इसरो जासूसी केस: कैंसर पीड़ित शर्मा को आज भी है इंसाफ़ का इंतज़ार

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
26 साल की बेटी ने अपने 62 साल के पिता का हाथ कुछ ऐसे पकड़ रखा था कि मानो कह रही हो 'अब मैं उन्हें कहीं नहीं जाने दूंगी'.
वो अपने पिता को बार-बार टूटते हुए नहीं देखना चाहतीं. पिता के हाथों पर बेटी की हथेलियों की मज़बूत पकड़ से अंदाज़ा हो रहा था कि वो अब उनका सहारा है.
उनके पिता का नाम एस के शर्मा है. वो कुछ घंटे पहले ही अस्पताल से लौटे हैं. उन्हें आहार नाल का कैंसर है, वो उसी के इलाज के लिए अस्पताल गए थे लेकिन अब उनका ये कैंसर रीढ़ की हड्डी तक फैल चुका है.
शरीर से बेहद कमज़ोर और मानसिक तौर पर टूट चुके एस के शर्मा अपनी आपबीती बताते-बताते भावुक हो उठते हैं.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के जासूसी मामले का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं कि जब केरल पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया तो उनकी बेटी मोनीशा बच्ची थी.

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इसरो जासूसी मामले में जिन 6 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, एस के शर्मा उनमें से एक थे.
शर्मा के अलावा इसरो के वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन, डी शशिकुमारन, मालदीव की दो महिलाएं और व्यापारी चंद्रशेखर को भी गिरफ़्तार किया गया था.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने ही इस मामले में गिरफ़्तार किए गए लोगों को बरी कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. नारायणन को 50 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी आदेश सुनाया था.
इन ख़ामोशियों के बीच, शर्मा बीबीसी हिंदी से कहते हैं कि अगर मेरे ख़िलाफ़ ये झूठा केस फ़ाइल नहीं किया गया होता तो बीते 20 सालों में मैं चार-पाँच लाख रुपये महीने कमा रहा होता.
ये मामला साल 1998 का है, जिसमें अब सीबीआई ने ये स्पष्ट कर दिया है कि जासूसी के मामले का कोई आधार ही नहीं था.
शर्मा ने केरल सरकार से 55 लाख रुपये का मुआवज़ा मांगा था.
क्या था 'इसरो जासूसी मामला',पढ़ें: इसरो के वो वैज्ञानिक जिन पर लगा जासूसी का झूठा आरोप

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तब से शर्मा अपने साथ न्याय होने का इंतज़ार कर रहे हैं कि सरकार उन्हें मुआवज़ा दे.
शर्मा के वकील टॉमी सेबेस्टियन ने बीबीसी को बताया, "जब से सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को इस मामले को देखने के लिए कहा है उनका केस वैसे ही अटका पड़ा है. कोई भी बात आगे नहीं बढ़ रही है."
सेबेस्टियन कहते हैं कि शर्मा साल 1998 से अपने लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं.
उन्होंने बताया, "ये मामला बेंगलुरु की अदालत में दायर किया गया था. पहले उन्होंने नामंजूरी को आधार बनाकर याचिका दायर की क्योंकि केरल पुलिस को दो महीने का नोटिस नहीं दिया गया था. फिर उन्होंने तर्क दिया कि ये मामले बेंगलुरु अदालत के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं आते हैं. दोनों ही तर्क ख़ारिज कर दिए गए."
केरल पुलिस ने इसके बाद कर्नाटक हाई कोर्ट में अपील की, जो निचली अदालत के फ़ैसले के साथ थी.
पिछले छह-सात साल से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़ा हुआ था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को निचली अदालत के सुपुर्द कर दिया.


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एस के शर्मा कहते हैं, "मैं अपनी पत्नी और तीन बेटियों के साथ बहुत खुश था. अचानक से वो आए और मुझे बिना मेरी किसी ग़लती के पकड़कर लेते गए. मेरा नाम ख़राब हो गया. मेरे पास दो कारें थीं जिसे मेरी बीवी ने वकीलों की फ़ीस भरने के लिए और बेंगलुरु-केरल अप-डाउन करने के लिए बेच दिया."
"जब मैं जेल से लौटकर बाहर आया तो मैंने एक स्कूटर ख़रीदा. उस स्कूटर पर बैठकर मैं जब भी कहीं बाहर जाता और लोग मुझे देखते तो मैं हमेशा यही सोचता था कि वो मुझसे नफ़रत करते हैं. मेरी बेटियों को स्कूल से निकालना पड़ा क्योंकि उन्हें मेरी बेटियां होने की वजह से परेशान किया जाता था."
पुलिस हिरासत में शर्मा को थर्ड डिग्री पर रखा गया ताकि वो उन पर लगे कथित आरोप स्वीकार कर लें.
उन्हें गिरफ़्तार किए जाने की एकमात्र वजह ये थी उन्होंने कथित आरोपों की अभियुक्त महिलाओं में से एक महिला की बेटी का एडमिशन उस स्कूल में कराया था, जहाँ के प्रिंसिपल को वो जानते थे.
वो कहते हैं, "चंद्रशेखर मेरा दोस्त था. उसने मुझसे निवेदन किया था कि मैं उसके स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराऊं. जब पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार किया, मैं सच बता रहा हूँ उस वक़्त तक मुझे इसरो का पूरा मतलब भी नहीं पता था. मैंने उनसे कहा कि मैं वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को नहीं जानता हूँ. मैं शारीरिक रूप से मज़बूत था इसलिए मैं उनके अत्याचार को सह सका."

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शर्मा बताते हैं कि वो पहली बार जेल में ही डॉक्टर नारायणन से मिले. "चंद्रशेखर कुछ हफ़्ते पहले ही गुज़र गए." इतना कहकर शर्मा एकबार फिर सिसक उठते हैं.
आज की तारीख़ में शर्मा के लिए सबसे बड़ी राहत की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बाइज़्जत बरी कर दिया है.
शर्मा को अपने मुआवज़े का इंतज़ार है ताकि वो अपना इलाज करवा सकें और अपने परिवार के लिए भी कुछ छोड़कर जा सकें.
शर्मा कहते हैं, "अब मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ दिन गिन रहा हूँ."

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