबीसी की केंद्रीय सूची में संबंधित जातियो की पहचान कर उन्हें उप-श्रेणियो में डालना
दरअसल, पिछड़ी जातियों का बंटवारा कोई नई बात नहीं है. नौ राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पुदुचेरी, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में पिछड़ी जातियों को दो या अधिक कैटेगरी में बांटकर ही रिजर्वेशन दिया जाता है.
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इंदिरा साहनी केस में यह कहा था कि पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों में विभाजन पर कोई संवैधानिक या कानूनी रोक नहीं है. यह न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल भी है कि समाज के तमाम समूहों की राजकाज और राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए. आरक्षण का वैचारिक आधार भी यही है.
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रिपोर्ट में फिर देरी क्यों
फिर रोहिणी कमीशन अपनी रिपोर्ट दे क्यों नहीं पा रहा है? इसका कार्यकाल बढ़ाते समय हर बार ये सफाई दी जाती है कि आंकड़े बहुत ज्यादा हैं और विश्लेषण में समय लग रहा है. दरअसल आयोग ने 197 सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों से पिछले तीन वर्षों के ओबीसी एडमिशन के आंकड़े मांगे हैं.
लेकिन शिक्षा संस्थान अलग-अलग ओबीसी जातियों के आंकड़े नहीं रखता. इसी तरह आयोग ने सरकारी विभागों, सरकारी बैंकों, वित्तीय संस्थानों और पीएसयू से भी आंकड़े मांगे हैं. अलग-अलग जातियों के आंकड़े इनमें से किसी भी जगह नहीं होते.
अलग-अलग जातियों के आंकड़ों के बिना किसी जाति को आगे बढ़ा हुआ और किसी को पीछे छूट गया बताना संभव नहीं है. रोहिणी आयोग के पास तो इस बात के भी आंकड़े नहीं हैं कि देश में विभिन्न जातियों की संख्या कितनी है. ऐसे में वो कैसे बताएगा कि किस जाति को अपनी आबादी के अनुपात में ज्यादा या कम प्रतिनिधित्व मिला है?
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सरकार ने रोहिणी आयोग को एक काम तो सौंप दिया, और उसकी समय सीमा भी तय कर दी, लेकिन काम को पूरा करने के उपकरण उसे नहीं दिए. पांच सदस्यीय रोहिणी कमीशन के पास इतना स्टाफ और इतने संसाधन नहीं हैं कि ओबीसी के बारे में खुद देशभर से सारे आंकड़े जुटा ले.
सरकार के पास एक रास्ता यह था कि 2011 से 2016 के बीच हुई सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) से जातियों और उनकी स्थिति के आंकड़े निकालकर रोहिणी कमीशन को दे देती. लेकिन इसमें एक समस्या यह है कि ये आंकड़े अधूरे और अस्त-व्यस्त है और इसी कारण से सरकार उन्हें जारी भी नहीं कर रही है, जबकि इन आंकड़ों को जुटाने पर 4,893 करोड़ रुपए खर्च भी हो चुके हैं.
इतने भारी खर्च के बावजूद जाति जनगणना का एक भी आंकड़ा सामने नहीं आया है. इसलिए ये आंकड़ा भी रोहिणी कमीशन के काम का नहीं है.
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सत्ताधारी पार्टी की चिंता
कुल मिलाकर, रोहिणी कमीशन एक असंभव काम करने निकला है. उसे अपुष्ट आंकड़ों के आधार पर एक रिपोर्ट देनी है, जिससे देश की 52 फीसदी आबादी की जिंदगी पर फर्क पड़ने वाला है.
मंडल कमीशन ने 1931 की जनगणना के आधार पर ओबीसी की यही संख्या बताई थी. जनगणना में जाति के नए आंकड़े उसके पास भी नहीं थे. मंडल कमीशन ने नए आंकड़े नहीं होने पर अफसोस जताया था. रोहिणी कमीशन भी बार-बार आंकड़े मांग रहा है.
जहां तक रोहिणी आयोग को लेकर राजनीति की बात है तो बीजेपी का शुरुआती गणित ये था कि अति पिछड़ी जातियां इससे खुश होंगी. लेकिन बीजेपी अब उतनी उत्साहित दिख नहीं रही है.
मुमकिन है कि बीजेपी को यह आशंका सता रही हो कि अपेक्षाकृत प्रभावशाली पिछड़ी जातियां इस बंटवारे से नाराज हो जाएंगी. हालांकि उचित यही होगा कि सरकार राजनीति लाभ और हानि से ऊपर उठकर न्याय का रास्ता अपनाए और रोहिणी कमीशन को जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहे.
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