इसी वक्त तीन तलाक पर अध्यादेश क्यों लाई मोदी सरकार?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले एक साल से विवादित तीन तलाक़ बिल पर अध्यादेश को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है. इससे पहले कैबिनेट ने बुधवार दोपहर को ही ये अध्यादेश को हरी झंडी दे दी थी.
कैबिनेट की मंजूरी के बाद केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अध्यादेश को समय की ज़रूरत बताया.
उन्होंने कहा कि लैंगिक न्याय और समानता के लिए ये अध्यादेश लाना ज़रूरी था. इस अध्यादेश के जरिए बीजेपी ने कांग्रेस पर भी निशाना साधा और उसे महिला विरोधी बताया.
इन आरोपों के जवाब में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बीजेपी के इरादों पर सवाल उठाया.
उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी को महिला सरोकारों से मतलब नहीं है, बल्कि वो इस बिल को एक ज्वलंत राजनीतिक मुद्दा बनाए रखना चाहती है.
रणदीप सुरजेवाला ने कहा, ''बीजेपी के लिए यह मामला मुस्लिम महिलाओं के लिए न्याय का नहीं, बल्कि एक राजनीतिक फुटबॉल है.''

इमेज स्रोत, Getty Images
विवादों में बिल
अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक़ को अवैध करार देने के बाद से ही ये मुद्दा कांग्रेस और बीजेपी के लिए चुनावी मसला बना हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार मुस्लिम महिलाएं (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2017 लेकर आई थी.
ये विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में अटक गया. विपक्ष ने तीन तलाक पर कुछ संशोधनों की मांग की थी जिसे लेकर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पाई.
अब इस विधेयक को दिसंबर में आने वाले शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की संभावना थी लेकिन इससे पहले ही सरकार ने अध्यादेश लाकर विपक्ष को हैरत में डाल दिया.
इससे सवाल उठने लगे हैं कि सरकार ये अध्यादेश इस वक्त क्यों लेकर आई? आने वाले चुनावों और विपक्ष की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ने वाला है?

इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर कहती हैं, ''ये पूरी तरह एक राजनीतिक कदम है. अगले कुछ महीनों में ही चार-पांच राज्यों में चुनाव आने वाले हैं और बीजेपी मुस्लिम महिलाओं को ये संदेश देना चाहती है कि वो उनके साथ है और उनके लिए लड़ रही है. इसके जरिए महिला वोट बैंक साधने की कोशिश है.''
कल्याणी शंकर कहती हैं कि ये हिंदू वोट बैंक को भी एकजुट करने का एक तरीका है. इस बिल के चर्चा में आने के साथ ही पूरा मामला मुस्लिम बनाम हिंदू हो जाता है जिसका फायदा बीजेपी को मिलता है. पिछले कुछ समय से बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में आए कुछ नुकसान की भरपाई में भी इससे मदद मिल सकती है.
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह इसे समाज के लिए तो एक अच्छा फैसला मानते हैं लेकिन इसके समय को राजनीतिक अर्थों से भी जोड़कर देखते हैं.
वह कहते हैं, ''राजनीतिक दल कोई कदम उठाता है तो निश्चित रूप से उसमें राजनीतिक हित जुड़ा होता है. दरअसल, बीजेपी को मुस्लिम समुदाय का समर्थन चुनाव में नहीं मिलता. वह पिछले कई सालों से कोशिश में है कि इस समुदाय में अपनी पैठ बनाई जाए. वह इसके जरिए मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.''

इमेज स्रोत, Getty Images
शीत सत्र में क्यों नहीं
बीजेपी पिछले दो सत्रों में तीन तलाक़ बिल लेकर आई थी, लेकिन इस बार कुछ महीनों बाद ही आने वाले शीत सत्र का इंतज़ार किए बिना अध्यादेश को मंजूरी दे दी.
बीजेपी के अध्यादेश का रास्ता चुनने को लेकर कल्याणी शंकर कहती हैं कि सभी राजनीतिक दल अभी चुनावी मोड में आ चुके हैं. चुनावों की तैयारी और कैंपेनिंग चल रही है. इसलिए आगे के सत्रों में कोई खास काम नहीं होने वाला है.
उन्होंने बताया, ''ऐसे में बीजेपी इसे पास नहीं करा पाएगी क्योंकि विपक्ष इसे चयन समिति के पास भेजना चाहता है ताकि उनके बताए संशोधनों पर विचार हो सके. वहीं, बीजेपी अब ये साफतौर पर कह सकती है कि हमने कानून बना दिया लेकिन उसे पास कराने की विपक्ष की मंशा ही नहीं है. जबकि यही बात वो पूरी मजबूती से शीत सत्र के बाद अध्यादेश लाने पर नहीं कह पाती.''

इमेज स्रोत, Getty Images
कांग्रेस के सामने चुनौती
कांग्रेस तीन तलाक विधेयक का पूरी तरह विरोध नहीं कर रही है. वो हमेशा से इसमें संशोधन की बात करती आई है.
लेकिन अध्यादेश आने के बाद कांग्रेस बीजेपी को मिलने वाले राजनीतिक फायदे और महिला विरोधी होने के आरोपों से कैसे निबटेगी.
अगर विधेयक संसद में आता है तो कांग्रेस का क्या स्टैंड होगा?
कल्याणी शंकर कहती हैं, ''कांग्रेस के लिए स्थिति मुश्किल हो गई है. वो न इस विधेयक का पूरी तरह विरोध कर सकती है और न समर्थन क्योंकि उसका पूरा क्रेडिट बीजेपी को मिल जाएगा. इसलिए अब विपक्ष बीच का रास्ता तलाशेगा.''

इमेज स्रोत, FACEBOOK/RAHUL GANDHI
''कांग्रेस आगे अध्यादेश की जरूरत पर सवाल उठा सकती है और संशोधनों की मांग कर सकती है. इसी तरह दोनों सत्र निकल जाएंगे और ये राजनीतिक मुद्दा बना रहेगा. कांग्रेस को बहुत ध्यान से चलना होगा क्योंकि उन्हें भी महिला वोट बैंक साधना है.''
अब तीन तलाक अध्यादेश शीत सत्र शुरू होने के 6 हफ़्तों तक मान्य रहेगा. सरकार को इसे राज्यसभा में पारित कराना होगा वरना अध्यादेश का प्रभाव ख़त्म हो जाएगा.
ऐसी स्थिति में फिर से कानून बनाने के लिए सरकार को नया अध्यादेश लाना होगा.
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












