वो वजह जिससे चंदा कोचर कुर्सी छोड़ने को हुईं मजबूर

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- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
वीडियोकॉन समूह को लोन दिए जाने के मामले में आरोपों का सामना कर रही चंदा कोचर ने गुरुवार को आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ, प्रबंध निदेशक और बैंक के सब्सिडिअरी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर के पद को छोड़ दिया.
भले ही आज उनका नाम ग़लत कारणों से चर्चा में है और जिसकी वजह से उन्हें रिटायरमेंट से पहले अपना पद तक गंवाना पड़ा है, लेकिन आईसीआईसीआई बैंक के सीईओ पद तक का सफ़र तय करने में चंदा कोचर की मेहनत और लगन एक मिसाल के तौर पर दी जाती रही है.
चंदा कोचर वो नाम है जिन्होंने न केवल भारतीय बैंकिंग सेक्टर में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ा बल्कि पूरी दुनिया में बैंकिंग के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई.
एक मैनेजमेंट ट्रेनी के पद से अपने करियर की शुरुआत कर आईसीआईसीआई बैंक का सीईओ बनने और फोर्ब्स पत्रिका में 'दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं' की सूची में शुमार होने वाली चंदा कोचर का जीवन एक महिला की सफलता की दमदार कहानी है.
चंदा कोचर सफलता के इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं और आख़िर वो क्या कारण थे जिसकी वजह से उन्हें समय से पहले अपना पद छोड़ना पड़ा?

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सफलता के सोपान
राजस्थान के जोधपुर में जन्मीं चंदा कोचर की स्कूली पढ़ाई जयपुर से हुई. इसके बाद मुंबई के जय हिंद कॉलेज से उन्होंने मानविकी में ग्रैजुएशन किया.
1982 में ग्रैजुएशन के बाद जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ से मास्टर्स की पढ़ाई की.
मैनेजमेंट स्टडीज़ में बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए चंदा कोचर को वोकहार्ड्ट गोल्ड मेडल और एकाउंटेंसी में जेएन बोस गोल्ड मेडल मिल चुका है.
1984 में बतौर मैनेजमेंट ट्रेनी चंदा कोचर ने आईसीआईसीआई जॉइन किया.
1955 में आईसीआईसीआई (इंडस्ट्रियल क्रेडिट ऐंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया) का गठन भारतीय उद्योगों को प्रोजेक्ट आधारित वित्तपोषण के लिए एक संयुक्त उपक्रम वित्तीय संस्थान के रूप में किया गया था.
जब 1994 में आईसीआईसीआई संपूर्ण स्वामित्व वाली बैंकिंग कंपनी बन गई तो चंदा कोचर को असिस्टेंट जनरल मैनेजर बनाया गया.
चंदा कोचर लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गईं. डिप्टी जनरल मैनेजर, जनरल मैनेजर के पदों से होती हुई 2001 में बैंक ने उन्हें एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बना दिया. इसके बाद उन्हें कॉरपोरेट बिज़नेस देखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. फिर वो चीफ़ फ़ाइनेंशियल ऑफ़िसर बनाई गईं.
2009 में चंदा कोचर को सीईओ और एमडी बनाया गया. चंदा कोचर के ही नेतृत्व में आईसीआईसीआई बैंक ने रिटेल बिज़नेस में क़दम रखा जिसमें उसे अपार सफलता मिली.
यह उनकी योग्यता और बैंकिंग सेक्टर में उनके योगदान का ही प्रमाण है कि भारत सरकार ने चंदा कोचर को अपने तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से (2011 में) नवाजा.
आईसीआईसीआई के कार्यकाल के दौरान चंदा कोचर को भारत और विदेशों में बैंक के कई तरह के संचालनों की ज़िम्मेदारी दी गई थी. लगातार नौ सालों तक सीईओ रहीं चंदा कोचर पर फिर 2018 की शुरुआत में वीडियोकॉन ग्रुप को लोन देने और फिर अनुचित तरीके से निजी लाभ लेने का आरोप लगा और मामला इतना बढ़ गया कि मार्च 2019 में होने वाले कार्यकाल की समाप्ति से कुछ ही महीने पहले 4 अक्टूबर 2018 को उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

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क्यों गंवानी पड़ी कुर्सी?
चंदा कोचर पर कथित रूप से इसी साल मार्च में अपने पति को आर्थिक फ़ायदा पहुंचाने के लिए अपने पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था. मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि आईसीआईसीआई बैंक ने वीडियोकोन समूह को 3,250 करोड़ रुपये का लोन मुहैया कराया था.
अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने मार्च में दावा किया था कि वीडियोकॉन ग्रुप की पांच कंपनियों को आईसीआईसीआई बैंक ने अप्रैल 2012 में 3250 करोड़ रुपये का लोन दिया.
ग्रुप ने इस लोन में से 86% यानी 2810 करोड़ रुपये नहीं चुकाए. 2017 में इस लोन को एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग असेट्स) में डाल दिया गया.
अख़बार के मुताबिक वीडियोकॉन समूह के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत के कोचर के पति दीपक कोचर के साथ व्यापारिक संबंध थे.
वीडियोकॉन ग्रुप की मदद से बनी एक कंपनी बाद में चंदा कोचर के पति दीपक कोचर की अगुवाई वाली पिनैकल एनर्जी ट्रस्ट के नाम कर दी गई.
यह आरोप लगाया गया कि धूत ने दीपक कोचर की सह स्वामित्व वाली इसी कंपनी के ज़रिए लोन का एक बड़ा हिस्सा स्थानांतरित किया था. आरोप है कि 94.99 फ़ीसदी होल्डिंग वाले ये शेयर्स महज 9 लाख रुपये में ट्रांसफ़र कर दिए गए.

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कैसे सामने आया मामला?
मीडिया ने इस मामले को एक अनाम व्हिसल ब्लोअर की शिकायत के बाद उजागर किया. व्हिसल ब्लोअर ने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को लिखे पत्र में कोचर के कथित अनुचित व्यवहार और हितों के टकराव के बारे में लिखा था.
बैंक ने शुरुआत में कोचर के ख़िलाफ़ मामले को आनन-फानन में रफा-दफ़ा करने की कोशिश की, लेकिन बाद में लोगों और नियामक के लगातार दबाव के चलते पूरे मामले की जांच के आदेश देने पड़े.
आईसीआईसीआई बैंक ने स्वतंत्र जांच कराने का फ़ैसला लिया. बैंक ने 30 मई को घोषणा की थी कि बोर्ड व्हिसल ब्लोअर के आरोपों की 'विस्तृत जांच' करेगा.
फिर इस मामले की स्वतंत्र जांच की ज़िम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी. एन. श्रीकृष्णा को सौंपी गई. सीबीआई, ईडी और एसएफ़आईओ भी इसकी जांच कर रही हैं.
जून में, चंदा कोचर ने छुट्टी पर जाने का निर्णय लिया था. उसके बाद संदीप बख्शी को 19 जून को बैंक का सीओओ बनाया गया था.
इससे पहले संदीप आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल के एमडी-सीईओ थे. आईसीआईसीआई के जनरल इंश्योरेंस बिजनेस को खड़ा करने का श्रेय बख्शी को ही जाता है.
गुरुवार को आईसीआईसीआई बैंक ने चंदा कोचर के इस्तीफ़े के बाद संदीप बख्शी को अब नया पूर्णकालिक सीईओ और एमडी नियुक्त किया है.
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