You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्लॉगः मुसलमान अपने नमाज़ का इंतजाम खुद करें
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद भारत मुसलमानों की आबादी के मामले में तीसरा सबसे बड़ा देश है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ यहां उनकी आबादी 18 करोड़ से अधिक है.
आबादी के लिहाज़ से भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और संविधान के मुताबिक़ प्रत्येक व्यक्ति को यहां धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है.
यानी, यहां के लोग ताउम्र अपने धर्म का पालन कर सकते हैं, धर्म त्याग सकते हैं और यदि वो चाहें तो अपना धर्म परिवर्तन भी कर सकते हैं.
यहां के लोगों को अपने धर्म का प्रचार करने और उसे बढ़ावा देने की भी पूरी स्वतंत्रता है. कुछ लोग कहते हैं कि दुनिया में सबसे ज़्यादा मस्जिदें भारत में हैं.
अलग-अलग अंदाज़ों के मुताबिक़ यहां मस्जिदों की संख्या तीन से पांच लाख के बीच है. इसके अलावा हज़ारों मक़बरे, दरगाहें, मजार, महल, क़िले, बाग बग़ीचे अतीत के मुसलमानों की याद दिलाते हैं.
धार्मिक सहिष्णुता
परंपरागत रूप से ये देश धार्मिक सहिष्णुता का पालन करता रहा है जहां विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ मिलजुल कर रहते आए हैं.
इबादत के लिए मस्जिद बनाने में कभी रुकावट नहीं आती थी. यहां मुसलमानों की बढ़ती आबादी के साथ ही मस्जिदों की संख्या भी बढ़ती गई.
पिछले 30-35 वर्षों में देश में आर्थिक प्रगति के साथ ही बड़े-बड़े शहरों में नई नौकरियों में भी इज़ाफ़ा हुआ और रोज़ी-रोटी के नए रास्ते खुले.
इन सालों में ग्रामीण इलाकों और छोटे क़स्बों के करोड़ों लोग बड़े शहरों में आकर बसते गए. करोड़ों की तादाद में मुसलमानों ने भी पलायन किया. उनकी पहली ज़रूरत रोज़ी रोटी और नौकरियों पर केंद्रित थी.
नई बस्तियों में मुस्लिम नए धर्मस्थल नहीं बना पाए
दिल्ली, हैदराबाद, बंगलुरु, पुणे, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में नई-नई बस्तियां अस्तित्व में आती रहीं. इन नई बस्तियों में बहुमत हिंदुओं का था, लिहाज़ा हिंदू संस्थानों और खुद हिंदू नागरिकों ने अपनी धार्मिक ज़रूरतों के अनुसार धर्मस्थलों का निर्माण किया था.
लेकिन इन इलाकों में पहुंचे मुस्लिम, आबादी में कम होने के साथ ही बिखरे हुए थे. लिहाज़ा ये लोग अपने लिए नए धर्मस्थल नहीं बना पाए.
पिछले दो दशकों में पेशवर कर्मचारियों के साथ-साथ पढ़े लिखे और मिडिल क्लास के मुसलमानों की तादाद में व्यापारिक और आर्थिक शहरों में ख़ासा इज़ाफ़ा हुआ है.
बड़े शहरों में मस्जिद का निर्माण करना एक बेहद महंगा काम है. मुसलमान क्योंकि नियमित नहीं हैं इसलिए शहरों में मस्जिदों की संख्या बढ़ाने की ज़रूरत के बावजूद वो बनाई नहीं जा सकीं. दूसरे इस दौरान देश में धीरे-धीरे एक बदलाव ये आया कि नए इलाक़ों में मस्जिद बनाने के लिए अनुमति मिलना बेहद मुश्किल काम हो गया.
कई जगहों पर स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से भी मस्जिद के लिए मंज़ूरी मिलने में परेशानियां आने लगीं.
मस्जिदों की क़िल्लत की वजह से बहुत सी जगहों पर मुसलमान अपनी नमाज़ें ख़ासकर जुमे की नमाज़ खाली पड़ी सरकारी ज़मीनों और प्लॉटों पर अदा करने लगे.
कई जगहों पर मस्जिदों की सफ़ें (पंक्तियां) मस्जिद से बाहर निकलकर सड़क तक फैल गईं. मुसलमानों ने कुछ स्थानों पर ईद की नमाज़ें सड़कों और चौराहों पर अदा करना शुरू कर दिया. नमाज़ों के दौरान कई शहरों में रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और ट्रैफ़िक के रास्ते बदलने पड़ते हैं.
मुसलमान सरकार का मुंह देखते रहे और...
बहुत से सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि आम नागरिकों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ भेदभाव के विचार पैदा करने में खुली जगहों और सड़कों पर नमाज़ पढ़ने ने भी अहम किरदार अदा किया.
धर्म हालांकि किसी नागरिक का व्यक्तिगत मामला है और उस में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. लेकिन शहरों की योजना बनाते वक्त जिस तरह स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और दूसरी सहूलियतों का इंतज़ाम किया जाता है उसी तरह धार्मिक ज़रूरतों का भी ख़्याल रखा जाता है.
नए शहरों की योजना में सरकार और प्रशासन ने कई जगहों पर मुसलमानों की मस्जिदों की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किया है. लेकिन मुसलमान इसका इंतज़ाम करने के लिए सरकार का मुंह देखते रहे और खुद को मज़लूम समझते रहे.
दिल्ली के पड़ोसी शहर गुरुग्राम में कुछ हिंदू संगठनों ने खुले स्थानों पर नमाज़ पढ़ने का विरोध किया है. प्रदेश की सरकार भी इसके ख़िलाफ़ है.
बहुत से लोग इस विरोध को हिंदुत्व के एजेंडे से जोड़कर देख रहे हैं. उनका कहना है कि हिंदुओं के बहुत से धार्मिक त्योहार सरकारी ज़मीनों पर ही आयोजित किए किए जाते हैं. लेकिन इस बहस का अहम पहलू ये है कि मुसलमानों को सड़कों और खुले स्थानों पर नमाज़ पढ़ने के बजाए अपनी मस्जिदों और तय स्थानों पर ही पढ़नी चाहिए.
नमाज़ पढ़ना मुसलमानों का व्यक्तिगत मामला है और उसके लिए सरकार का मुंह देखने के बजाए अपना इंतज़ाम ख़ुद करना चाहिए.