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मनोज उरांव के तीन बच्चों को किसने ग़ायब किया?
- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, मौसीबाड़ी (रांची) से, बीबीसी हिंदी के लिए
मनोज उरांव की दो बेटियां और एक बेटा पिछले 29 अप्रैल से ग़ायब हैं. उनके घर में कृष, महिमा और अंजली की यादें हर पल गूंजती रहती हैं.
मनोज उरांव और उनकी पत्नी दिहाड़ी मजदूर हैं. यह परिवार गुमला ज़िले के एक गांव में रहता था. 12 साल पहले पति-पत्नी रोजी-रोटी की तलाश में रांची के मौसीबाड़ी बस्ती में चले आए थे.
बच्चों के गुम होने के 10 दिन बाद पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज़ की.
मनोज बताते हैं, ''हम जब भी पुलिस के पास जाते थे तो यही कहा जाता था कि दूसरी बस्ती वालों से पूछो. इसके बाद हमने तय कर लिया कि अब चैन से नहीं बैठेंगे. इस दौरान दिहाड़ी भी ठप पड़ी रही.''
मनोज कहते हैं कि बच्चों की तलाश में पिछले चार महीने में एक लाख रुपए खर्च हो गए और 30 हज़ार रुपए के क़र्ज़ में डूब गए हैं.
झारखंड में दुख की यह दास्तान केवल मनोज की ही नहीं है. ग़रीब परिवारों के बच्चों के रहस्यमय ढंग से ग़ायब होने का सिलसिला थम नहीं रहा है.
इससे पहले सिमडेगा के एक गांव से 17 साल की आदिवासी लड़की सुशाना केरकेट्टा चार और छह साल के अपने दो भतीजों को लेकर राजधानी रांची आई थी.
यहां किराए का कमरा लेकर वो नर्सिंग की पढ़ाई करने लगी और भतीजों को स्कूल में दाखिला दिलाया.
अचानक आठ जुलाई 2010 को दोनों बच्चे रंजीत केसपोट्टा और अनूप ग़ायब हो गए. इस मामले में सीबीआइ जांच भी बैठी पर बच्चों का पता नहीं चला.
आंकड़े
झारखंड पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि साल 2013 से 2017 के मई महीने तक राज्य से 2489 बच्चे लापता हुए हैं और इनमें से 1114 बच्चों का पता नहीं चल पाया है.
इसके अलावा 2014 से मार्च 2017 तक मानव तस्करी के 394 मामले दर्ज किए गए हैं. इसी दौरान 247 मानव तस्करों को गिरफ़्तार किया गया जबकि 381 लोगों को मुक्त कराया गया.
मानव तस्करी के ख़िलाफ़ और लापता बच्चों को लेकर सालों से झारखंड में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता बैद्यनाथ कुमार कहते हैं, ''यह सच है कि झारखंड में ग़रीब और बेबस घरों के बच्चे इन घटनाओं के शिकार ज़्यादा हो रहे हैं.''
पिछले साल मई में झारखंड के लापुंग की रहने वाली सोनी कुमारी की लाश दिल्ली में मिली थी. सोनी घर से ग़ायब हुईं तो उनके घर वालों ने कोई एफ़आईआर भी दर्ज नहीं कराई थी.
मानव तस्करी पर रोक के लिए झारखंड के आठ ज़िलों- रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, चाईबासा, दुमका और पलामू में एंटी ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग यूनिट ( एएचटीयू) स्थापित किए गए हैं जबकि सात ज़िलों में 27 बाल मित्र थाने बनाए गए हैं.
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