नज़रिया: क्यों मज़ाक बन गए हैं कश्मीर के स्थानीय चुनाव?

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जम्मू कश्मीर में शहरी निकाय के चुनाव आज से शुरू हो रहे हैं. यहां कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुक़ाबला देखने को मिलेगा क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने चुनाव बहिष्कार का एलान किया है.
सुरक्षा के मद्देनज़र जगह-जगह सुरक्षा बलों के नाक़े लगाए गए हैं.
नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने संविधान के अनुच्छेद 35ए को सुप्रीम कोर्ट में क़ानूनी चुनौती के दिए जाने के मुद्दे पर इन चुनावों का बहिष्कार किया है.

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अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को विशेष अधिकार और सुविधाएं देता है और दूसरे प्रदेश के लोगों को वहां अचल संपत्ति ख़रीदने से वंचित करता है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चार चरणों में होने वाले चुनाव के लिए 3372 उम्मीदवारों ने पर्चा भरा है. इसमें से 192 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं.
लेकिन भारत के लिहाज़ से चुनावों के इस बहिष्कार के क्या मायने हैं? जम्मू-कश्मीर के हालात के संदर्भ में इन चुनावों को किस तरह देखा जाए? बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने इन्हीं सवालों के साथ श्रीनगर में पायनियर अख़बार के पत्रकार ख़ुर्शीद वानी से बात की.

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आगे पढ़िए, ख़ुर्शीद वानी का नज़रिया
जम्मू कश्मीर की पृष्ठभूमि के लिहाज़ से देखें तो यहां कई सालों तक नगर निकाय और पंचायत चुनाव नहीं हुए. एक ज़माना था कि तीस सालों तक ये चुनाव नहीं हुए थे. अभी 2011 से ये चुनाव नहीं हुए हैं.
इसलिए उतना ज़्यादा असर यहां नहीं रहा. जब स्थानीय निकाय चुनाव होते हैं तो उनके प्रतिनिधि बाद में विधान परिषद में आ जाते हैं. ज़मीनी स्तर पर विकास के लिहाज़ ये चुनाव काफ़ी अहम हो सकते थे.
लेकिन ये चुनाव भी यहां के राजनीतिक हालात के शिकार हो गए. इस वजह से इस चुनाव की स्वीकृति सवालों के घेरे में आ गई.

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दो-तीन बरस से ये बात उठ रही है कि जम्मू-कश्मीर में नगर निकाय और पंचायत चुनाव होने चाहिए. लेकिन कश्मीर के ज़मीनी हालात इसकी इजाज़त नहीं देते.
2016 से हम देख रहे हैं कि बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद से आम लोग केंद्र सरकार के ख़ासे विरोध में हैं. ज़मीनी स्थिति ऐसी बनी कि भारत के लिए कश्मीर में कोई राजनीतिक दख़ल करना लगभग नामुमकिन हो गया.
हमने देखा कि पिछले साल अप्रैल में हुए उपचुनावों में बहुत हिंसा हुई. आठ लोगों की मौत हो गई और मतदान का प्रतिशत सिर्फ 7.14 फीसदी रहा. इसके बाद अनंतनाग का उपचुनाव रद्द करना पड़ा. इससे ये हुआ कि अलगाववादियों की चुनाव विरोधी आवाज़ों को आम लोगों का बहुत साथ मिला.
एनसी-पीडीपी का रुख

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फिर अनुच्छेद 35ए को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने को लेकर विवाद पैदा हुआ और इस विवाद की आड़ नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने ली.
इसकी वजह ये है कि ये दोनों पार्टियां अब लोगों के पास वोट मांगने नहीं जा सकतीं. लोग वोट देने के मूड में नहीं हैं. उन पर चरमपंथियों का भी दबाव है. दूसरी तरफ़ अलगाववादियों ने भी चुनावों का पूर्ण बहिष्कार किया है.

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भारत के लिए चुनौती
लेकिन भारत सरकार के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है. भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथ के पांव पसारने के बाद से जब भी भारत सरकार ने हालात सुधारने की कोशिश की, उन्होंने चुनावों का ही सहारा लिया. 1996, 1998, 1999 और 2002 और 2008 के उदाहरण हमारे सामने हैं.
बिफ़रे हुए लोगों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश हर बार सरकार ने चुनाव के ज़रिये ही की. इस बार भी ये वही चाहते हैं कि चुनाव का कार्ड इस्तेमाल करके भारत सरकार के ख़िलाफ़ जो गुस्सा पनपा है, उसे कमज़ोर किया जाए.
जहां तक लोगों के मूड और माहौल की बात है, कश्मीर में कहीं भी चुनाव का माहौल नहीं दिखता. नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी चुनाव में हिस्सा नहीं ले रहीं और उनके कार्यकर्ता भी नहीं दिखते. कहीं चुनावी सरगर्मी नहीं है. दीवारों पर पोस्टर और चुनावी रैलियां कहीं दिखाई नहीं दे रहीं.
ये चुनाव इस हद तक अजीबोग़रीब हैं कि मालूम ही नहीं है कि कहां कौन उम्मीदवार है. कुछ जगहों पर उनकी पहचान तक सार्वजनिक नहीं की जा रही है. यह एक मज़ाक सा बन गया है.
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