You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
प्रमोशन में आरक्षण: क्या बदला और क्या नहीं
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अब केंद्र और राज्य सरकारों में नौकरी कर रहे अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) के नागरिकों के लिए प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता साफ़ हो गया है.
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में कहा कि सरकारी नौकरियों में अवसर में बराबरी देने वाले प्रावधानों के अनुसार प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जा सकता है.
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की इस अर्ज़ी को भी ठुकरा दिया कि नौकरियों में प्रमोशन के कोटे के लिए एससी-एसटी की कुल आबादी को ध्यान में रखा जाए.
अदालत ने कहा कि प्रदेश सरकारों को एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन देने के लिए अब पिछड़ेपन का डेटा जुटाने की ज़रूरत नहीं है.
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन, जस्टिस संजय कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा वाली पांच जजों की संविधान पीठ को यह तय करना था कि अदालत को 2006 के 'एम नागराज बनाम भारत सरकार' मामले में तत्कालीन संविधान पीठ द्वारा 'प्रमोशन में आरक्षण' पर दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है.
क्या है 2006 का यह एम नागराज मामला और इसका आज के 'प्रमोशन में आरक्षण' से जुड़े फ़ैसले से क्या संबंध है?
12 साल पहले क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने
दरसल 2006 में 'एम नागराज बनाम भारत सरकार' मामले की सुनवाई करते हुए पांच जजों की ही संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के मामले में एससी-एसटी वर्गों को संविधान के अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4 ख) के अंतर्गत आरक्षण दिया जा सकता है. पर आरक्षण के इस प्रावधान में कुछ शर्तें जोड़ते हुए अदालत ने यह भी कहा कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए किसी भी सरकार को नीचे लिखे मानदंडों को पूरा करना होगा.
ये मापदंड थे, समुदाय का पिछड़ापन, प्रशासनिक हलकों में उनका अपर्याप्त प्रतिनिधित्व एवं कुल प्रशासनिक कार्यक्षमता.
2006 में कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि एससी-एसटी वर्गों के लिए प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान करने से पहले सरकार को ये आंकड़े जुटाने होंगे कि ये वर्ग कितने पिछड़े रह गए हैं, प्रतिनिधित्व में इनका कितना अभाव है और प्रशासन के कार्य पर इनका क्या फर्क पड़ेगा.
इस निर्णय के बाद से ही सर्वोच्च न्यायलय में दायर कई जनहित याचिकाओं में इस पर पुनर्विचार की मांग उठती रही थी. इस मामले में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी जनरल के वेणुगोपाल ने प्रमोशन में आरक्षण के पक्ष में गुहार लगाते हुए कहा था कि एक सात सदस्यीय संविधान पीठ को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए.
ताज़ा फ़ैसला
आज के फ़ैसले में संविधान पीठ ने साफ़ कहा कि 2006 के 'एम नागराज बनाम भारत सरकार' मामले में संविधान पीठ के फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के लिए उसे एक और बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने की कोई ज़रूरत नहीं है. लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि अब 'प्रमोशन में आरक्षण' देने के लिए 2006 के निर्णय में लिखे गए मापदंडों को पूरा करने और इससे संबंधित जानकरी जुटाने की भी कोई ज़रूरत नहीं है.
यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि एम नागराज के फैसले के 12 साल बाद भी सरकार एससी-एसटी वर्ग के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से संबंधित सरकारी आंकड़े आज तक अदालत के सामने पेश नहीं कर पाई है. इस वजह से इन वर्गों की प्रमोशन में आरक्षण की प्रक्रिया पर अघोषित रोक सी लग गई थी.
'सामाजिक बराबरी सर्वोपरि'
अदालत ने बुधवार को न सिर्फ़ 2006 में दिए गए अपने पुराने दिशानिर्देशों को ख़ारिज किया बल्कि यह भी कहा कि नागराज निर्णय में दिए गए दिशानिर्देश 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी निर्णय के ख़िलाफ़ जाते हैं.
1992 के इंदिरा साहनी निर्णय को मंडल कमीशन केस के नाम भी जाना जाता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने संविधान सभा में दिए गए डॉ. आंबेडकर के वक्तव्य के आधार पर सामाजिक बराबरी और अवसरों की समानता को सर्वोपरि बताया था.
बसपा प्रमुख मायावती ने निर्णय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी निर्णय की बारीकियों को ठीक से समझने के बाद ही कहा जा सकता है. लेकिन मीडिया में आ रही ख़बरों से तो लगता है कि प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता साफ़ हुआ है और हम इसका स्वागत करते हैं."
दलित मुद्दों पर लंबे समय से लिख रहे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर वाईएस अलोने ने भी इस निर्णय को 'उम्मीदों से भरा' बताया.
उन्होंने कहा, "2006 के नागराज निर्णय में दिशानिर्देश थे कि प्रमोशन में आरक्षण के लिए एससी-एसटी समुदाय के नागरिकों की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी जुटाई जाए. यह निर्णय संविधान की भावना के ख़िलाफ़ जाता था. वैसे भी जाति आधारित जनगणना की जो मांग इतने सालों से उठती रही है, उस पर तो कुछ नहीं हुआ. अब कम से कम उम्मीद है कि प्रमोशन में आरक्षण की शुरुआत हो पाएगी".
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)