क्या मोदी सरकार में मज़दूरों के हक़ कमज़ोर हुए हैं?

- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रफ़ी मार्ग पर लगभग 200 मीटर तक एक तरफ़ की सड़क का रंग बदला हुआ था. ये जगह लाल रंग के झंडों से पटी दिख रही थी. सड़क पर मुड़ते ही पता चला रहा था कि यहां मज़दूर संगठनों का सम्मेलन चल रहा है.
लोगों की गहमागहमी कम दिख रही थी तो मुझे लगा कि कम लोग होंगे. मगर मावलंकर हॉल पहुंची और भीतर झांककर देखा तो वहां पैर रखने तक की जगह नहीं थी.
अंदाज़ा लगाएं तो वहां एक हज़ार से अधिक लोग होंगे. कुर्सियों के अलावा लोग नीचे ज़मीन पर बैठ कर भी अपने नेताओं की बातें सुन रहे थे.
मंच पर क़रीब 15 नेता थे, जिनमें एक तिहाई महिलाएं थीं. लेकिन स्पष्ट दिख रहा था कि सुनने वालों में महिलाओं की संख्या काफ़ी कम थी.
बीच-बीच में गूंजती तालियों की आवाज़ मुझे बता रही थी कि भाषण से लोग बोर नहीं हो रहे.
यहां शुक्रवार को देशभर के 10 ट्रेड यूनियन्स और कई स्वतंत्र संगठनों के नेता राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए जुटे थे और कई मांगों को लेकर आगे की रणनीति पर काम करने के बारे में विचार हो रहा था.
इन संगठनों का कहना है कि मौजूदा सरकार की मज़दूर विरोधी नीति और ट्रेड यूनियनों को कमज़ोर करने की कोशिश का सीधा असर कामगारों पर पड़ रहा है.

पांच क़दम जिनके ज़रिए श्रम क़ानूनों को 'कमज़ोर' कर रही है सरकार
ट्रेड यूनियन कॉर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी) के राष्ट्रीय सचिव देवराजन बताते हैं पहले मज़दूरों के हक़ों के लिए त्रिपक्षीय परामर्श बैठकें होती थीं जिनमें सरकार, मज़दूरों के प्रतिनिधि और कंपनी के नुमाइंदे रहते थे, लेकिन मोदी सरकार आने के बाद इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया गया है.
वो कहते हैं, "ईज़ ऑफ़ बिज़नेस के तहत विदेशी पूंजी को देश में लाना है और देश में भी पूंजीपतियों को बढ़ावा देना है तो ट्रेड यूनियन का एक्टिविज़म नहीं चलेगा. इस कारण ट्रेड यूनियनों को कमज़ोर किया जा रहा है."
देश की आज़ादी से पहले और बाद में देश में श्रमिकों के लिए कुल 44 क़ानून बने थे. अब सरकार उन्हें चार श्रम क़ानून कोड - सोशल सिक्यॉरिटी कोड, वेतन (और बोनस) संबंधित कोड, कार्यस्थल पर सुरक्षा संबंधी कोड और इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड- के तहत समेटना चाहती है.

बीते साल सरकार ने श्रम क़ानून में बदलाव कर उन्हें ख़त्म कर चार नए लेबर कोड बनाने का प्रस्ताव दिया था.
देवराजन कहते हैं, "इससे कामगार को जिस तरह की सुरक्षा और सुविधाएं (जीएचएस, इंश्योरेंस और बच्चों की पढ़ाई में स्कॉलरशिप) मिली हुई हैं वो छिन जाएंगी. इसके लिए श्रम संगठनों के नुमाइंदों से कोई बात नहीं की गई है बल्कि इसे लोकसभा में पास कराने पर चर्चा चल रही है.
2015 में श्रम सचिव शंकर अग्रवाल ने चार नए कोड के बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि "हमारे श्रम क़ानून बेहद सुस्त हैं और विकास के रास्ते में रोड़े के समान हैं."

हिंद मज़दूर सभा के जनरल सेक्रेटरी हरभजन सिंह सिद्धू कहते हैं, "कामगारों के लिए जो क़ानून बने थे, वे कॉर्पोरेट हाउस के दवाब में मसल दिए गए हैं. इंडस्ट्रियल कोड और वेज कोड पहले ही संसद में पहुंच चुके हैं. हमारी आपत्तियां बस मुंह दिखाई के लिए रखी गई हैं."
"इनके अनुसार ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस के लिए लेबर ऑफ़िसर को निकाल कर उसकी जगह फेसिलिटेटर की जगह बनाई गई है जो कामगारों की कम और कंपनियों की अधिक बात करेगा."
हरभजन सिंह सिद्धू कहते हैं, "सरकार के इस नए प्रस्ताव के अनुसार जिस दिन हड़ताल का नोटिस दिया जाएगा, बातचीत का दौर (रीकन्सिलिएशन) चालू हो जाएगा और इस दौरान आपको काम छोड़ने की इजाज़त नहीं रहेगी."
वो कहते हैं कि ऐसे में एकजुट होना भी असंभव हो जाएगा.

1. 'ट्रेड यूनियन बनाना मुश्किल होगा'
भारत में पहला ट्रेड यूनियन 1918 में बना और इसके बाद 1926 में तत्कालीन ऐसे यूनियनों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन्स एक्ट बनाया गया.
इस क़ानून के तहत यूनियनों का पंजीकरण करना आवश्यक हो गया और इस बात की भी निगरानी करना संभव हो गया कि यूनियन अपने पास जमा धन का सही इस्तेमाल करे. इसके ज़रिए केवल कामगारों के समूह ही नहीं बल्कि कर्मचारियों के समूह भी ट्रेड यूनियन कहला सकते थे.
इस क़ानून में 2001 में संशोधन किये गए थे. उसके बाद 2018 में श्रम मंत्रालय इसमें नए संशोधनों का प्रस्ताव दिया था. प्रस्ताव के अनुसार केंद्र और राज्य स्तर पर इन्हें अधिक महत्व देने के लिए ये संशोधन का प्रस्ताव हैं.
लेकिन मज़दूर संगठन इस प्रस्ताव से नाराज़ हैं. देवराजन कहते हैं, "हमारे साथ कोई चर्चा नहीं हुई. सरकार एकतरफ़ा काम कर रही है और हमसे हमारे एकजुट होने का अधिकार भी छीन लेना चाहती है. हमने इसका विरोध किया है और हाल में इसकी एक बैठक भी बुलाई गई थी लेकिन हमने आपत्ति जताते हुए इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया."

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की महासचिव अमरजीत कौर कहती हैं, "ये बदलाव यूनियन बनाने की धारणा और मिलकर मांग उठाने की बात के विपरीत हैं. सरकार सीधे-सीधे ट्रेड यूनियन में घुसना चाहती है."
2. कॉन्ट्रैक्ट लेबर को बढ़ावा दे रही है सरकार
मज़दूर संगठनों का कहना है कि सरकार कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरियां देने को बढ़ावा दे रही है जिसके कारण कर्मचारी को इंश्योरेंस, पीएफ, ग्रैच्युटी की जो सुविधाएं मिलनी चाहिए उन्हें वो नहीं मिल पा रही.
इसी साल मार्च में एक गैजेट नोटिफिकेशन के ज़रिए सरकार ने फैक्ट्रियों में कॉन्ट्रैक्ट लेबर (नियत अवधि नियोजन कर्मकार) को बढ़ावा देने की बात की. इस नोटिफिकेशन के अनुसार ऐसे कर्मकारों का कॉन्ट्रैक्ट कभी भी ख़त्म किया जा सकता है और "कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म होने पर या किसी नोटिस के बदले वो वेतन नहीं ले सकेंगे."
इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. जी संजीवा रेड्डी कहते हैं, "अब वो समय है जब सरकार नौकरी कॉन्ट्रैक्ट पर दे रही है. किसी को कभी भी अचानक नौकरी से निकाल दिया जा सकता है. ये क़ानून मज़दूरों को लूटने के लिए बनाया गया है."

2014 में सरकार ने ऐपरेन्टिसशिप क़ानून, 1961 में बदलाव किए, ये बिल अगस्त में लोकसभा से और फिर इसी साल नवंबर में राज्यसभा में पारित हो गया है.
इस नए क़ानून के अनुसार किसी ऐपरेन्टिस को काम पर रखने की न्यूनतम उम्र 14 साल (जोखिम वाली इंडस्ट्री में न्यूनतम उम्र 18 साल) रखी गई है.
इस नए क़ानून में जोड़ा गया है कि कामगारों के काम के घंटे और छुट्टियों के बारे में नियुक्ति करने वाले ही फ़ैसला ले सकते हैं. साथ ही इसके उल्लंघन पर पहले सज़ा का प्रावधान था जिसे जुर्माने से बदल दिया गया है.
अमरजीत कौर कहती हैं, "ऐपरेन्टिसशिप की सारी रोक हटा दी गई हैं, उन्हें नियुक्त करो और ऐपरेन्टिस का पैसा दो, तनख्वाह ना दो, ये भी चल रहा है."
वो कहती हैं कि इसका असर महिलाओं पर पड़ रहा है. एक समान काम और वेतन का क़ानून 1963 में लाया गया था, लेकिन अभी ऐसा नहीं है.
"अब आप कॉन्ट्रैक्ट पर काम की बात करें तो इसमें महिलाओं को सबसे निचले स्तर का काम ही दिया जाएगा. महिलाओं की स्थिति और बिगड़ेगी."

3. निजीकरण की मार कामगारों पर
इन मज़दूर संगठनों का कहना है कि देश में जितनी पब्लिक सेक्टर इकाइयां हैं उनमें लोगों के टैक्स का पैसा है और भाजपा सरकार इसके लिए पुरज़ोर कोशिश करती रही है.
पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में 19 दिसंबर 1999 को एक विनिवेश विभाग बनाया गया और पहली बार विनिवेश मंत्री भी बनाया गया. इस विभाग को बाद में 2001 में विनिवेश मंत्रालय बना दिया गया.
देवराजन कहते हैं, "यूपीए के आने पर निजीकरण के लिए अधिक कोशिशें नहीं की गईं. वामपंथी पार्टियां सरकार को समर्थन दे रही थीं और इसे रोक कर रखा गया था."
"लेकिन भाजपा सरकार ने हर साल का अपना लक्ष्य रखा है. 2017-18 के लिए 1 लाख करोड़ का लक्ष्य रखा गया है. इसमें रक्षा क्षेत्र में भी 100 फ़ीसदी विनिवेश की बात की गई है."

4. रक्षा मामलों से जुड़ी कंपनियों को ख़त्म कर रही है सरकार
इसी साल रक्षा मंत्रालय ने तय किया है कि वो ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में और निवेश नहीं करेगी और यहां पर उत्पादन का काम करने के लिए निजी क्षेत्र से काम लिया जाएगा. सरकार का फ़ैसला था बड़े हथियार बनाने का काम सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के पास रहेगा.
माना जा रहा है कि ये फ़ैसला प्रधानमंत्री कार्यालय के ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों से 2013 के बाद की अपनी प्रदर्शन संबंधी रिपोर्ट देने के बाद आया है. इसके बाद 2017 दिसंबर में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों की समीक्षा की थी.
इसी साल जुलाई में रक्षा मंत्रालय ने सेना को आदेश दिए हैं कि ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों द्वारा बनाए जा रहे 87 सामानों में से 39 निजी कंपनियों से ख़रीदा जाए.
देवराजन बताते हैं कि इसका असर भी दिखने लगा है. "उत्पादन कम करने के लिए कम उत्पादन के लिए कहा जाता है, या कच्चे माल की सप्लाई बंद कर दी जाती है या फिर उत्पाद का बाज़ार ख़त्म कर दिया जाता है. इसका असर कामगार पर पड़ता है, उसे सुविधाएं मिलना कम हो जाती हैं."

5. 43 साल की स्कीम, पर नौकरी नहीं
उषा रानी तीन दशकों से अधिक वक्त से आंगनवाड़ी का काम कर रही हैं लेकिन वो सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, ना ही उन्हें कर्मचारियों जैसी कोई सुविधा ही मिलती है.
2 अक्तूबर 1975 को भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिल कर आईसीडीएस स्कीम (समन्वित बाल विकास योजना) शुरू की थी और उस समय माना गया था कि पूरे विश्व के एक तिहाई कुपोषित बच्चे और गर्भवती महिलाएं भारत में हैं.
आंगनवाड़ी फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया की अध्यक्ष उषा रानी कहती हैं, "पहले इसे यूनिसेफ़ की मदद से शुरू किया गया था. बाद में इसे केंद्र और राज्य सरकारों की 70-25 हिस्सेदारी में लाया गया. मोदी सरकार ने इस हिस्सेदारी को बढ़ा कर 60-40 कर दिया है यानी इसमें काम के लिए 60 फ़ीसदी धन केंद्र और 40 फ़ीसदी राज्य सरकार देगी."
वो कहती हैं, "जब हमें आईसीडीएस के तहत काम पर रखा गया था तब हमारी ज़िम्मेदारी 6 साल तक के बच्चों और महिलाओं के लिए काम करने की थी. लेकिन आज इसे अंब्रेला स्कीम बना दिया गया है. इसके अंदर मातृत्व सहयोग योजना, किशोरी योजना, पोषण अभियान, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान सब जोड़ दिए हैं."
"कई और काम होते हैं जैसे वेलफ़ेयर स्कीम के सर्वे, धर्म, एनआरआई, किन्नरों का सर्वे, पशुओं की गणना, गांवों में शौचालयों के निर्माण की संख्या, गांव के भीतर पेंशन फ़ॉर्म भरना, पंजाब में राशन कार्ड बनाने के काम, बीपीएल का रिकॉर्ड भी हमें रखना होता है. और काम के कुछ घंटे सरकार तय ज़रूर करती है लेकिन काम उन घंटों से कहीं अधिक होता है."

उषा रानी कहती हैं कि हालांकि हम कई साल तक कर्मचारियों की तरह काम करते हैं, लेकिन महिलाओं को सुविधाओं से वंचित रखने के लिए इसे अब तक स्कीम ही रखा गया है.
"आप ये अंदाज़ा लगाइये कि 43 साल हो चुके हैं आईसीडीएस को शुरू हुए, आंगनवाड़ी की ख़ुद की कोई इमारत तक नहीं है, बिजली का प्रबंध नहीं है, पंखे नहीं हैं. और अगर हम किसी दानकर्ता से पंखे ले लें तो बिजली के बिल का कोई प्रबंध नहीं है."
"बीते सात साल से हमारा एक रुपया नहीं बढ़ा था. सात साल बाद मोदी सरकार ने वर्कर का 1500 रुपये और हेल्पर 750 रुपया बढ़ाया है. 4500 और 2250 रुपये प्रतिमाह में कोई अपना गुज़ारा कैसे कर सकता है?"
वो कहती हैं कि आंगनवाड़ी में काम करने वालों को (जिनमें अधिकतर महिलाएं होती हैं) आज तक कर्मचारी ही नहीं माना गया बल्कि उन्हें स्वेच्छासेवी माना जाता है. वो कहती हैं कि उनके पास अपनी मांगों को लेकर लड़ने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है.

व्यापक प्रदर्शनों की तैयारी
शुक्रवार को हुए सम्मेलन में प्रस्ताव पर मुहर लगी है कि 8 और 9 जनवरी 2019 को पूरे भारत में सभी मज़दूर संगठन एक साथ आएंगे और अपनी मांगों को लेकर दो दिन यानी 48 घंटे की हड़ताल करेंगे.
हरभजन सिंह सिद्धू कहते हैं, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले व्यापक हड़ताल के लिए और संगठनों को एकजुट किया जाएगा.
वहीं सीटू के जनरल सेक्रेटरी तपन सेन कहते हैं, "आज देशी-विदेशी पूंजीपतियों के साथ देश विरोधी कार्यक्रम चल नहीं सकता है. ऐसी नीति अपनाने वालों को उखाड़ कर देश के बाहर करना है. इसी संघर्ष की तैयारी के लिए ये सम्मेलन हो रहा है. मज़दूर संघ की गर्माहट पैदा हुई है और होनी ही चाहिए."
उन्होंने कहा कि अगर ज़रूरत पड़ी तो सरकार के सामने अपना विरोध जताने के लिए मज़दूर संगठन अनिश्चितकालीन हड़ताल के बारे में भी विचार करेंगे.
तपन सेन के भाषण पर ज़ोरदार तालियां बज उठीं और हॉल नारों से गूंज उठा.
"मज़दूर एकता ज़िंदाबाद - ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद.
मोदी सरकार होश में आओ - होश में आओ, होश में आओ.
देश के मज़दूरों से मत टकराओ - मत टकराओ, मत टकराओ."
इन नारों से दिल्ली का मावलंकर हॉल ज़रूर गूंज रहा था, लेकिन हॉल के बाहर इन नारों की गूंज कम ही पहुंच रही थी.
थोड़ी और दूरी पर यानी कुछ पचास फ़ीट दूर आते-आते नारों की आवाज़ गाड़ियों की आवाज़ में खो चुकी थी. सड़क के पास एक प्लेकार्ड खंभे के सहारे था, जिसे पकड़ने वाला अब कोई नहीं थी.

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