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अहमदाबाद के कई इलाकों में मुसलमानों के लिए कितना मुश्किल है घर ख़रीदना?
- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती सेवा
संकरी गलियां, एक दूसरे में धंसे मकान, गंदी सड़कें, पुरानी इमारतें, वीरान घर और सड़क किनारे बने कुछ छोटे-छोटे मंदिर. अहमदाबाद का शाहपुर इलाक़ा कुछ ऐसा ही नज़र आता है.
शाहपुर, कालूपुर विधानसभा क्षेत्र में आता है. यहां के स्थानीय कांग्रेस विधायक गयासुद्दीन शेख़ ने बीबीसी को बताया कि इस इलाक़े में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी लगभग बराबर ही है.
गुजरात में अशांत क्षेत्र में संपत्ति की बिक्री या हस्तांतरण पर रोक के लिए क़ानून है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इसी क़ानून की वजह से इस इलाक़े में आबादी इतनी घनी है.
इस क़ानून का असर सभी संपत्ति सौदों पर होता है और ख़ासकर अगर सौदा किसी हिंदू और मुसलमान के बीच हो. इस क़ानून के तहत ज़िलाधिकारी के पास घोषित अशांत क्षेत्रों में संपत्ति की बिक्री को नियमित करने का भी अधिकार है.
कुछ कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का कहना है कि इस क़ानून की वजह से मुसलमानों के पास संपत्तियां ख़रीदने के विकल्प सीमित हो रहे हैं और उनके लिए अशांत क्षेत्रों में संपत्ति ख़रीदना बेहद मुश्किल हो गया है.
अशांत क्षेत्र
अहमदाबाद में कुल 770 घोषित अशांत क्षेत्र हैं जिनमें से 167 शाहपुर क्षेत्र में ही आते हैं. हालांकि पूरे राज्य में घोषित अशांत क्षेत्रों की संख्या इससे कहीं अधिक है.
ये क़ानून सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में संपत्ति की बिक्री को नियमित करने के लिए बनाया गया था. इसके तहत घोषित क्षेत्रों में किसी भी अचल संपत्ति की बिक्री से पहले स्थानीय ज़िलाधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य है. इसके बाद ही मालिकाना हक़ का हस्तांतरण होता है.
अहमदाबाद में प्राचीन चारदीवारी के दायरे में आने वाले मिश्रित आबादी वाले इलाक़े इस क़ानून के तहत आते हैं. यहां सदियों पुराने घर आज भी मौजूद हैं.
कार्यकर्ता कलीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने बीबीसी को बताया, "हिंदुओं के लिए इन तंग गलियों में घर ख़रीदना आसान है लेकिन मुसलमानों के लिए बहुत मुश्किल है."
सिद्दीकी दलित-मुस्लिम एकता मंच के राज्य समन्वयक हैं. वो राज्य के अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों में मुस्लिम समुदाय के अधिकारों के लिए काम करते हैं.
हालात ऐसे हैं कि पैसे वाले मुसलमान अगर दोगुनी क़ीमत देकर भी घर ख़रीदना चाहें तो उनके लिए मुश्किल होता है.
सिद्दीक़ी कहते हैं, "रियल एस्टेट एजेंट ख़रीदार का धर्म देखने के बाद संपत्ति के दाम बताते हैं. उदाहरण के तौर पर किसी भी घनी आबादी वाले घोषित अशांत क्षेत्र में हिंदू परिवार एक कमरे का घर पांच लाख रुपये में ख़रीद सकता है जबकि उसी घर को ख़रीदने के लिए मुसलमान परिवार को दस लाख रुपये तक चुकाने पड़ जाते हैं."
वो कहते हैं कि ये महंगी क़ीमत चुकाने के लिए यदि कोई मुसलमान तैयार हो भी जाए तो उसके लिए घर मिल जाना आसान नहीं है.
घर मुसलमानों के लिए महंगे, हिंदुओं के लिए सस्ते
45 वर्षीय मितेश शाह एक स्थानीय रियल एस्टेट एजेंट हैं. वो शाहपुर इलाक़े में ही संपत्तियों का लेन-देन करते हैं.
शाहपुर की अवनिका सोसायटी के पास हाल ही में हुए एक सौदे का उदाहरण देते हुए शाह कहते हैं कि उन्होंने उस संपत्ति को एक हिंदू ख़रीदार के लिए 36 लाख रुपये में तय कर लिया था लेकिन कुछ मुसलमान ख़रीदार इस संपत्ति को 70 लाख रुपये तक में ख़रीदना चाहते थे.
तीस सालों से रियल एस्टेट का कारोबार कर रहे शाह कहते हैं कि धनी हिंदू परिवार इन इलाक़ों को छोड़कर जा रहे हैं और अब इन घोषित अशांत क्षेत्रों में रहने वाले अधिकतर हिंदू परिवार निम्न या मध्यमवर्ग के ही हैं.
वो कहते हैं, "धनी हिंदू परिवार ग़रीब या मध्यमवर्गीय हिंदू परिवारों को अपना घर बेचकर पश्चिमी अहमदाबाद में जाकर बस रहे हैं."
वो कहते हैं कि इन घोषित अशांत क्षेत्रों में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदूवादी संगठनों का भी गहरा प्रभाव है और हिंदू परिवार मुसलमानों को अपना घर बेचने से डरते हैं."
साल 2011 की जनगणना के मुताबिक गुजरात में 58.46 लाख मुसलमान हैं जबकि हिंदुओं की आबादी 5.35 करोड़ हैं.
मुसलमानों के पास घर ख़रीदने के सीमित विकल्प
शोधकर्ता शारिक़ लालीवाला ने अहमदाबाद में मुसलमानों की आबादी के घने और छोटे इलाक़ों में सिमटने पर शोधपत्र लिखे हैं. उन्होंने घेटोआइज़ेशन (मुसलमान मोहल्लों के लिए घेटो का इस्तेमाल किया जाता है) पर शोधकर्ता क्रिस्टोफ़र जैफ़रले के साथ मिलकर कई प्रमुख वेबसाइटों और समाचारपत्रों के लिए भी लेख लिखे हैं.
बीबीसी हिंदी से बात करते हुए वो कहते हैं, "हिंदुओं के मुक़ाबले मुसलमानों के पास घर ख़रीदने के विकल्प बहुत सीमित हैं. पारंपरिक रूप से वो पुराने अहमदाबाद में ही घर देखते हैं या फिर घनी मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों में जाते हैं जैसे कि जुहुपुरा, सरख़ेज या फिर रामोल."
वो कहते हैं कि मुसलमानों के पास पुराने शहर के बाहर विकल्प बहुत कम है और यही वजह है कि वॉल्ड सिटी या पुराने अहमदाबाद में घरों की क़ीमतें बढ़ रही हैं. वो कहते हैं कि, "पुराने अहमदाबाद में रहने वाले महत्वाकांक्षी अमीर मुसलमान इस घने इलाक़े से बाहर निकलकर नवरंगपुरा या पाल्दी जैसे इलाक़ों में रहना चाहते हैं."
ग़ैर मुस्लिम इलाक़ों में मुसलमानों के मकान ख़रीदने से पैदा होने वाले तनाव की ख़बरें अख़बारों में छपती रहती हैं. क़लीम सिद्दीक़ी कहते हैं कि संपत्ति की ख़रीद-बिक्री से जुड़ा क़ानून धर्म में भेद नहीं करता लेकिन इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित मुसलमान ही हैं.
वीएचपी और मुसलमान ख़रीदार
यहां हुईं कुछ घटनाएं दर्शाती हैं कि अगर कोई मुसलमान अशांत क्षेत्र में घर ख़रीद भी लेता है तो वो उसका इस्तेमाल नहीं कर पाता है.
55 वर्षीय गुलज़ार मोमिन एक रियल एस्टेट एजेंट हैं. शाहपुर के वनमालिवाका नि पोले इलाक़े में उनका एक घर है. मोमिन इस इलाक़े में रहने वाले एकमात्र मुसलमान हैं.
वो दावा करते हैं कि घर ख़रीदने के तुरंत बाद वीएचपी के कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला किया. मोमिन चाहते हैं कि वो अपना घर बेच दें या किसी को किराये पर दे दें. वो कहते हैं कि वीएचपी के नेता इस घर को किसी मुसलमान को बेचने नहीं दे रहे हैं.
मोमिन कहते हैं कि पुलिस ने हस्तक्षेप ज़रूर किया लेकिन बीच के कुछ लोगों ने उन पर पुलिस को शिकायत न देने का दबाव डाला. वो कहते हैं कि मैं घर का मालिक हूं लेकिन अपनी मर्ज़ी के ख़रीदार को इसे बेच नहीं पा रहा हूं.
यदि क्षेत्र का कोई तीसरा व्यक्ति बिक्री का विरोध करता है तो क़ानून के तहत ज़िलाधिकारी के पास सौदा रद्द करने का अधिकार है. मोमिन कहते हैं कि ऐसे ही प्रावधानों की वजह से उन जैसे लोग अपनी संपत्ति नहीं बेच पा रहे हैं.
दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद के महासचिव अश्विन पटेल कहते हैं, "यदि कोई एक मुसलमान इलाक़े में आएगा तो उसके बाद दूसरे भी आएंगे और हम अपने इलाक़ों में ये नहीं होने देंगे. यदि संपत्ति किसी हिंदू को बेची जाती है तो हम इसका विरोध नहीं करते हैं."
वो कहते हैं कि मुसलमानों के खानपान और रहन-सहन का ढंग हिंदुओं से अलग है और इसकी वजह से हिंदुओं को परेशानी होती है. वो कहते हैं कि अगर किसी एक मुसलमान को सोसायटी में घर ख़रीदने दिया गया तो इसके बाद अन्य मुसलमान भी यहां घर ख़रीदने लगेंगे और हिंदुओं को अपना इलाक़ा ही छोड़कर जाना पड़ेगा.
वीएचपी के पूर्व नेता प्रवीण तोगड़िया का भी मानना है कि गुजरात में इस क़ानून की ज़रूरत है. हालांकि वो कहते हैं कि क़ानून मौजूद है और इसका पालन होना ही चाहिए.
तोगड़िया कहते हैं कि राज्य के बहुत से हिंदुओं की शिकायत है कि इस क़ानून का कड़ाई से पालन नहीं किया जा रहा है. तोगड़िया दावा करते हैं कि कुछ इलाक़ों में मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है और इससे हिंदुओं को दिक्कतें हो रही हैं.
'छुपे ख़रीदार'
ऐसे भी उदाहरण हैं जब परेशान मुसलमानों ने अपने हिंदू मित्रों की मदद से घर ख़रीदे हैं. इमरान नागौरी अपने चार भाइयों में से एक हैं. घर में लोगों की संख्या बढ़ी तो उन्होंने अपना अलग घर ख़रीदना चाहा.
वो कहते हैं, "मेरे लिए अपने नाम पर संपत्ति ख़रीदना मुश्किल था क्योंकि ज़िलाधिकारी से अनुमति लेने में दिक्कत आ रही थी इसलिए मैंने अपने एक हिंदू दोस्त के नाम पर घर ख़रीदा."
उन्होंने अपने एक हिंदू दोस्त के नाम पर अवानिका सोसायटी में 32 लाख रुपये में एक घर ख़रीदा है.
वो कहते हैं, "जब पड़ोसियों को पता चला कि घर की क़ीमत मैंने चुकाई है तो हंगामा हुआ और पुलिस ने भी मेरा उत्पीड़न किया."
उन्होंने बीबीसी गुजराती को बताया, "मैंने संपत्ति पर 32 लाख रुपये ख़र्च किए लेकिन मुझे उसके पास फटकने भी नहीं दिया जाता है. मैं ये संपत्ति किसी मुसलमान को नहीं बेच सकता हूं क्योंकि पड़ोसियों का दबाव है और वो मेरे इस घर को कौड़ियों के भाव में ख़रीदना चाहते हैं."
अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की गुज़ारिश करते हुए एक मुसलमान युवा ने बताया कि उन्होंने भी अपने एक हिंदू दोस्त के नाम पर संपत्ति ख़रीदने की कोशिश की लेकिन जब वीएचपी के लोगों को पता चला तो उस पर हमला कर दिया गया.
वो कहते हैं, "मैंने पुलिस में कोई शिकायत नहीं की और इस इलाक़े में घर ख़रीदने का विचार ही त्याग दिया."
दोनों संप्रदाय के बीच फासला
ऐसे हालातों में अशांत क्षेत्र संपत्ति क़ानून ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फ़ासले को और ज़्यादा बढ़ा दिया है. एक प्रमुख मुस्लिम बुद्धिजीवी हनीफ़ लकड़ीवाला कहते हैं कि दोनों धर्मों के लोगों के बीच बातचीत लगभग पूरी तरह बंद हो गई है.
लकड़ीवाला कहते हैं, "जुहुपुरा में रहने वाले किसी किशोर के वस्त्रापुर या नारानपुरा में रहने वाले किसी किशोर के साथ कोई संबंध नहीं है. दोनों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान जान-बूझकर रोक दिया गया है." वो कहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए ये बेहद ख़तरनाक हालात हैं.
बीबीसी से बात करते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने कहा, "भारत के मुसलमानों ने जिन्ना के बजाए महात्मा गांधी और पंडित नेहरू को अपना नेता माना था क्योंकि वो एक धर्मनिरपेक्ष देश में रहना चाहते थे. इस क़ानून ने देश का धर्म-निरपेक्ष ताना बाना छिन्न भिन्न कर दिया है, ख़ासकर 2002 के दंगों के बाद हालात और ख़राब हुए हैं और दोनों धर्मों के लोगों के बीच बातचीत बंद सी हो गई है. इसकी वजह से दोनों ही धर्मों के लोग अपने अपने अलग-अलग इलाक़ों में रह रहे हैं. इन इलाक़ों में दोनों ही ओर के धार्मिक कट्टरपंथियों के पास अपनी विचारधारा फ़ैलाने और युवाओं को बरगलाने का आसान मौका होता है."
क़ानून के ख़िलाफ़ दायर याचिका
अशांत क्षेत्रों में संपत्ति की बिक्री को नियमित करने वाले क़ानून के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वाले कार्यकर्ता दानिश क़ुरैशी कहते हैं कि मुसलमानों को पुराने घरों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है.
वो कहते हैं, "ये ज़ाहिर बात है कि आबादी बढ़ने पर घरों की मांग भी बढ़ती है. मुसलमानों के लिए घरों की मांग बहुत ज़्यादा है और घर बहुत कम है और इसकी वजह से मुसलमानों को बहुत दिक़्क़तें हो रही हैं."
वो कहते हैं, "एक नागरिक के तौर पर मेरा ये संवैधानिक अधिकार है कि मैं संपत्ति ख़रीदूं और जहां दिल करे रहूं. लेकिन ये क़ानून दोनों ही समुदायों के लोगों के लिए मौकों को सीमित करता है."
फिलहाल उनकी याचिका गुजरात हाई कोर्ट में लंबित है.
क्या इस क़ानून की ज़रूरत है?
ये क़ानून सबसे पहले साल 1986 में लाया गया था. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनाभाई पटेल की सरकार ने साल 1991 में ये क़ानून पारित किया था.
क़ानून के तहत किसी भी अशांत क्षेत्र में संपत्ति की बिक्री की अनुमति ज़िलाधिकारी देंगे. हर पांच साल बाद इस अधिसूचना की समीक्षा की जाती है. 26 जून 2018 को 70 और इलाक़ों को अशांत क्षेत्रों की सूची में डाल दिया गया था.
ज़िलाधिकारी के पास उनकी अनुमति के बगैर बेची गई संपत्तियों को ज़ब्त करने का भी अधिकार है.
ताज़ा अधिसूचना के मुताबिक अहमदाबाद के कुल 770 क्षेत्र, साल 2023 तक अशांत क्षेत्रों की सूची में रहेंगे. इन इलाक़ों में अचल संपत्ति बेचने वाले हर व्यक्ति को ज़िलाधिकारी से अनुमति लेनी होगी.
गुजरात के प्रमुख सचीव जेएन सिंह ने बीबीसी से कहा, "इन इलाक़ों में सांप्रदायिक तनाव के इतिहास को देखते हुए ही सरकार ने इस क़ानून को बरक़रार रखने का निर्णय लिया है." वो कहते हैं कि इस क़ानून का एक फ़ायदा ये हुआ है कि इसकी वजह से सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में कमी आई है.
हालांकि कार्यकर्ता सिंह की राय से सहमत नहीं है. दानिश क़ुरैशी कहते हैं कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य सरकार को लग रहा है कि ऐसे प्रावधानों के सकारात्मक नतीजे आ रहे हैं.
वो कहते हैं, "ये क़ानून 1991 से लागू है और हमने साल 2002 मे गुजरात में भारत के इतिहास के सबसे भीषण दंगे देखे हैं."
एक अन्य कार्यकर्ता कलीमुद्दीन क़ुरैशी कहते हैं कि इस क़ानून का एक ही उद्देश्य है, प्रमुख इलाक़ों से मुसलमानों को दूर रखना.
कालूपुर के विधायक गयासुद्दीन शेख़ कहते हैं कि इस क़ानून की वजह से अपना घर बेचना या ख़रीदना चाह रहे लोगों को ज़िलाधिकारी कार्यालय और पुलिस थानों के चक्कर लगाने में अपना पैसा और समय बर्बाद करना पड़ रहा है. वो कहते हैं कि हमारे पास ऐसे लोग आते हैं जिनकी शिकायत है कि उन्हें अपने काम करवाने के लिए अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ी.
वहीं प्रशासन का दावा है कि वो इस क़ानून के तहत आने वाली याचिकाओं पर तेज़ी से काम करता है.
जनवरी 2015 से जून 2018 के बीच अहमदाबाद के ज़िलाधिकारी के पास संपत्तियों के मालिका हक़ के हस्तांतरण के लिए 20,408 मामले आए. इनमें से 19,904 अर्ज़ियों को स्वीकार कर लिया गया जबकि 275 के आवेदन रद्द कर दिए गए.
बीबीसी से बात करते हुए ज़िलाधिकारी विक्रांत पांडे कहते हैं, "हम सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी संपत्ति किसी दबाव में न बेची जाए. हम सुनवाई रखते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो."
ज़िलाधिकारी कार्यालय में मकान ख़रीदने और बेचने वालों की गहन जांच की जाती है. सौदा पूरा करने के लिए स्थानीय पुलिस थाने से अनापत्ति प्रमाणपत्र भी लेना पड़ता है. इसके बाद सुनवाई शुरू की जाती है.
हालांकि कार्यकर्ता और शोधकर्ता इन आंकड़ों का एक दूसरा ही पहलू दिखाते हैं. सिद्दीक़ी कहते हैं कि सिर्फ़ वो ही लोग ज़िलाधिकारी के पास बिक्री की अनुमति के लिए पहुंच पाते हैं जिनकी राजनीतिक पहुंच होती है या जिनके पास मोटी रिश्वत देने के पैसे होते हैं.
वो कहते हैं, "ऐसे बहुत से मुसलमान हैं जो संपत्ति ख़रीदना चाहते हैं लेकिन वो ख़रीद नहीं पाते क्योंकि वो ज़िलाधिकारी कार्यालय जाने के लिए तैयार ही नहीं हो पाते."
दानिश क़ुरैशी कहते हैं कि यहां तक कि हिंदुओं को भी ज़िलाधिकारी कार्यालय नहीं पहुंचने दिया जाता है.
वो कहते हैं, "जैसे ही कोई विक्रेता ज़िलाधिकारी कार्यालय जाता है, कट्टरपंथी हिंदूवादी उसे मुसलमानों को संपत्ति न बेचने के लिए धमकाते हैं."
वहीं शोधकर्ता शारिक लालीवाला कहते हैं कि 275 मकानों ख़रीद-बिक्री पर रोक लगाना भी एक बड़ी संख्या है.
अहमदाबाद के खाडिया इलाक़े में रहने वाले वसीम अब्बास पेशे से वकील हैं और अशांत क्षेत्र में संपत्तियों की ख़रीद-फ़रोख़्त के मामले ही देखते हैं.
वो कहते हैं कि शाहपुर इलाक़े में बेची जाने वाली आधी से अधिक संपत्ति पॉवर ऑफ़ अटार्नी पर ही बेची जाती हैं. वो कहते हैं, "विक्रेता और ख़रीदार ज़िलाधिकारी कार्यालय तक जाते ही हैं क्योंकि इससे पुलिस और राजस्व विभाग के चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता है."
ज़िलाधिकारी से संपत्ति बिक्री की अनुमति लेना एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है. सबसे पहले ज़िलाधिकारी कार्यालय में आवेदन करना होता है. इसके बाद स्थानीय पुलिस की राय मांगी जाती है. पुलिस की राय मिलने के बाद ज़िलाधिकारी कार्यालय में सुनवाई होती है और जब सारी औपचारिकताएं पूरी हो जाएं तब ही ख़रीद-बिक्री की अनुमति मिल पाती है.
एक वकील ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि एक संपत्ति का सौदा कराने के लिए उन्हें पुलिस और ज़िलाधिकारी कार्यालय में एक लाख रुपये ख़र्च करने पड़े थे. ये पैसे रिश्वत में दिए गए थे.
हिंदूवादी समूह कैसे कर रहे हैं इस क़ानून का इस्तेमाल?
शाहपुर इलाक़े में काम करने वाले एक मुसलमान रियल एस्टेट एजेंट के मुताबिक अशांत क्षेत्र में वीएचपी और बजरंग दल का एक नेटवर्क होता है जो संपत्तियों की ख़रीद-बिक्री पर नज़र रखता है.
वीएचपी नेता अश्विन पटेल कहते हैं कि उनके कार्यकर्ता संपत्तियों के सौदों पर नज़र रखते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि कोई मुसलमान हिंदू इलाक़ों में घर न ख़रीद पाए.
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस क़ानून के कुछ प्रावधानों का ग़लत इस्तेमाल भी किया जा रहा है. क़ानून के तहत स्थानीय लोग भी ज़िलाधिकारी कार्यालय में अर्ज़ी देकर किसी संपत्ति की बिक्री का विरोध कर सकते हैं.
एक स्थानीय रियल एस्टेट एजेंट के मुताबिक हिंदुत्ववादी समूह इसी प्रावधान का इस्तेमाल करके संपत्तियों की बिक्री का विरोध कर देते हैं और बिक्री रुक जाती है.
कुछ मुसलमान ख़रीदारों का ये भी आरोप है कि वीएचपी के कार्यकर्ता सौदा पूरा होने देने के बदले भारी रक़म की मांग भी करते हैं. हालांकि पटेल इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.
कांग्रेस ने पारित किया था क़ानून
यह क़ानून 1991 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पारित किया था. अधिवक्ता शमशाद पठान कहते हैं कि इस क़ानून का मूल उद्देश्य पुराने अहमदाबाद इलाक़े से हिंदू परिवारों का पलायन रोकना था.
अहमदाबाद शहर में 1986-87 में हुए सांप्रदायिक दंगों ने सामाजिक ताना बना तोड़ दिया था.
राज्य सरकार किसी भी इलाक़े को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकती है. इस क़ानून में जून 2018 में संशोधन किया गया जिसके बाद कुछ और इलाक़ों को अशांत क्षेत्रों की सूची में जोड़ दिया गया.
सरकार ऐसे इलाक़ों को अशांत क्षेत्र घोषित कर देती है जहां समुदायों के बीच सांप्रदायिक तनाव हो या हो सकता हो.
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