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BBC SPECIAL: वो आख़िरी शिकारी जो जंगल से बाहर नहीं आना चाहता
- Author, प्रमिला कृष्णन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, केरल से
''माओवादी, बाढ़, जंगल की आग. मैंने ये सब देखा है और हमेशा ही इस जंगल में शांति से रहा हूं. मैं अपना ये घर, अपना ये जंगल नहीं छोड़ूंगा.''
अपनी जिंदग़ी के नौ दशक देख चुके चेरिया वेलुथा चालो नाइका जनजातीय समुदाय के प्रमुख हैं और मेपद्दी जंगल के भीतरी इलाक़े में अपनी दो पत्नियों के साथ रह रहे हैं.
इस क्षेत्र के अधिकतर आदिवासी पिछले कुछ दशकों में बेहतर ज़िंदगी की तलाश में शहरों का रुख़ कर चुके हैं. जो लोग जंगल में रह गए थे उन्हें बाढ़ के बाद सरकार ने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है. अगस्त 2018 में आई बाढ़ इस सदी में केरल की दूसरी सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा है. इससे पहले साल 1924 में ऐसी ही भयानक बाढ़ आई थी.
बाढ़ और भूस्खलन की वजह से बेघर हुए आदिवासियों के लिए सरकार ने पुनर्वास की घोषणा की है. बहुत से युवा चोला नाइका आदिवासी राहत कैंपों में रह रहे हैं. कुछ स्थायी निवास मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं. बेहतर जीवन के लिए वो जंगल को छोड़ देना चाहते हैं.
बावजूद इसके, चेरिया वेलुथा अपना जंगल छोड़ने को तैयार नहीं है. वो इस शिकारी समुदाय के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति हैं. उन्हें पूरा भरोसा है कि वो अब भी जंगल में पहले की ही तरह रह सकते हैं. वो मानते हैं कि जीवन और मौत दोनों ही प्रकृति का उपहार हैं. वो अपनी क़िस्मत पर विश्वास करते हैं.
केरल के वयानाड ज़िले के मुप्पईनाडु पंचायत के जंगली इलाक़े में आठ किलोमीटर पैदल चलने के बाद बीबीसी की टीम चेरिया वेलाथु के पास पहुंची. हमने जंगल से उनके प्यार और इसे न छोड़ने की वजहें जानी. शहरी ज़िंदगी की सुरक्षा पर वो जंगल के रोमांच को तरजीह देते हैं.
जंगल में उतार चढ़ाव वाले इस रास्ते पर हरेभरे पेड़ हैं. एक ऊंची चट्टान वाली घाटी वेलुथा की गुफ़ा तक पहुंचती हैं. यहां के रास्ते में हमने हाथियों की लीद का ढेर देखा. ये जंगली हाथियों के आसपास ही होने का संकेत था, जो कोई सुहावना अनुभव नहीं था.
जब हम पतले-दुबले वेलुथा से पहली बार मिले तो वो हमसे बात करने के लिए तैयार ही नहीं थे. जब उनके भरोसेमंद बाहरी व्यक्ति सुनील कुमार ने उन्हें बताया कि बीबीसी उनकी कहानी दुनिया को बताना चाहता है तो वो बात करने के लिए तैयार हुए.
उन्होंने अपनी जनजातीय चोला नाइका भाषा में ही बात की. ये मलयालम और कन्नड़ से मिलकर बनी है. उन्होंने अपने गहरे घने रंगे हुए घुंघराले बालों पर खूब तेल लगाया था. वो बहुत सोच समझकर बात कर रहे थे. वहां खेल रहे कुछ बच्चे हमारे कैमरों को उत्सुकता से देख रहे थे और उनके बारे में और अधिक जानना चाहते थे.
हमने सबसे पहले वेलुथा से यही पूछा कि वो इस जंगल से बाहर क्यों नहीं जाना चाहते हैं जबकि सरकार के कहने पर उनके समुदाय के अधिकतर लोग सुरक्षा और भोजन का भरोसा मिलने के बाद राहत कैंपों में जा चुके हैं.
उन्होंने कहा, "आप कितनी बार डरोगे और अपनी जान बचाकर भागोगे? बारिश होगी तो बाढ़ आएगी ही, यही तो प्रकृति है. अगर आप अब बाढ़ की वजह से जंगल से भाग जाओगे, बारिश से डरोगे, तो कभी ऐसा भी दिन आएगा जब आप पानी की चाह में ही मर जाओगे. कौन कब मरेगा कोई नहीं जानता है. मौत से डरना और पूरा जीवन इस डर के साये में जीना पागलपन है."
वो कहते हैं, "जब वास्तविक ख़तरा होगा तो प्रकृति हमें बता देगी और मैं जानता हूं कहां छुपना है, मैं इस जंगल के हर पेड़ को जानता हूं, हर झाड़ी, हर गुफ़ा, हर ठिकाने को जानता हूं. मैं बिना किसी परेशानी के यहां इतने सालों से आराम से रहता रहा हूं. मुझे सिर्फ़ तब ही डर लगा जब बाहरी लोग अज्ञात बीमारी और भोजन को हमारे इस इलाक़े में लेकर आए, इसके अलावा मुझे कभी डर नहीं लगा."
"मेरे दादा बताया करते थे कि जंगल की आग के बाद ही जंगल की असली संपदा बाहर आएगी और बारिश सभी गंदगी को साफ़ कर देगी. हम प्राकृतिक आपदा के दौरान अपनी जान बचाना जानते हैं. हर बार भारी बारिश या प्रकृति का रौद्र रूप देखकर अपनी जान बचाकर इधर-उधर भागने का कोई मतलब नहीं है."
साल 2002 में वेलुथा के समुदाय की बस्ती को बाढ़ बहा ले गई थी. उन्होंने तब भी सुरक्षित ठिकाने पर जाने से इनकार कर दिया था. वो कभी भी कल की तैयारी नहीं करते हैं. वो इस चट्टान की चोटी पर सप्ताह में एक बार ही जाते हैं, वो भी तब जब उनके समुदाय का कोई व्यक्ति या कोई सरकारी अधिकारी उन्हें मिलने के लिए वहां बुलाता है.
जब हमने उनसे बाढ़ के बीच जंगल में जीवन की मुश्किलों के बारे में पूछा तो वो हंसने लगे. उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानता कि ये पेड़ कितने पुराने हैं. जब मैं बच्चा था तब भी ये पेड़ यहीं थे, और ये अब भी बढ़ रहे हैं. इन पेड़ों की ही तरह मैं अपनी भी उम्र नहीं जानता हूं. हम लोग उम्र का हिसाब सालों या दिनों में नहीं रखते हैं. हम अपने जंगल की ही तरह जीते हैं. जब सूरज निकलता है तो हम जागते हैं, और जब सूर्यास्त होता है तो सोने चले जाते हैं. जंगल से जो भी हमें मिलता है हम खा लेते हैं. मैदानी इलाक़ों में खाद-पानी से जो सब्ज़िया उगाई जाती हैं उन्हें मैं नहीं खाता. मैं टमाटर भी नहीं खाता. अगर हमें किसी एक दिन खाना नहीं मिलता है तो ये हमारे लिए परेशानी की बात नहीं होती. जब प्रकृति हमें देती है तब हम खाते हैं."
वो जंगली सूअर, गोह और जड़ें खाकर ज़िंदा रहते हैं. हालांकि वो कहते हैं कि हाल के दिनों में गोह का शिकार खाने के बाद उन्हें पेट दर्द की शिकायत हुई क्योंकि इन गोह की खाल पर कुछ संक्रमण सा था. वो कहते हैं, "लगता है बाहरी लोगों ने हमारे जंगल को रसायनों से प्रदूषित कर दिया है."
वेलुथा कहते हैं कि जब कोई आदिवासी कीटनाशकों से उगाई गई सब्ज़ियां या फल खाता है तो उसका बीमार पड़ना तय है, कई बार तो मौत तक हो जाती है.
वो कहते हैं, "मुझे जंगल से जो मिलता है मैं उससे जीता हूं. बहुत से नौजवान बाहर मैदानी और शहरी इलाक़ों में रहने गए हैं. अच्छी बात है, मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है. लेकिन शहरों में रहना आदिवासियों के लिए मुश्किल काम है. पिछले महीने ही मैंने जड़ी बूटियों से एक युवक का इलाज किया. उसने हाल ही में पलक्कड़ में रहना शुरू किया है. मैं किसी को बाहर जाने से नहीं रोकता और मुझे कैसे रहना है इस बारे में किसी की सलाह भी नहीं सुनता."
आप उनसे शहरी जीवन की परेशानियों के बारे पूछिए, उनके पास इसकी लंबी सूची है.
"क्या शहर आप जैसे ऐसे लोग पैदा कर सकता है जो हमारे जंगल में हमेशा रह सकते हों? क्या तुम्हारे लिए हमारे जंगल में रहना संभव है? ठीक ऐसे ही मेरे लिए आपके शहर में रहना संभव नहीं है. जल, वायु, भोजन और बाकी सबकुछ जो मैं यहां लेता हूं वो प्रकृति से मिलते हैं. क्या आपके शहर में इस गुणवत्ता की हवा, पानी और भोजन मिल पाएगा? बोतलबंद पानी पीकर मेरा गला ख़राब हो जाएगा. आप जो सब्ज़िया उगाते हैं मैं वो नहीं खाता क्योंकि इससे मेरी सेहत ख़राब होती है. मैं जड़ें खाता हूं, शहद खाता हूं, और जंगल से मिलने वाले अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थ खाता हूं."
चोला नाइका समुदाय के अपने कोई विशेष भगवान या आराध्य देवता नहीं है लेकिन इस समुदाय का जंगल और प्रकृति में गहरा विश्वास है और वो अपने पूर्वजों की पवित्र आत्माओं की भी पूजा करते हैं. वेलुथा को लगता है कि अगर उन्होंने अपना जंगल छोड़ दिया तो भगवान उनसे नाराज़ हो जाएगा.
वेलुथा कहते हैं, "बहुत से सरकारी अधिकारी हमसे कह रहे हैं कि हम अपना जंगल छोड़कर बाहर रहने लगे. लेकिन ये जंगल ही मेरा घर है. आपके लिए ये दूरस्थ घना जंगल हो सकता है. लेकिन मेरा जीवन यहीं हैं. यहीं मैं इतने सालों ज़िंदा रहा हूं. अगर मैंने ये जगह छोड़ी तो प्रकृति मां मुझसे नाराज़ हो जाएगी. मुझे इन पेड़ों से प्यार है, यहां की शांति से प्यार है, यहां के कीट-पतंगों की आवाज़ से प्यार है, पक्षियों और जानवरों से प्यार है."
तेज़ बहाव से बह रही पेरियार नदी की ओर इशारा करते हुए वो कहते हैं, "नदी के पास आपको हाथी के कद की चट्टानें मिल जाएंगी. उसी जगह पर मेरी मां ने मुझे जन्म दिया था. मैं ये जगह कैसे छोड़ सकता हूं. मेरे पूर्वज यहां दफ़न हैं. मुझे गहरा विश्वास है कि वो अब भी मेरे आसपास ही रहते हैं. मैं उन्हें छोड़कर नहीं जा सकता. मुझे भी यहीं दफ़न होना है."
सरकार मुझे पक्का मकान दे सकती है. लेकिन वहां ये ताज़ी हवा और मेरा ये शामियाना नहीं होगा. मैं यहीं जन्मा हूं और यहीं मरूंगा. मैं किसी युवक को बाहर जाने से नहीं रोकता. जो जाना चाहता है जाए, मैं तो यहीं रहूंगा.
शोधकर्ताओं के मुताबिक 1970 के दशक तक चोला नाइका समुदाय के बारे में बाहरी दुनिया को पता नहीं था. वो गुफ़ाओं में रहते थे और बाहरी दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं था.
2011 की जनगणना के मुताबिक इस समुदाय के सिर्फ़ 124 लोग ही जंगल में रह गए हैं. हमारे साथ आए गाइड सुनील बताते हैं कि बाढ़ के बाद बहुत से चोला नाइका आदिवासी बाहर चले गए हैं जिसकी वजह से ये संख्या और कम रह जाएगी.
वो बताते हैं कि पहले जब चोला नाइका समुदाय के लोग बाहरी लोगों को देखते थे तो अपने जंगल के भीतर भाग जाते थे. लेकिन अब वो जंगल के दोहन की वजह से बाहरी लोगों को जंगल से खदेड़ देते हैं.
सुनील कहते हैं, "अब चट्टानों की तलहटी में रहने वाले आदिवासी बाहरी लोगों को देखकर चिल्लाते हैं क्योंकि वो पर्यटकों के व्यवहार से निराश हैं. पर्यटक यहां प्लास्टिक कचरा फेंक जाते हैं, शराब की बोतलें छोड़ जाते हैं और बाहरी लोग जंगल की संपदा का अधिक दोहन करते हैं. अब जंगली फलों की कई क़िस्में गुम सी हो गई हैं जैसे कि जंगली इमली, करौंदा आदि. चोला नाइका लोग जानते हैं फल को कब तोड़ना है, कब नहीं. बहुत से ग़ैर आदिवासी लोग जो पेड़ों पर चढ़ नहीं सकते हैं, पेड़ ही काट देते हैं. बहुत से बाहरी लोग और पर्यटक बारिश के मौसम में मछलियां पकड़ने यहां आते हैं. शहर के आधुनिक लोगों ने इन आदिवासियों का भोजन ही छीन लिया. और यही वजह है कि बाहरी लोगों के प्रति इन लोगों के मन में ग़ुस्सा है."
चोला नाइका समुदाय की सिमटती आबादी के बारे में सुनील कहते हैं, "सिर्फ़ बाढ़ ही नहीं बल्कि बाहरी लोगों के मेपद्दी जंगल का अभूतपूर्व दोहन करने की वजह से चोला नाइका समुदाय को मैदानी इलाक़े में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इस समुदाय के बहुत से शिकारी अब जंगल में रहने की अपनी कला खो चुके हैं. चेरिया वेलुथा और उनकी दो पत्नियों के अलावा अब कोई इस घने जंगल में नहीं रहना चाहता. मुझे डर है कि इस मेपद्दी जंगल की ही तरह एक दिन ये समुदाय भी समाप्त हो जाएगा."
वेलुथा की बेटी मिनी भी अब ये जंगल छोड़ने का मन बना चुकी हैं. अपने तीसरे बच्चे को गोद में लिए मिनी कहती हैं कि वो ऐसा मुश्किल जीवन नहीं चाहती जैसा उनके मां-पिता ने जिया है. वो कहती हैं, "कम से कम अब हम पूरे कपड़े पहनते हैं और सरकार से मिला चावल खाते हैं. हमारे पूर्वज कपड़े नहीं पहनते थे. हम एक दशक पहले तक गुफ़ाओं में रहते थे. हम बचपन में जो जंगली चीज़ें खाते थे अब वो मिलती ही नहीं है. यहां तक कि शहद भी मुश्किल से मिलता है."
जंगल के पास स्थित एक सरकारी कैंप में कुछ दिन रहने के बाद ही मिनी में जंगल के बाहर रहने का भरोसा पैदा हुआ है. वो कहती हैं, "जंगल के बाहर रहने को लेकर मेरे मन में कुछ डर और आशंकाएं थीं. लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के लिए मुझे ये जंगल छोड़ना ही होगा. मैं अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती हूं और बेहतर जीवन देना चाहती हूं. हाल ही में कुछ अधिकारी हमारे पास आए थे. मैंने उनसे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए कहा. उन्होंने बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और घर देने का वादा किया है."
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