कर्पूरी ठाकुर की विरासत पर सियासी 'महाभारत'

    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

साल 2011 का जनवरी का महीना.

नीतीश कुमार की अगुवाई में कुछ ही हफ्तों पहले एनडीए तीन-चौथाई बहुमत से भी बड़ी जीत हासिल कर बिहार में दोबारा सत्ता में आई थी.

तब इस जीत के बाद आयोजित हुए कर्पूरी जयंती समारोहों में पहले भारतीय जनता पार्टी की ओर से जननायक कर्पूरी ठाकुर के लिए भारत रत्न की मांग की गई.

इसके बाद ऐसे ही एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अति पिछड़े वर्ग यानी ईबीसी के लिए विधायिका में आरक्षण की मांग करके एक नया एजेंडा सामने रखा.

इस साल भी बड़ी से लेकर छोटी तक बिहार की हर पार्टी खुद को कर्पूरी ठाकुर का सच्चा वारिस घोषित करने के लिए उनकी जयंती मना रही है.

भारत में समाजवादी आंदोलन के एक बड़े नेता, बिहार में अपने जीवन काल में पिछड़ा वर्ग के सबसे बड़े नेता और सूबे के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर की बीते एक दशक में बिहार की राजनीति में प्रासंगिकता बढ़ गई है.

बिहार की राजनीति

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन इसकी वजह बताते हैं, "मंडल के दौर में संख्यात्मक और सामाजिक-आर्थिक रूप से ईबीसी से मजबूत होने के कारण पिछड़ा वर्ग की मध्यवर्गीय जातियां ज्यादा सशक्त हुईं. ऐसे में ईबीसी में एक अलगाव पैदा हुआ और 2005 आते-आते वे पृथक राजनीतिक सूमह के रूप में दावा जताने लगे."

सुमन आगे बताते हैं, "बिहार की राजनीति में एक अहम चुनाव के रूप में दर्ज हो चुके 2005 के इलेक्शन में मुख्य लड़ाई इसको लेकर थी कि ईबीसी लालू और नीतीश में किसका समर्थन करेंगे. जानकारों का मानना है कि इस चुनाव में ईबीसी का बड़ा हिस्सा नीतीश के समर्थन में गया."

इसके बाद नीतीश ने अपने पहले ही मुख्यमंत्रित्व काल में पंचायतों में ईबीसी को आरक्षण देकर निचले स्तरों पर उनके सशक्तीकरण की ऐतिहासिक पहल की.

ईबीसी की गोलबंदी

राजनीतिक रूप से ईबीसी का यही उभार, दावा और सशक्तीकरण कर्पूरी ठाकुर को ज्यादा प्रासांगिक बना चुकी है क्योंकि वे खुद अति पिछड़ा वर्ग से आते थे.

जानकारों का ये भी मानना है कि कर्पूरी ठाकुर को अति पिछड़ा वर्ग का कहकर उनका कद छोटा नहीं किया जा सकता लेकिन राजनीतिक दलों को लगता है कि वे उनके सहारे इस बड़े और उभरती राजनीतिक ताकत का समर्थन हासिल कर सकते हैं.

जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार कहते हैं, "नीतीश जब लालू से अलग होते हैं तो वे ईबीसी की गोलबंदी और सत्ता में भागीदारी को लेकर बहुत मुखर हो जाते हैं. उन्हीं दिनों नीतीश का बयान भी आया था कि ईबीसी को लेकर मेरी खास दिलचस्पी भी रहती है. धीरे-धीरे ईबीसी की चुनावी राजनीति को प्रभावित करने की हैसियत बढ़ती जाती है तो सभी पार्टियां खुद को कर्पूरी ठाकुर का वारिस बताने के होड़ में लग जाती हैं."

अजय कुमार के मुताबिक यह 'प्रतीक की राजनीति' है क्योंकि कर्पूरी ठाकुर अति पिछड़ा वर्ग से आने वाले बड़े नेता हुए और सभी उनके सहारे ईबीसी के बीच अपनी पैठ बनाना चाहते हैं.

यूं बने पिछड़ों के सर्वमान्य नेता

कर्पूरी ठाकुर जनता पर अपनी अभूतपूर्व पकड़ रखने वाले और उससे सीधा संवाद करने वाले और ज़बरदस्त राजनीतिक समझ से ऐतिहासिक फैसले लेने वाले समाजवादी नेता थे. वे सादगी और ईमानदारी की जिंदा मिसाल रहे.

लेकिन जिस एक फैसले ने उन्हें मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के पहले ही पिछड़ों का सबसे बड़ा नेता बनाया वो था अपने दूसरे मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार में पिछड़ा वर्ग को नौकरियों में आरक्षण देना.

इतना ही नहीं ऐसा करते हुए ही उन्होंने ईबीसी के लिए इस आरक्षण में अलग से प्रावधान कर दिया था. इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके एक और फ़ैसले ने गरीब-वंचित वर्ग का बड़े पैमाने में सशक्तीकरण किया.

समाज और राजनीति

पहली बार उपमुख्यमंत्री बनने पर साठ के दशक में उन्होंने मैट्रिक में अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म किया. इससे गरीब-वंचित वर्ग के छात्र बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा में आए जिससे बिहार के समाज और राजनीति का चेहरा बदला.

हालांकि तब अंग्रेजी में फेल होने के बावजूद मैट्रिक पास करने वाले छात्रों का यह कहकर मजाक बनाया जाता था कि 'कर्पूरी डिवीजन' में पास हुए हैं.

कर्पूरी ठाकुर चूंकि समाजवादी धारा के राजनेता थे तो वे गरीबों के सूंपर्ण सश्क्तीकरण के लिए भूमि सुधार को भी अहम मानते थे. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी वे ऐसा कर नहीं सके.

पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफेसर डीएम दिवाकर बताते हैं, "उनका मानना था कि बिना भूमि सुधार के सामाजिक बदलाव बहुत दूर तक नहीं जाएगा. उन्होंने इसके लिए तमाम कोशिशें कीं. क्षेत्र विशेष में इसके लिए उन्होंने कोसी-क्रांति का ब्लू-प्रिंट सामने रखा. लेकिन बिहार की राजनीति के वर्ग-चरित्र ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया और उन्हें इसका बहुत अफसोस था."

कर्पूरी महात्मा गांधी की तरह ताउम्र समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए चिंतित रहे. ऐसे में उनका सच्चा वारिस बनने के लिए कैसी राजनीति संघर्ष और फैसलों की ज़रूरत है?

इसके जवाब में दिवाकर कहते हैं, "भूमि-सुधार पर बिहार सरकार के पास बंदोपाध्याय कमिटी की रिपोर्ट मौजूद है. सरकार इसे टुकड़ों मे लागू कर रही है जबकि यह समग्रता में लागू होना चाहिए. प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक को समावेशी बनाने की ज़रूरत है. और जातीय जनगणना के आंकड़ो को जारी करते हुए उसे आरक्षण का आधार बनाया जाना चाहिए. बिहार में कर्पूरी ठाकुर का वारिस होने का दावा करने वालों को इन तीनों बातों के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए."

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