झारखंडः कहाँ खड़ा है राज्य का आदिवासी नेतृत्व?

    • Author, नीरज सिन्हा
    • पदनाम, रांची (झारखंड) से, बीबीसी हिंदी के लिए

देश में पहली बार एक निर्दलीय विधायक की हैसियत से मुख्यमंत्री बनने वाले मधु कोड़ा इन दिनों कहां हैं?

यही सवाल शिबू सोरेन को चुनाव में हराने वाले राजा पीटर के लिए भी पूछा जा सकता है.

झारखंड के राजनीतिक गलियारों में हाशिए पर गए आदिवासी नेताओं की इस लिस्ट में सबसे ताज़ा नाम एनोस एक्का का है.

एनोस एक्का और राजा पीटर का पता जेल है तो मधु कोड़ा इन दिनों बेल पर हैं.

अलबत्ता मधु कोड़ा और एनोस एक्का सजायाफ्ता भी हैं.

ऐसे में जो बात सबसे पहले जहन में आती है, वो ये है कि जयपाल सिंह मुंडा, कार्तिक उरांव, एनइ होरो, बागुन सुंब्रई और डॉक्टर रामदयाल मुंडा जैसे नेता और शख्सियत देने वाले झारखंड के आदिवासी नेताओं को आख़िर हो क्या हो गया है?

झारखंड का आदिवासी नेतृत्व

वरिष्ठ पत्रकार रजत कुमार गुप्ता झारखंड की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखते आ रहे हैं.

इस सवाल पर वे कहते हैं, "इस हाल के लिए ये नेता खुद जिम्मेदार हैं. राजनीति में सब्र और अनुभव का इम्तिहान होता है."

"इसमें पास हुए बगैर उन्हें ये लगता है कि गलत रास्तों की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है." सवाल ये भी है कि वे लंबी रेस का घोड़ा बनने से क्यों और कैसे चूक गए?

रजत कहते हैं, "बाक़ी सारे नेता दूध के धुले हैं, ये कोई दावा नहीं कर सकता लेकिन ये लोग बड़ी गलतियां करते गए और पकड़ में भी आते रहे."

"मधु कोड़ा झारखंड में बड़े आदिवासी नेता के तौर पर खुद को स्थापित कर सकते थे. लेकिन वे अर्श से फर्श पर आ गए. एनोस एक्का भी तेजी से उभरे, लेकिन राजनीतिक दुर्गति का रास्ता खुद तय करने लगे."

एनोस एक्का

साल 2005 में कोलेबिरा सीट से पहली दफा चुनाव जीतने वाले एनोस एक्का की राजनीतिक कुंडली के बारे में तब किसी ने पढ़ने- जानने की कोशिश नहीं की थी.

हालांकि देखते ही देखते वे सत्ता की धुरी बनने लगे और कई सरकारों में मंत्री रहे. उनका रूतबा और रसूख भी बढ़ता गया.

तीसरी दफा 2014 के चुनाव में एक्का जेल से चुनाव जीते. चुनाव से ठीक पहले हत्या के एक मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

तब से वे जेल में हैं और हाल में ही उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गई है. नतीजा ये हुआ कि उनकी विधायकी गई साथ ही राजनीतिक नैया भंवर में फंसती साफ दिख रही है.

इससे पहले भ्रष्टाचार तथा आय से अधिक संपत्ति के गंभीर मामले में भी एनोस को जेल जाना पड़ा है. और इस लपेटे में उनकी पत्नी भी आई है. इस दौरान उनकी संपत्ति भी जब्त की गई.

अर्श से फर्श पर कोड़ा

लगभग दस सालों से केस-मुकदमों से जूझ रहे मधु कोड़ा फ़िलहाल झारखंड की राजनीति में अलग-थलग पड़े हैं.

इस दौरान तीन सालों से अधिक समय तक वे जेल में भी रहे. उनके चुनाव लड़ने के रास्ते अब सालों के लिए बंद हो चुके हैं.

पिछले साल 16 दिसंबर को कोयला घोटाले में उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई है. मुख्यमंत्री बनने से पहले कोड़ा दो बार सरकार में मंत्री भी रहे.

साल 2008 में मुख्यमंत्री की बागडोर हाथ से निकलने के बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में वे चाईबासा से निर्दलीय चुनाव जीते.

पर उन्होंने चुनाव में हुए खर्चे की गलत जानकारी दी. जांच के बाद चुनाव आयोग ने उनके चुनाव लड़ने पर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया है.

इससे पहले वे आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई का सामना करते रहे हैं. मनी लॉड्रिंग के केस में भी वे फंस चुके हैं. पहली दफा साल 2009 में तीस नवंबर को उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

जेल में क्यों पीटर

साल 2009 में हुए तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में पहली दफा चुनाव जीतने वाले राजा पीटर अभी जेल में हैं.

शिबू सोरेन को हराकर वे सुर्खियों में आए थे. और इस हार की वजह से शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

जनता दल यूनाइटेड के विधायक और पार्टी के बड़े नेता रमेश सिंह मुंडा की हत्या के बाद यह उपचुनाव हुआ था.

पिछले साल नौ अक्तूबर को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी यानी एनएआईए ने राजा पीटर को उन्हीं रमेश सिंह मुंडा की हत्या से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया है.

रमेश मुंडा की हत्या का आरोप कुख्यात नक्सली कुंदन पाहन पर भी है जिसने पिछले साल पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है.

झारखंड की छवि

तो क्या झारखंड की छवि इनसे खराब हुई है?

इस सवाल पर रजत कुमार गुप्ता गुप्ता कहते हैं, "बिलकुल. इसी झारखंड में जयपाल सिंह, कार्तिक उरांव, एनइ होरो, बागुन सुंब्रई, डॉक्टर रामदयाल मुंडा जैसी प्रबुद्ध आदिवासी शख्सियत भी हुए जिन्होंने लंबी राजनीतिक पारी खेली और देश-दुनिया में नाम स्थापित किया. आदिवासियों को इन हस्तियों ने पहचान के साथ आवाज़ भी दी."

लेकिन अब झारखंड से बाहर राजनीति पर चर्चा के साथ ही मधु कोड़ा, एनोस एक्का जैसे लोगों के नाम ज़रूर गिना दिए जाते हैं.

गौरतलब है कि जयपाल सिंह के ही नेतृत्व में ही 1928 में भारत ने पहली दफा ओलंपिक हॉकी में हिस्सा लिया था.

बाद में भारत का संविधान बनाने के लिए उन्होंने जनजातियों का प्रतिनिधित्व किया. वे सांसद भी रहे.

इनके अलावा एनइ होरो, बागुन सुंब्रई जैसे नेताओं ने खूंटी तथा चाईबासा जैसे आदिवासी इलाकों का लंबे दिनों तक विधानसभा-लोकसभा में प्रतिनिधत्व किया.

कार्तिक उरांव भी छोटानागपुर में आदिवासियों के बड़े नेता के तौर स्थापित हुए. वे कई सरकारों में मंत्री भी बने.

झारखंड आंदोलन के अगुवा डॉक्टर रामदयाल मुंडा ने भी आदिवासी जननेता- बुद्धिजीवी के तौर पर ख्याति अर्जित की. उन्हें पद्मश्री का सम्मान भी मिला.

कई और फंसे

इससे पहले जमीनी संघर्ष के जरिए झारखंड की राजनीति में पहचान बनाने वाले खिजरी के कांग्रेस विधायक रहे सावना लकड़ा भी हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं.

इनके अलावा 2009 और 2014 में लोहरदगा से आजसू के प्रमुख नेता कमलकिशोर भगत ने भी अपनी विधायकी गंवा दी है.

साल 2015 में मारपीट और रंगदारी के एक मामले में उन्हें सात साल की सजा हुई है. फिलहाल वे जेल में हैं.

जबकि ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन में रहते हुए कमलकिशोर भगत, अलग राज्य की लड़ाई लड़ने वालों महत्वपूर्ण युवा आदिवासी नेता के तौर पर उभरे थे.

बीजेपी के मुंडा और मरांडी कहां गए

सवालों और आरोपों से घिरे से इन नेताओं के इतर कुछ और बड़े नाम भी हैं जो इन दिनों पुराना मुकाम हासिल करने को संघर्ष करते नजर आ रहे हैं.

साल 2014 में अर्जुन मुंडा की हार के बाद रघुवर दास के हाथों सत्ता की बागडोर सौंपी गई. तब बीजेपी ने पहली दफा राज्य में बहुमत हासिल किया था.

इसके साथ ही पार्टी ने किसी गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया. जाहिर है फैसले के बरक्स बीजेपी में नए युग के आगाज़ के तौर पर देखा जाने लगा.

दरअसल अर्जुन मुंडा के चुनाव हारने के बाद पार्टी ने किसी दूसरे आदिवासी विधायक या खूंटी से सात बार सांसद चुने गए कड़िया मुंडा जैसे वरिष्ठ नेता के नाम पर भी एतबार नहीं किया.

राजनीतिक विश्लेषक रजत कुमार गुप्ता कहते हैं, "सच कहिए तो सहज, सरल और बिना लाग-लपेट के बोलने वाले आदिवासी नेता कड़िया मुंडा उम्र के जिस पायदान पर खड़े हैं उसमें मौजूदा दौर की बीजेपी में शायद इस जिम्मेदारी के लिए वे फिट नहीं बैठते हों."

"रही बात अर्जुन मुंडा की तो उनकी पार्टी के अंदर-बाहर आदिवासियों-गैर आदिवासियों के बीच पहचान रही है. लेकिन इन चार सालों में पार्टी ने उन्हें झारखंड में कोई बड़ी जिम्मेदारी देने या आदिवासी नेतृत्व के नाम पर राष्ट्रीय स्तर पर आगे करने की ख़ास ज़रूरत नहीं समझी."

आलोचक इससे भी इनकार नहीं करते कि बीजेपी चाहती तो राष्ट्रीय स्तर पर भी अर्जुन मुंडा का बड़े दायरे में इस्तेमाल कर सकती थी. लेकिन झारखंड में रघुवर दास के कद को बड़ा करने की कोशिशों में शायद इसकी जरूरत नहीं समझी गई. जबकि आदिवासी सवालों पर झारखंड में बीजेपी और उसकी सरकार लगातार घिरती रही है.

वैसे कई राज्यों के चुनावों में पार्टी ने मुंडा को जरूर लगाया गया. आगे लोकसभा-विधानसभा चुनावों में उनकी अहमियत क्या होगी इसे भी देखा जा सकता है.

उधर, साल 2006 में बीजेपी छोड़ने के बाद राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी नया मुकाम हासिल करने के लिए संघर्ष करते रहे हैं.

बीजेपी से तो उन्हें जूझना ही पड़ रहा है विपक्ष में भी अपनी मजबूती साबित करने का संकट है.

हालांकि तमाम विपरीत परिस्थितियों में वे डिगते नहीं देखते और पार्टी को लामबंद करने की हरकोशिशों में जुटे हैं. लेकिन अंकगणित के लिहाज से उनकी परीक्षाएं अब भी बाकी हैं.

झामुमो की स्थिति

दरअसल, विपक्ष में झारखंड मुक्ति मोर्चा के बड़े दल के तौर पर सामने होने तथा हेमंत सोरेन के एक बार मुख्यमंत्री बन जाने के बाद जेएमएम ने फिर से हेमंत को इस पद के लिए सामने कर रखा है.

शिबू सोरेन के उत्तराधिकारी के तौर पर भी हेमंत का चेहरा साफ़ दिखता है और कांग्रेस ने भी इसे लगभग स्वीकार कर लिया है. चुनावों में बीजेपी से टकराने के लिए जेएमएम ने कसरत भी तेज की है.

लेकिन हेमंत सोरेन अकेले बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं दिखते. तब सत्ता हासिल करने के लिए उन्हें विपक्ष के अन्य दलों का साथ लेना पड़ सकता है.

गौरतलब है कि झारखंड की 81 सदस्यों वाली विधानसभा में आदिवासियों के लिए 28 सीटें सुरक्षित हैं. इनमें बीजेपी के पास 11 और जेएमएम के पास तेरह विधायक हैं.

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